नई दिल्ली में 19 जनवरी को बीजेपी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक के चार महीने पहले ही नरेंद्र मोदी की टीम सक्रिय हो गई थी. बैठक में प्रधानमंत्री पद के दावेदार को अपना आर्थिक दर्शन पेश करना था. उनकी टीम तैयारी में जुट गई थी. उसने उद्योगपतियों, अर्थशास्त्रियों, आम लोगों के साथ-साथ वरिष्ठ बीजेपी नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और यशवंत सिन्हा की राय जानी. करीब 42,000 सुझाव आए.
इस प्रक्रिया से जुड़े बीजेपी के एक नेता का दावा है कि मोदी ने “खुद जो बेहतर समझते थे उससे अलग हटकर अपनी टीम को मुनासिब और व्यावहारिक खाका तैयार करने को कहा.” इस तरह, भारत को ‘महंगाई और धीमी प्रगति के मकडज़ाल से निकालने का व्यापक आर्थिक दर्शन तैयार हुआ.
इस आर्थिक नजरिए का खाका काफी पहले ही आकार लेने लगा था. सितंबर, 2013 में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के फौरन बाद उद्योगों के प्रति झुकाव वाले गुजरात के मुख्यमंत्री ने देश के उद्योग जगत से मेलजोल बढ़ाना शुरू कर दिया. उनसे दिसंबर में मिले एक उद्योगपति कहते हैं, “वे एकदम सटीक सलाह चाहते थे जिससे रोजगार सृजन हो और इन्वेस्टमेंट बढ़े. वे योजना आयोग जैसे ठस्स और नाकाम हो चुके विचार नहीं चाहते थे.” वे याद करते हैं कि बैठक में किसी ने मोदी से कहा कि 100 आधुनिक शहर बनाने का विचार व्यावहारिक नहीं है. वे तपाक से बोले, “मलेशिया, चीन और थाईलैंड कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं?”
आर्थिक नीतियों को आकार देने का काम जारी है क्योंकि बीजेपी टैक्स सुधारों और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) पर रणनीति अभी तैयार ही कर रही है. पार्टी प्रतिरक्षा और इन्फ्रास्ट्रक्चर में तो विदेशी निवेश की हिमायती है लेकिन खुदरा बाजार में विदेशी निवेश को लेकर उसकी आशंकाएं हैं. बीजेपी शासित राजस्थान ने 1 फरवरी को खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को खारिज कर दिया. अपने राज्य गुजरात में उद्योग घरानों को आकर्षित करने वाले मोदी भी खुदरा व्यापार में एफडीआइ के मामले में पार्टी की लाइन के साथ हैं. उनका भी मानना है कि इससे छोटे दुकानदारों को नुकसान होगा. उनका आर्थिक दर्शन उद्योग-व्यापार में न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप का हिमायती है. वे बार-बार कहते हैं कि सरकार का कारोबार से क्या काम, बल्कि उसका काम सुविधाएं मुहैया कराने का है. दिल्ली की बैठक में मोदी ने कहा, “भारत में तरक्की के लिए सुशासन पर जोर देने की आवश्यकता है.”
उनके मुताबिक सुशासन के तीन स्तंभ हैं—नीतियों में स्पष्टता, निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता और अमल में तेजी. मोदी गुजरात मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करना चाहते हैं जिसने उनकी छवि विकास पुरुष की बनाई है. इसके केंद्र में गांव छोड़ रहे लाखों लोगों के रोजगार के लिए शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास करना है. मोदी को आर्थिक दर्शन तैयार करने में मदद करने वाले बीजेपी के कोषाध्यक्ष पीयूष गोयल कहते हैं, “हमारे शहरों पर जरूरत से ज्यादा बोझ है, उनका इन्फ्रास्ट्रक्चर और अधिक दबाव नहीं झेल सकता.” गोयल कहते हैं कि 100 नए स्मार्ट शहर जुड़वा शहर होंगे या उन दूर-दराज के इलाकों में होंगे जहां इन्फ्रास्ट्रक्चर तो नहीं है पर लोगों में कौशल है, गुडग़ांव या नवी मुंबई की तरह नहीं.
