महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे नई सियासी पारी जरुर शुरू करने जा रहे हैं, लेकिन उनके इस कदम का मलाल कांग्रेस से ज्यादा यदि कोई मनाएगा तो वो है शिवसेना. क्योंकि जिस पार्टी ने उन्हें कभी सीएम की गद्दी पर बैठाया आज उसी पार्टी को राणे कांटे की तरह चुभ रहे हैं.
दरअसल, नारायण राणे और शिवसेना के बीच दरार परिवारवाद से उपजी. बात 18 साल पहले की है जब नारायण राणे मुख्यमंत्री हुआ करते थे. उस वक्त मनोहर जोशी की जगह बाल ठाकरे ने नारायण राणे को सीएम बनाया था. करीब नौ महीने तक सीएम पद पर काबिज रहने के बाद राणे और बाल ठाकरे के बेटे उद्धव के बीच खींचतान होने लगी.
राणे को शिवसेना का रिमोट कंट्रोल से चलने वाला सीएम कहा जाता था. क्योंकि असली बागड़ोर उस वक्त उद्धव संभालने लगे थे. इसके बाद भाजपा - शिवसेना गठबंधन चुनाव हार गया और राणे विपक्ष के नेता बन गए. फिर 2005 में राणे को पार्टी से बाल ठाकरे ने यह कहते हुए निकाल दिया कि नेता हटाने और चुनने का अधिकार शिवसेना में मुझे ही है. जाहिर है कि बाल ठाकरे उस वक्त उद्धव को आगे बढ़ाना चाहते थे.
शिवसेना से निकाले जाने के बाद राणे ने कांग्रेस का दामन थाम लिया और मंत्री भी बने. पार्टी छोड़ने के बाद उन्हें शिवसैनिक 'मुर्गी चोरी' कहकर बुलाने लगे. यहां तक कि 2015 में बांद्रा-पूर्व सीट के उप चुनाव में राणे की हार होने के बाद शिवसैनिकों ने मुर्गियां हाथ में लेकर राणे की हार का जश्न मनाया था. हालांकि, अब राणे कांग्रेस से भी बगावत कर बीजेपी का दामन थाम चुके हैं.
राणे के बीजेपी में जाने से पहले ही शिवसेना का दुख शायद तब छलक पड़ा था जब शिवसेना सांसद ने पेट्रोल-डीजल के बहाने बीजेपी से गठबंधन तोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया था. यही नहीं, मीडिया में आई ख़बरों की मानें तो पार्टी सुप्रीमो उद्धव ठाकरे ने शिवसेना के 63 विधायकों के साथ बीजेपी से समर्थन वापस लेने पर भी चर्चा की थी, लेकिन विधायकों ने हाथ खड़े कर दिए.
आदित्य बिड़वई