हमारे दौर के महान भारतीय संगीतकार पंडित रवि शंकर अब हमारे बीच नहीं हैं. उनका निधन अगर जीवन की नश्वरता का आभास कराता है, तो उनके जीवन की भव्य प्रतिष्ठा उनकी छोड़ी विरासत की अमरता की याद भी दिलाता है. कैलिफोर्निया के सैन डिएगो में 11 दिसंबर को रबींद्र शंकर चौधरी के देहांत पर हम एक ऐसी असाधारण मेधा को याद करते हैं जिसके जीवन और प्रतिभा की छाप बीते नौ दशकों पर रही.
ग्लोबल मानस में भारतीय संस्कृति की छाप छोडऩे का जैसा काम इस करिश्माई बंगाली ब्राह्मण ने किया, वैसे विरले भारतीय ही होंगे. उन्होंने न सिर्फ दो सदियों को जिया, बल्कि इस दुनिया पर कई संदर्भों में अपना असर डाला: पूरब से लेकर पश्चिम तक, उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पुराने पर, नए पर, आधुनिकता पर, तो परंपरा पर भी.
अपने आखिरी समय तक चुस्त और फुर्तीले रवि शंकर ने बीती फरवरी बंगलुरू में एक कंसर्ट में प्रस्तुति दी थी. इसके बाद 21 जून को लंदन के खचाखच भरे बार्बिकन सेंटर में उन्होंने सोलो प्रस्तुति दी, जिसका अंत उन्होंने रबींद्रनाथ टैगोर की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में उन्हीं की एक रचना से किया था.
यहां हम लोग उन्हें रवि जी कहते थे. उनका जीवन इतिहास के टेढ़े-मेढ़े रास्तों से होकर यहां पहुंचा था. वे बमुश्किल 10 साल के थे जब अपने बड़े भाई उदय शंकर के पेरिस में भारतीय नृत्य समूह का हिस्सा बन गए. तीसरे दशक में वे फ्रेंच स्कूल में पढऩे गए, भाई उदय के बैले में उन्होंने छोटे-छोटे डांस किए.
इसी दौरान उनकी मुलाकात द्वितीय विश्व युद्ध के पहले के अमेरिका और यूरोप के रईसों से हुई. वे याद करते थे कि वे उन दिनों पेरिस, न्यूयॉर्क और हॉलीवुड के रईसों की चमकदार दुनिया का हिस्सा थे जहां उनकी मुलाकात कुछ महान लोगों से हुई. 12 वर्ष की उम्र में उनके नृत्य की सराहना न्यूयॉर्क टाइम्स के समीक्षक ने की थी.
रवि शंकर ने भाई उदय शंकर की पश्चिम से प्रेरित ‘‘रचनात्मक’’ नृत्य शैली की आरामगाह छोड़कर देर से ही सही हिंदुस्तान के एक छोटे-से कस्बे में रहने वाले उस्ताद अलाउद्दीन खां की शागिर्दी का उन्होंने जो फैसला लिया, वह उनकी दृष्टि की एक झ्लक देता है. रवि शंकर शायद भीतर ही भीतर इस बात को समझ रहे थे कि जीवन ने उन्हें यूरोप के अभिजात्य लोगों का मन बहलाने के लिए नहीं, बल्कि कुछ बड़ा करने के लिए चुना है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के दौर में टेक्नोलॉजी, उद्योग, हवाई यात्रा और मीडिया का फैलाव हुआ. इसी दौर में रवि शंकर वापस पश्चिम लौटे.
रवि शंकर ने पचास के दशक के मध्य से एक बार फिर पश्चिम का दौरा शुरू किया. इस बार वे सोलो सितारवादक की भूमिका में रहे. संगीत के ह्नेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने में उन्हें दशक भर का समय लगा और 1966 में बीटल्स के भारत आने के बाद रवि शंकर सितार के ग्लोबल सुपरस्टार बन गए. फिर जॉर्ज हैरिसन उनके समर्पित शागिर्द हो गए, इसके बाद की कहानी तो इतिहास ही है.
रवि शंकर ने 1967 के मोंटेरी पॉप फेस्टिवल में और 1969 में वुडस्टॉक में अपनी प्रस्तुति दी. दो साल बाद हैरिसन के साथ उन्होंने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वॉयर गार्डन में कंसर्ट फॉर बांग्लादेश आयोजित किया, जिसने एक नए बने राष्ट्र की बदहाली की तरफ पूरी दुनिया का ध्यान खींचा. तब तक वे अपनी पहली पत्नी अन्नपूर्णा देवी से अलग हो चुके थे और प्रेमिका कमला शास्त्री के साथ रहने लगे थे. अपनी पहली आत्मकथा उन्होंने लिखी माइ म्युजिक माइ लाइफ, जो बेस्टसेलर रही. उन्होंने पहला फिल्मी संगीत सत्यजित रे की पथेर पांचाली के लिए 1955 में ही दिया. शायद ही कुछ को याद हो कि इकबाल के सारे जहां से अच्छा की धुन भी रवि शंकर की ही बनाई हुई है.
रवि शंकर के संगीत का दायरा बहुत व्यापक और विविध है. यहूदी मेनुहिन के साथ वेस्ट मीट्स ईस्ट में उनके काम पर उन्हें ग्रैमी अवॉर्ड मिला. अपनी रचनात्मक उठापटक के बीच निजी जिंदगी में भी वे इसी रफ्तार से भागते रहे. बाद की अपनी दो आत्मकथाओं बांग्ला में राग-अनुराग और अंग्रेजी में राग माला में वे अपने लिए महिलाओं के प्रेम की जरूरत और अपनी प्रेमिकाओं के किए गए ‘‘छल’’ को लेकर काफी खुले रहे.
भारत में वे अपनी संगिनी कमला के साथ घूमते रहे जो सातवें दशक के अंत तक बनारस में रवि शंकर का काम संभालती रहीं. उधर अमेरिका में वे अपनी प्रेमिका सू जोंस के साथ रह रहे थे, जो डांसर और संगीतकार थीं और न्यूयॉर्क में रहती थीं. जब 1979 में बेटी नोरा जोंस के जन्म की खबर कमला तक पहुंची, तो वे रवि शंकर के जीवन से चुपचाप चली गईं और चेन्नै में जाकर रहने लगीं.
इसी दौरान रवि शंकर का एक प्रेम प्रसंग लंदन में सुकन्या राजन के साथ जारी रहा, जिन्होंने 1981 में बिटिया अनुष्का को जन्म दिया. पहली पत्नी अन्नपूर्णा से उन्हें एक बेटा था शुभो, जिसकी मृत्यु अमेरिका में 1992 में हुई.
रवि शंकर 1986-92 में राज्यसभा के लिए नामित किए गए. वे दिल्ली में सरकारी बंगले में रहे. जब उन्होंने अनुष्का की मां सुकन्या से हैदराबाद में 1989 में एक सादे समारोह में विवाह कर लिया तब सू जोंस के सब्र का बांध टूट गया. उन्होंने बेटी नोरा के साथ खुद को रवि शंकर से अलग कर लिया. नोरा जब 18 वर्ष की हुईं तो उन्होंने पिता से मिलने की पहल की.
बेशक, उनकी विरासत तानसेन और बेथोवन जैसी महान है. उनकी अंतरराष्ट्रीय शख्सियत और हमारे वैश्वीकृत समय के चलते यह भी संभव है कि उनकी विरासत कहीं ज्यादा यूनिवर्सल और कालजयी साबित हो.
एस. कालिदास