हिंदी में सिनेमा के बारे में नेत्रसिंह रावत, कुंवर नारायण और विष्णु खरे ने अपने लेखों से पाठकों को एक गहरी दृष्टि दी है. इसे समय-समय पर विनोद भारद्वाज, मंगलेश डबराल और प्रयाग शुक्ल ने भी अपने लेखों से समृद्ध किया है. प्रयाग शुक्ल की छवि मूलतः कवि, कथाकार और कला समीक्षक के तौर पर रही है लेकिन उनकी नई किताब जीवन को गढ़ती फिल्में, उन्हें एक गंभीर सिनेमा अध्येता के रूप में पेश करती है.
वैसे तो यह किताब मुख्यतः महान फिल्मकार सत्यजित रे को केंद्र में रखकर लिखी गई है. इसमें करीब दर्जन भर लेख सत्यजित रे पर लिखे गए हैं. इनमें उनके जीवन के अनछुए पहलुओं के साथ उनकी कई फिल्मों के मूल्यांकन और विश्लेषण के जरिये विश्व सिनेमा और भारतीय मानस तथा उसके यथार्थ को भी जांचने-परखने की की कोशिश की गई है.
सत्यजित रे और उनकी फिल्मों से प्रयाग शुक्ल का गहरा रिश्ता उनके कोलकाता प्रवास के कारण भी रहा है. इसने प्रयाग शुक्ल की सौन्दर्याभिरुचि को भी निर्मित करने का काम किया है. किताब में सत्यजित रे के अलावा विश्वप्रसिद्ध जापानी फिल्मकार कुरासोवा, फ्रांसीसी फिल्मकार त्रुफो और ऋत्विक घटक मृणाल सेन, मणि कौल, वासु भट्टाचार्य और जाहनू बरुआ की फिल्मो की भी चर्चा की गई है. इसके अलावा यह किताब सत्यजित रे के चित्रांकन और फिल्मों के रिश्ते को भी बताती है.
पाठकों को यह भी जानकारी मिलती है कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की डिस्कवरी ऑफ इंडिया किताब और विभूति भूषण बंदोपाध्याय की पाथेर पांचाली उपन्यास के रेखांकन-चित्रांकन करने के बाद सत्यजित रे के जीवन में सृजनात्मक ऊर्जा का संचार हुआ और उन्हें युवावस्था में यह भान हो गया था कि एक दिन वे विश्व के महान फिल्मकार बनेंगे. किताब में कुछ अन्तरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों और कुछ फिल्मों की भी समीक्षा की गई है. इसके साथ ही सिनेमा और चित्रकला से के संबंधों पर भी गहराई से विचार किया गया है.
इसमें एक जीवंत संस्मरण मकबूल फिदा हुसैन पर भी है. प्रयाग शुक्ल ने फिल्मों को देखने और उनपर लिखने में अपने जीवन के पांच दशक गुजारे हैं. इस किताब में नई पीढ़ी के फिल्म समीक्षकों को दिनमान के दिनों की पत्रकारिता की एक बानगी देखने को मिलेगी.
किताबः जीवन को गढ़ती फिल्में
लेखकः प्रयाग शुक्ल
प्रकाशकः अनन्य प्रकाशन
कीमतः 350 रुं.