केंद्र सरकार ने हाल ही में बासमती चावल को छोड़कर सभी तरह के कच्चे चावल के निर्यात पर बैन लगाया है. इसका मतलब है कि देश बासमती के अलावा अब चावल की अन्य किस्मों का निर्यात नहीं करेगा. ऐसे में बासमती की खेती में किसानों की हल्की सी भी लापरवाही इसके एक्सपोर्ट पर बड़ा असर डाल सकती है. दरअसल, अमेरिका और यूरोपीय यूनियन समेत कई मुल्क केमिकल अवशेष मुक्त बासमती चावल की मांग करने लगे हैं. ऐसे में भारतीय किसानों के लिए कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं करना बड़ी चुनौती बन गया है.
कीटनाशकों के ना इस्तेमाल करना किसानों के लिए चुनौती
अधिकतर खरीफ फसलों की बुवाई जुलाई महीने में ही पूरी हो गई है. बासमती की रोपाई भी उसी दौरान हुई है. किसानों के लिए ये वक्त सबसे ज्यादा चुनौती वाला है. अगले कुछ महीने धान की फसल के लिए बेहद संवेदनशील हैं. इस दौरान धान की फसल पर कई तरह के रोग लगने की संभावनाएं बढ़ जाती है. इन रोगों से निपटने के लिए किसान रासायनिक कीटनाशकों का भी कई बार इस्तेमाल करते हैं. कई बार ऐसा होता है कि बासमती चावल में कीटनाशक अवशेष की मात्रा तय मानक से अधिक हो जाती है. फिर इसके एक्सपोर्ट में दिक्कत आती है.
कई सालों से बासमती एक्सपोर्ट में परेशानी का सामना कर रहा भारत
भारत से दुनिया भर में बासमती चावल का निर्यात 38,500 करोड़ रुपये से अधिक का हो गया है. इसे और बढ़ाने की कोशिश की जा रही है. हालांकि, किसानों द्वारा रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल इसकी राह में रोड़ा बना हुआ है. यूरोपीय यूनियन की एक ऑडिट रिपोर्ट आने के बाद भारत साल 2018 से ही बासमती के एक्सपोर्ट में परेशानी का सामना कर रहा है. तय मानक से अधिक कीटनाशक मिलने की वजह से यूरोपीय देशों में हमारा बासमती एक्सपोर्ट काफी घट गया है.
सरकार ने क्या उठाए कदम?
बासमती एक्सपोर्ट में कमी ना हो इसके लिए हाल ही में पंजाब सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए इस चावल के लिए खतरनाक माने जाने वाले 10 कीटनाशकों पर बैन लगा दिया है. इनमें एसेफेट, बुप्रोफेजिन, क्लोरपाइरीफोस, हेक्साकोनोज़ोल, प्रोपिकोनाज़ोल, थियामेथोक्सम, प्रोफेनोफोस, इमिडाक्लोप्रिड, कार्बेन्डाजिम और ट्राइसाइक्लाजोल नामक कीटनाशक शामिल हैं. पिछले साल उत्तर प्रदेश और हरियाणा सरकार ने भी कुछ इसी तरह का निर्णय लिया था. केंद्र सरकार भी अपनी तरफ से बासमती की खेती में कीटनाशक का इस्तेमाल रोकने के लिए जागरुकता कार्यक्रम चला रही है.
जैविक तरीके से करें बासमती चावल की खेती
सबसे पहले खेतों में रासायनिक खाद बंद की जाए. यह धीरे-धीरे भी कम की जा सकती है. खेतों में गोबर या फिर जैविक खाद डालने की आदत डालें. खेतों में एक-दो बार हल चलाया जाए ताकि मिट्टी समतल हो जाए और जन्त्री उसमें घुल जाए. धान के पौधे यानी पनीरी को रोग मुक्त बनाना जरूरी है. इसके लिए कृषि विशेषज्ञ की राय ली जा सकती है. अगर फसल पर कोई बीमारी आ जाए तो नीम के घोल का इस्तेमाल करें. पेस्टीसाइड से दूर रहें. अगर फसल पर पत्ता लपेट बीमारी का खतरा आए तो रस्सी या फिर लकड़ी पूरी फसल पर घुमाई जाए, कीट नीचे गिर जाएंगे. फसल को समय-समय पर जैविक खाद दी जाए. तीसरे साल अपनी बासमती एक दम जैविक हो जाएगी और इसका प्रमाण पत्र आप हासिल कर सकेंगे.
पूसा ने विकसित हैं रोगमुक्त 3 किस्में
पूसा ने बासमती की 3 नई किस्में विकसित की हैं. ये किस्में हैं बासमती 1847, पूसा बासमती 1885 और पूसा बासमती 1886 शामिल हैं. पूसा की ये तीनों नई किस्में पत्ती का जीवाणु झुलसा (Bacterial Leaf Blight) और झोका रोग (Blast Disease) से मुक्त हैं. इनमें ऐसे जीन हैं कि इनमें ये रोग नहीं लगेंगे. इन्हीं रोगों से निपटने के लिए ही किसान अपने खेतों में कीटनाशकों का स्प्रे करते हैं और फिर चावल में उसका अवशेष निकलता है. जिससे एक्सपोर्ट में दिक्कत आती है. इनकी बुवाई से बासमती के एक्सपोर्ट की समस्या से छुटकारा मिल सकता है.
सचिन धर दुबे