किस के संस्थापक डॉ. अच्युत सामंत का फलसफा है ''आर्ट ऑफ गिविंग"

सालाना 25,000 गरीब आदिवासी बच्चों को मुफ्त रोजगारपरक तालीम दे रहा एक संत शिक्षाकर्मी.

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किस के संस्थापक डॉ. अच्युत सामंत किस के संस्थापक डॉ. अच्युत सामंत

महेश शर्मा

  • भुवनेश्वर,
  • 11 अगस्त 2016,
  • अपडेटेड 4:40 AM IST

महज चार साल की उम्र में उनके सर से पिता का साया उठ गया. वे ओडिशा के कटक जैसे बेहद पिछड़े जिले के दूरदराज के एक गांव में जन्मे थे. परिवार चलाने के लिए वे सब्जी बेचकर विधवा मां का सहारा बने, लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी. आसपास के हालात देखकर उनके भीतर खासकर शिक्षा के क्षेत्र में कुछ असाधारण करने का संकल्प पैदा हुआ. एमएससी (रसायन) करने और उत्कल विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में कुछ समय पढ़ाने के दौरान डॉ. अच्युत सामंत इस बारे में लगातार विचार मंथन करते रहे और फिर एक दिन उन्होंने कदम बढ़ा दिए.

सन् 1992-1993 में 5,000 रु. की पूंजी और 12 छात्रों से उन्होंने भुवनेश्वर में कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी (कीट) की स्थापना की, जिसकी पूंजी आज 800 करोड़ रु. है. कीट चल पड़ा तो 51 वर्षीय सामंत को असली लक्ष्य का क्चयाल आया—गरीब आदिवासी बच्चों को पहली कक्षा से स्नातकोत्तर तक की तालीम, छात्रावास और भोजन निःशुल्क मुहैया कराना. इसके लिए उन्होंने 1997 में डीम्ड विश्वविद्यालय कीट के तहत कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (किस) की स्थापना की. इसके पास आज 25 वर्ग किमी का कैंपस है और कुल 22 इको फ्रेंड्ली इमारतें हैं. आज किस में केजी से पीजी तक 25,000 बच्चे पढ़ते हैं.

इस तरह से इतने बड़े पैमाने पर आदिवासी बच्चों को फ्री तालीम देने वाला यह संसार का सबसे बड़ा संस्थान है. प्लेसमेंट का यहां का रिकॉर्ड बहुत अच्छा है. इंजीनियरिंग, एमबीए, मेडिकल जैसी तालीम के बाद यहां के बच्चे बेहतर पेशों में जाते हैं. और हां, तीरंदाजी में भी वे राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर नाम कमा रहे हैं. दिल्ली में मुख्यमंत्री रहते शीला दीक्षित ने उनसे मदद लेकर राजधानी में भी ऐसा ही इंस्टीट्यूट शुरू किया. अब वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सदस्य भी हैं.

सामंत के पास जायदाद के नाम पर कुछ भी नहीं है. उनकी न्यूनतम जरूरतों का खर्च विश्वविद्यालय उठाता है. उनका बैंक बैलेंस भी शून्य है. किस को चलाने के लिए वे एक पैसा भी चंदा नहीं मांगते. लोग अपनी मर्जी से देते हैं. परिसर में वे साइकिल से या पैदल घूमते हैं और जिस शिक्षक के रूम में बैठ जाएं वही उनका ऑफिस. किस में तो वे पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठकर ऑफिस चलाते हैं.

उनके यहां 10,000 कर्मचारी हैं और सामंत पर उनकी आस्था का आलम यह है कि सारा स्टाफ कुल वेतन का तीन प्रतिशत हर महीने संस्था को अनुदान दे देता है. इस जज्बे को देखकर लगता है कि दो हजार साल पहले कलिंग की एक खौफनाक लड़ाई ने सम्राट अशोक के हृदय परिवर्तन के जरिए भारत का इतिहास मोड़ दिया था, आज उसी कलिंग में अशिक्षा के खिलाफ एक नई लड़ाई चल रही है और इसके नायक हैं डॉ. अच्युत सामंत.

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