उत्तर प्रदेश में अमेठी और रायबरेली के अलावा एक और लोकसभा सीट है जिसे गांधी परिवार का गढ़ माना जाता है. पीलीभीत लोकसभा सीट पर पिछले करीब तीन दशक से संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी और बेटे वरुण गांधी का ही राज रहा है. मेनका गांधी मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री हैं और पीलीभीत से 6 बार सांसद चुनी जा चुकी हैं. एक बार फिर इस सीट पर सभी की नजर है.
पीलीभीत लोकसभा सीट की राजनीतिक पृष्ठभूमि
पीलीभीत लोकसभा सीट पर कभी कांग्रेस पार्टी का दबदबा नहीं रहा. 1951 में हुए लोकसभा चुनाव में भले ही कांग्रेस ने यहां से जीत हासिल की हो लेकिन उसके बाद 1957, 1962, 1967 के चुनाव में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने जीत दर्ज की थी. हालांकि, 1971 में फिर कांग्रेस ने यहां वापसी की. लेकिन 1977 में चली सरकार विरोधी लहर में कांग्रेस की करारी हार हुई.
1980 और 1984 के चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर यहां से बड़ी जीत हासिल की, लेकिन उसके बाद कांग्रेस यहां कभी वापसी नहीं कर पाई. संजय गांधी की मौत के बाद गांधी परिवार से अलग हुई मेनका ने 1989 में जनता दल के टिकट पर यहां से चुनाव लड़ा और जीता. लेकिन दो साल बाद हुए चुनाव में ही बीजेपी ने यहां से जीत हासिल की.
उसके बाद 1996 से 2004 तक मेनका गांधी ने लगातार चार बार यहां से चुनाव जीता, इनमें दो बार निर्दलीय और 2004 में बीजेपी के टिकट से चुनाव में जीत हासिल की थी. 2009 में मेनका गांधी ने अपने बेटे वरुण गांधी के लिए ये सीट छोड़ी और वरुण यहां से सांसद चुने गए. लेकिन 2014 में एक बार फिर वह यहां वापस आईं और छठीं बार यहां से सांसद चुनी गईं.
पीलीभीत का राजनीतिक समीकरण
पीलीभीत लोकसभा क्षेत्र में हिंदू वोटरों के साथ-साथ मुस्लिम वोटरों का भी खास प्रभाव है. पीलीभीत जिले में करीब 30 फीसदी मुस्लिम नागरिक हैं, ऐसे में मुस्लिम वोटों को अनदेखा ठीक नहीं होगा. 2014 के चुनाव के अनुसार इस सीट पर 16 लाख से अधिक वोटर हैं, जिनमें 9 लाख पुरुष और 7 लाख से अधिक महिला मतदाता हैं.
इस क्षेत्र में कुल 5 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें बहेड़ी, पीलीभीत, बड़खेड़ा, पूरनपुर और बिसालपुर शामिल हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में इन सभी पांच सीटों पर बीजेपी ने ही बाजी मारी थी.
2014 में कैसा रहा जनादेश
पिछले लोकसभा चुनाव में यहां मेनका गांधी के प्रभाव और मोदी लहर का असर साफ देखने को मिला था. मेनका गांधी को 51 फीसदी से भी अधिक वोट मिले और उन्होंने एकतरफा जीत हासिल की. 2014 के चुनाव में मेनका गांधी को 52.1% और उनके विरोधी समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार को 22.8% वोट हासिल हुए थे. 2014 में इस सीट पर कुल 62.9% मतदान हुआ था.
सांसद का प्रोफाइल और प्रदर्शन
स्थानीय सांसद मेनका गांधी अभी केंद्रीय मंत्री हैं. 1980 में कांग्रेस नेता संजय गांधी की एक दुर्घटना में मौत हो गई थी. जिसके बाद से ही मेनका गांधी ने कांग्रेस से दूरी बनाना शुरू कर दिया था. 1988 में उन्होंने जनता दल का दामन थामा था, लेकिन 2004 में वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गई थीं. 1989 से ही वह यहां चुनाव लड़ रही हैं, सिर्फ 2009 में उनकी जगह उनके बेटे वरुण गांधी यहां से चुनाव लड़े थे.
16वीं लोकसभा में मेनका गांधी ने सदन की कुल 23 बहस में हिस्सा लिया. मेनका गांधी ने इस कार्यकाल में सरकार की ओर कई बिल भी पेश किए. 2014 में आई ADR की रिपोर्ट के मुताबिक, मेनका गांधी के पास 37 करोड़ से अधिक की संपत्ति है. मेनका गांधी ने अपने संसदीय फंड की करीब 87 फीसदी राशि खर्च की है.
मोहित ग्रोवर