ऐसी योजना कागज पर बनाना तो आसान है लेकिन इसे जमीन पर उतारना मुश्किल है क्योंकि इसकी कीमत भारी है. न मोदी, न गोयल इसके आंकड़ों के विस्तार में जाते हैं. लेकिन इस उदाहरण से अंदाजा लगाइए. कोरिया में 80 वर्ग किलोमीटर टेक सीटी की योजना 264 अरब डॉलर की है. कई लोगों का मानना है कि निजी-सार्वजनिक साझेदारी से यह संभव हो सकता है. मुंबई स्थित डेवलपर निरंजन हीरानंदानी कहते हैं, “सरकार को इलाके सूचीबद्ध करके बुनियादी सुविधाओं का निर्माण करना है. उसके बाद इन्वेस्टर्स ऑफिस, स्कूल, अस्पताल वगैरह बना लेंगे.” योजना आयोग के पूर्व सदस्य तथा राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के वर्तमान सदस्य एन.सी. सक्सेना का मानना है कि पैसा बेहतर कराधान से उठाया जा सकता है. वे बताते हैं कि भारत में टैक्स और जीडीपी का अनुपात दुनिया में सबसे कम है. हमारे यहां यह अनुपात 15 प्रतिशत है जबकि चीन और ब्राजील में करीब 30 प्रतिशत है. बीजेपी ने हाल में पुणे आधारित टैक्स विरोधी समूह अर्थक्रांति के प्रस्ताव पर विचार किया कि कस्टम ड्यूटी के अलावा सभी टैक्सेज की जगह बैंक लेन-देन पर 2 प्रतिशत ड्यूटी लेने से 40 लाख करोड़ रु. तक इकट्ठा हो सकते हैं जबकि अभी टैक्स संग्रह 10 लाख करोड़ रु. के करीब है. यह प्रस्ताव पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को नहीं भाया.
दूसरा मुद्दा महंगाई का है. बीजेपी का मानना है कि महंगाई पर माल आपूर्ति को संचालित करके काबू में किया जा सकता है, न कि आरबीआइ के मुद्रा आपूर्ति पर अंकुश लगाकर मांग को रोकने जैसे प्रावधानों से. मोदी की योजना कृषि उपज के आंकड़ों को “सही समय में दुरुस्त करने की व्यवस्था बनाने की है ताकि आयात या निर्यात का उचित फैसला हो सके.” गोयल के मुताबिक यह तरीका पहले भी काम आ चुका है. वे कहते हैं, “1998 में जब वाजपेयी सत्ता में आए तो महंगाई दहाई अंकों में थी. छह वर्ष में इन मुद्दों पर तवज्जो दी गई तो 2004 में जब बीजेपी सत्ता से हटी तो महंगाई 3-4 प्रतिशत पर आ गई थी.”
इसे संभव बनाने के लिए भारत में बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी को आकर्षित करने की दरकार है. इसके लिए मोदी पांच टी की बात करते हैं यानी ट्रेडिशन (परंपरा), टैलेंट (प्रतिभा), ट्रेड (व्यापार), टूरिज्म (पर्यटन) और टेक्नोलॉजी (तकनीक). इससे ब्रांड इंडिया को प्रोत्साहन मिलेगा. 2013 में भारत ने लेट-लतीफी, भ्रष्टाचार और उलझन भरी नीतियों की वजह से 1 लाख करोड़ रु. की इन्वेस्टमेंट गंवा दी. एफडीआइ 2011-12 के 46.6 अरब डॉलर के मुकाबले 2012-13 में 36.9 अरब डॉलर ही आई.
लेकिन आलोचक तो असहमत हैं. वे इस विचार को भारतीय वास्तविकताओं के मद्देनजर दूर की कौड़ी मानते हैं. उनका देश के आर-पार बुलेट ट्रेन चलाने का प्रस्ताव काफी महंगा है. दुरंतो में जो यात्रा 755 रु. में की जाती है, बुलेट ट्रेन में वह 2,500 रु. में संपन्न होगी. 2,00,000 ग्राम पंचायतों को ब्रॉडबैंड कनेक्टीविटी की योजना पहले से ही चल रही है. 120 अरब डॉलर में नदियों को जोडऩे की योजना न सिर्फ बेहद खर्चीली है, बल्कि उसका पर्यावरण पर असर भी भारी होगा और बड़े पैमाने पर आबादी का विस्थापन होगा. जहां तक हायर एजुकेशन का मामला है, पहले ही उस मद में भारी खर्च हो रहा है. वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के मुताबिक मोदी महत्वपूर्ण आर्थिक मुद्दों से बचते हैं. वे पूछते हैं, “वे वित्तीय घाटे, चालू खाते के घाटे या मुद्रा नीति की बात क्यों नहीं करते?” वे यह सवाल भी करते हैं कि गुजरात और मध्य प्रदेश गुड्स और सर्विसेज टैक्स का विरोध क्यों करते हैं और मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआइ से कैसे रोजगार नष्ट होगा?
फिर भी, ऐसा लगता है कि मोदी दर्शन के समर्थक आलोचकों पर भारी पड़ रहे हैं. हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी के सीएमडी अजित गुलाबचंद कहते हैं, “कांग्रेस के नेहरूवादी समाजवाद से यह स्वागत योग्य बदलाव है. वे अच्छा विकल्प दे रहे हैं इसलिए वे एक मौका पाने के असली हकदार हैं.”
aajtak.in