इस नई स्वास्थ्य योजना ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीको दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती-यानी भारत की स्वास्थ्य सेवा—के आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया है.
स्वास्थ्य सेवासुलभ होने के मामले में भारत दुनिया के 195 देशों में 154वींपायदान पर हैं. यहां तक कि यह बांग्लादेश, नेपाल, घानाऔर लाइबेरिया से भी बदतर हालत में है. स्वास्थ्य सेवा पर भारत सरकार का खर्च(जीडीपी का 1.15 फीसदी) दुनिया के सबसे कम खर्चों में से एक है. देशमें स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे और इस क्षेत्र में काम करने वालों कीबेतहाशा कमी है
आइए, जानते हैं कि सेहत की सुविधाओं के मामले में क्या है भारत का मर्ज?
दरअसल, बढ़ती बीमारियों और नाकाफी स्वास्थ्य सुविधाओं से समस्या अधिक गंभीर हुई है. भारत में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च सबसे कम है. स्वास्थ्य सेवा उपलब्धता के मामले में प्रति डॉलर प्रति व्यक्ति सरकारी खर्च की बात की जाए, तो भारत में यह 1995 में 17 डॉलर था जो 2013 में 69 और 2017 में 58 डॉलर प्रति व्यक्ति सालाना हो गया.
दूसरे देशो के साथ तुलना की जाए तो हम इस मामले में बेहद, बेहद पीछे खड़े हैं.
मलयेशिया में यह खर्च 418 डॉलर है, जबकि हमारे प्रतिद्वंद्वी चीन में 322, थाइलैंड में 247 फिलीपींस में 115, इंडोनेशिया में 108, नाइजीरिया में 93 श्रीलंका में 88 औक पाकिस्तान में 34 डॉलर है.
स्वास्थ्य के सेक्टर में जीडीपी के प्रतिशत के तौर पर अगर सरकारी खर्च के आंकड़े देखे जाएं, तो वहां भी हम कहीं नहीं ठहरते.
भारत में 1995 में यह 4.06 फीसदी था जो 2013 में घटकर 3.97 फीसदी हुआ और 2017 में और भी घटता हुआ 1.15 फीसदी हो गया. दूसरे देशों से अगर तुलना की जाए तो अमेरिका में यह जीडीपी का 18 फीसदी, मलयेशिया में 4.2 फीसदी, चीन में 6, थाइलैंड में 4.1 फीसदी, फिलीपींस में 4.7 फीसदी, इंडोनेशिया में 2.8, नाइजीरिया में 3.7 श्रीलंका में 3.5 और पाकिस्तान में 2.6 फीसदी है.
इन आंकड़ों को गौर से देखिए और तब अपने नजदीकी अस्पतालों की हालत की पड़ताल करें, तो आपको साफ हो जाएगा कि उनकी हालत इतनी बुरी क्यों है.
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मंजीत ठाकुर