हरिद्वार: क्या भागीरथी पार लगाएंगी निशंक की नैया?

देवभूमि के हरिद्वार लोकसभा सीट पर इस बार कांटे की लड़ाई है. बीजेपी से मौजूदा सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक इसी सीट से मैदान में है, जिनका मुख्य मुकाबला कांग्रेस के अंबरीश कुमार से है.

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रमेश पोखरियाल निशंक रमेश पोखरियाल निशंक

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 10 अप्रैल 2019,
  • अपडेटेड 1:10 PM IST

उत्तराखंड की वीआईपी माने जाने वाली हरिद्वार लोकसभा सीट पर इस बार कांटे की लड़ाई है. बीजेपी से मौजूदा सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक मैदान में हैं, जिनका मुकाबला कांग्रेस के अंबरीश कुमार से है. निशंक पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत को करारी मात देकर सांसद चुने गए थे.

रमेश पोखरियाल निशंक का जन्म उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल इलाके में हुआ. 90 के दशक में पोखरियाल ने सियासत में कदम रखा और उत्तराखंड गठन से पहले 1991 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कर्णप्रयाग सीट से विधायक चुने गए. इसके बाद 1993 और 1996 में भी पोखरियाल कर्णप्रयाग विधानसभा सीट से जीत दर्ज की.

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साल 2000 में उत्तराखंड के गठन के बाद पहली बार हुए 2002 में विधानसभा चुनाव हुए तो पोखरियाल ने थालीसैन सीट से चुनावी मैदान में उतरे, लेकिन वो जीत नहीं सके. इसके बाद 2007 में एक बार फिर इसी सीट से चुनावी रण में उतरे और विधायक चुने गए. इसके बाद जब 2007 में बीजेपी की सरकार बनी तो पोखरियाल चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और आयुष मंत्री बने.

बीजेपी ने 2009 के लोकसभा चुनाव में हरिद्वार सीट से पोखरियाल को मैदान में उतारा. कांग्रेस के हरीश रावत के हाथों उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा. इसके बाद पार्टी ने 2009 में ही बीसी खंडूरी की जगह पोखरियाल को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया गया और वो 2011 तक इस पद पर रहे.

2012 में हुए विधानसभा चुनाव में पोखरियाल को हार का मुंह देखना पड़ा. इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें हरिद्वार सीट से मैदान में उतारा. इस बार पोखरियाल ने हरीश रावत को मात देकर 2009 की हार का हिसाब बराबर कर लिया.

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2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पोखरियाल को हरिद्वार संसदीय से मैदान में उतारा है. उनके सामने कांग्रेस ने हरीश रावत की जगह अंबरीश कुमार को उतारा है. ऐसे में देखना होगा कि पोखरियाल इस बार सियासी जंग फतह करते हैं या फिर कांग्रेस उम्मीदवार के हाथों हार का मुंह देखना पड़ता है.

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