हरियाणा की एक सीट इन दिनों चर्चा में है. चर्चा की वजह है एक उम्मीदवार का मतदान से पहले दल-बदल लेना. वह सीट है महेंद्रगढ़ जिले की नारनौल विधानसभा सीट. जहां से इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के उम्मीदवार राजेश सिहार ने मैदान छोड़कर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया था.
साल 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के ओम प्रकाश ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी इनेलो के कमलेश को चार हजार से अधिक वोट के अंतर से मात दी थी. भाजपा ने यादव बाहुल्य इस सीट से एक बार फिर ओम प्रकाश यादव को ही उम्मीदवार बनाया है. तब कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही थी. कांग्रेस ने इस बार भी तीसरे स्थान पर रहे नरेंद्र सिंह पर ही दांव लगाया है. राजेश सिहार के मैदान छोड़ने के बाद नारनौल सीट से कुल आठ उम्मीदवार चुनावी रणभूमि में ताल ठोक रहे हैं.
1987 के बाद पहली बार खिला था कमल
सन् 1987 के बाद 2014 में महज दूसरा ही मौका था, जब नारनौल सीट पर भाजपा ने जीत दर्ज की. यह दूसरा ही अवसर था जब नारनौल में कमल खिला था. ओम प्रकाश से पहले कैलाश चंद्र शर्मा ने भाजपा उम्मीदवार के रूप में 1987 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी. अब ओम प्रकाश के सामने 2019 में भी कमल खिलाए रखने की चुनौती है.
क्या है चुनावी अतीत?
नारनौल सीट से आजादी के बाद 1951 और 1954 के चुनाव में कांग्रेस के रामशरण चंद्र मित्तल विधायक चुने गए थे. 1957 में जनसंघ के देवकीनंदन ने मित्तल को पराजित कर उनका विजय रथ रोक दिया था. 1962 में मित्तल फिर निर्वाचित हुए. 1967 में जनसंघ के बनवारी लाल छक्कड़ विधायक चुने गए थे. 1968 में मित्तल विधायक चुने गए. 1977 में अयोध्या प्रसाद ने नारनौल में समाजवाद का परचम लहराया. 1982 और 1987 में कांग्रेस के फूसाराम विधायक निर्वाचित हुए.
1996 में निर्दलीय ने चखा जीत का स्वाद
सन् 1996 के चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार कैलाश चंद्र शर्मा ने जीत का स्वाद चखा. 2000 की चुनावी जंग भी निर्दलीय बनाम निर्दलीय रही और निर्दलीय उम्मीदवार मूलाराम ने निकटतम प्रतिद्वंदी राधेश्याम को पराजित किया. 2005 में भी निर्दलीय राधेश्याम ने सीट बरकरार रखी. 2009 के चुनाव में हरियाणा जनहित कांग्रेस के राव नरेंद्र सिंह विजयी रहे थे.
बिकेश तिवारी