सिरसा लोकसभा: 2014 में INLD को मिली थी कामयाबी, अब BJP की है नजर

sirsa lok sabha seat जहां तक 2019 के लोकसभा चुनाव का सवाल है तो सिरसा सीट पर INLD और कांग्रेस के बीच मुकाबला होना तय है. लेकिन राज्य की सत्ता में बीजेपी है, तो वो भी इस सीट पर पहली बार कामयाबी के लिए पूरी ताकत लगा देगी. अभी तक हरियाणा में INLD और बीएसपी के बीच केवल गठबंधन हुआ है.

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सिरसा से 1857 में अंग्रेजों को खदेड़ दिया गया था (फोटो: फाइल) सिरसा से 1857 में अंग्रेजों को खदेड़ दिया गया था (फोटो: फाइल)

अमित कुमार दुबे

  • सिरसा,
  • 06 फरवरी 2019,
  • अपडेटेड 2:26 PM IST

सिरसा का इतिहास प्राचीन और गौरवपूर्ण रहा है. सिरसा शहर का धर्म, राजनीति और साहित्य के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान है. देश में सबसे अधिक गौशालाएं सिरसा में हैं. कृषि के क्षेत्र में भी सिरसा का नाम आता है, कपास उत्पादन में सिरसा का अहम स्थान है, जहां तक राजनीति की बात है तो सिरसा लोकसभा सीट गठन के बाद से ही सुरक्षित है, और ज्यादातर इस पर कांग्रेस का कब्जा रहा है. लेकिन 2014 में इंडियन नेशनल लोकदल (INLD) ने इस सीट पर बाजी मारी, इस सीट पर बीजेपी को कभी जीत नहीं मिली है.  

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जहां तक 2019 के लोकसभा चुनाव का सवाल है तो सिरसा सीट पर INLD और कांग्रेस के बीच मुकाबला होना तय है. लेकिन राज्य की सत्ता में बीजेपी है, तो वो भी इस सीट पर पहली बार कामयाबी के लिए पूरी ताकत लगा देगी. अभी तक हरियाणा में INLD और बीएसपी के बीच केवल गठबंधन हुआ है. सिरसा लोकसभा क्षेत्र में दलित वोटर्स की आबादी ज्यादा है, इसलिए इस गठबंधन को एक तरह से मजबूत माना जा रहा है.

2014 का जनादेश

पिछले लोकसभा चुनाव में इंडियन नेशनल लोकदल के चरणजीत सिंह रोड़ी ने 1,15,736 वोट जीत हासिल की थी. चरणजीत सिंह को 39.59 फीसदी वोट के साथ 5,06,370 में मत मिले थे, जबकि कांग्रेस के अशोक तंवर को 30.54 फीसद वोट के साथ कुल 3,90,370 वोट पड़े थे. बीजेपी समर्थिक हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) के डॉ. सुशील इंडोरा को 2,41,067 वोट प्राप्त हुआ था.

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2014 से पहले INLD गठबंधन को इस सीट पर तीन बार जीत मिली थी, 1989 और 1999 में INLD का बीजेपी के साथ गठबंधन था, जबकि 1998 में इनलो का बसपा के साथ समझौता था. खुद के बलबूते पर INLD को भी सिर्फ 2014 में जीत नसीब हुई. 2014 के लोकसभा चुनाव के मुताबिक यहां कुल 13,09,507 वोटर्स हैं, जिसमें पुरुष मतदाताओं की संख्या 7,06,030 और महिलाओं मतदाताओं की संख्या 6,03,468 थी. पिछले चुनाव के दौरान यहां कुल 1295 पोलिंग बूथ बनाए गए थे.

राजनीतिक पृष्ठभूमि

सिरसा लोकसभा सीट का गठन 1962 को हुआ था, तब से इस सीट पर बीजेपी को कभी कामयाबी नहीं मिली है. हालांकि कहा जाता है कि इस सुरक्षित सीट को लेकर बीजेपी कभी गंभीर नहीं दिखाई दी, इसलिए 2014 में बीजेपी ने गठबंधन के बाद इस सीट को हजकां के लिए छोड़ दिया था. सिरसा लोकसभा सीट पर ज्यादातर कांग्रेस के उम्मीदवार ही जीतते रहे हैं.

1962 से अब तक इस सीट पर कांग्रेस को 9 बार जीत मिली है, जबकि INLD को यहां 1989, 1998, 1999 और 2014 में विजय का सेहरा बंधवाने का मौका मिला था. बीजेपी ने इस सीट पर 2004 में महाबीर प्रसाद को उम्मीदवार बनाया था, जिन्हें 13.68 फीसदी वोट मिले थे. सिरसा लोकसभा सीट की खासियत यह है कि यह तीन जिले सिरसा, फतेहाबाद और जींद तक फैली है.

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सामाजिक ताना-बाना

जातीय समीकरणों के हिसाब से सिरसा में सबसे ज्यादा जाट वोटर्स करीब 3,30,000 हैं. उसके बाद करीब 1,78,000 सिख मतदाता हैं. तीसरे नंबर अनुसूचित जाति के वोटर्स हैं. इस लोकसभा क्षेत्र के अंदर रतिया, कालांवाली, डबवाली, सिरसा, रानियां, एलनाबाद, टोहाना, फतेहाबाद, नरवाना विधानसभा क्षेत्र आते हैं. हरियाणा की यह इकलौती लोकसभा सीट है, जिसके 9 में से तीन विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं.

सांसद का रिपोर्ट कार्ड

चरणजीत सिंह रोड़ी पहली बार 2014 में सिरसा (सुरक्षित) सीट से जीतकर लोकसभा पहुंचे. इससे पहले चरणजीत सिंह हरियाणा के कालांवाली विधानसभा क्षेत्र से (2009- 2014) तक विधायक थे. 49 साल के चरणजीत सिंह रोड़ी ने 16वीं लोकसभा कार्यकाल के दौरान संसद में 9 डिबेट में हिस्सा लिया, जबकि इनके द्वारा संसद में 77 सवाल पूछे गए. वहीं इन्होंने अपने सांसद निधि कोष का 88.42 फीसद रकम का इस्तेमाल अब तक किया है.  

सिरसा का इतिहास

1819 में सिरसा शहर को ब्रिटिश शासक ने अपने कब्जे में ले लिया था. बाद में इसे दिल्‍ली क्षेत्र के उत्‍तरी-पश्चिमी जिले का एक हिस्‍सा बना दिया था. सन् 1837 में अंग्रेजों ने भटियाणा जिला बनाकर सिरसा को उसका मुख्यालय बना दिया था. लेकिन 1857 में अंग्रेजों को यहां से खदेड़ दिया गया. सिरसा शहर मोहम्मद गजनवी के आक्रमणों का भी शिकार हुआ था.

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सरस्वती नदी के तट पर बसा होने के कारण पहले सिरसा का नाम सरस्वती नगर था. प्राचीन काल में सिरसा का सिरसुति नाम भी था, जबकि कई जगहों पर सिरसिका होने का भी सबूत है. लेकिन समय के साथ इसका नाम सिरसा प्रचलित हो गया.

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