नेताजी सुभाषचंद्र बोस की अकेली संतान अनिता बोस फॉफ जर्मनी के ऑग्सबर्ग में अर्थशास्त्री हैं. उन्होंने भारत सरकार द्वारा नेताजी से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने के मुद्दे पर संदीप उन्नीथन से बातचीत की. उन्होंने अपने पिता के आखिरी पलों को लेकर बोस परिवार के बीच भी मतभेद होने की ओर इशारा किया. उन्होंने इस बात को निर्णायक रूप से पुष्ट करने के लिए डीएनए टेस्ट कराने की भी मांग की है कि जापान में रेंकोजी मंदिर में रखी अस्थियां नेताजी की हैं, और कहा है कि विवाद को खत्म करने के लिए अस्थियों को भारत ले आना चाहिए.
प्रः आप नेताजी से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक किए जाने से कितनी संतुष्ट हैं?
उः कई इतिहासकार व शिक्षाविद वर्षों से इन दस्तावेजों को सार्वजनिक किए जाने की मांग कर रहे हैं, इसलिए यह किया जाना बेहतर ही था. अब उनमें से कुछ फाइलों को देखने के बाद, मुझे यह समझ नहीं आ रहा है कि आखिर क्यों कुछ खास फाइलों को गोपनीय बनाकर रखा गया था.
प्रः क्या फाइलों को सार्वजनिक करने से आपके पिता की मौत को लेकर चल रहा विवाद खत्म हो जाएगा?
उः इससे विवाद तो खत्म नहीं होगा क्योंकि आप कितने भी साक्ष्य लाकर सामने रख दें, लेकिन कुछ लोग उन पर यकीन ही नहीं करेंगे. सभी उपलब्ध साक्ष्य इस तथ्य की ओर इशारा करते हैं कि मेरे पिता विमान दुर्घटना के बाद कुछ ही घंटे तक जीवित रहे. मेरी समझ से तो जिन फाइलों को अभी सार्वजनिक किया जाना बाकी है, उनसे भी कोई नाटकीय जानकारी सामने आने वाली नहीं है. लेकिन फिर भी देखते हैं कि अब और क्या रहस्य सामने आते हैं.
प्रः जापान में आपके पिता की अस्थियों को लेकर चल रहे विवाद का क्या होगा?
उः मैं निजी तौर पर यह महसूस करती हूं कि उनका डीएनए परीक्षण किया जाना चाहिए. आजकल डीएनए प्रौद्योगिकी इतनी उन्नत हो गई है कि यह बताना मुमकिन है कि वे अस्थियां किसकी हैं. कम से कम तार्किक लोगों के लिए तो इससे इस मसले पर विराम लग जाएगा और वे इसे स्वीकार कर लेंगे (कि ये अस्थियां नेताजी की हैं), खास तौर पर मेरे परिवार के लोग. मंदिर के पुजारी भारत और जापान, दोनों सरकारों की इजाजत के बिना इसके लिए रजामंद नहीं होंगे. डीएनए परीक्षण की बात जस्टिस मुखर्जी कमिशन ने भी कही थी. और फिर, अगर वे अस्थियां नेताजी की नहीं हैं, तो भी इससे यह बात तो सिद्ध नहीं हो जाती कि विमान हादसा हुआ ही नहीं था.
प्रः कई शोधकर्ता कहते हैं नेताजी भारत में साधु बनकर रहे थे?
उः मैं गुमनामी बाबा को लेकर इस बकवास में विश्वास नहीं करती. अगर मेरे पिता अपने परिवार के सदस्यों के संपर्क में नहीं थे तो फिर वे भारत आए ही क्यों होंगे? जस्टिस मुखर्जी कमिशन ने भी यही निष्कर्ष निकाला था कि गुमनामी बाबा नेताजी नहीं थे.
प्रः कोई ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब अभी तक आपको नहीं मिले हैं?
उः हां, कुछ बातें हैं जिनको जानने में मेरी बहुत रुचि है. आजाद हिंद फौज के पूर्व सेनानियों के साथ भेदभाव करने का फैसला किसका था और क्यों? वह गलत फैसला था. जर्मनी के एकीकरण के बाद पूर्वी जर्मनी की सेना तक को जर्मन सेना में मिला लिया गया था. आजाद हिंद फौज के सेनानियों को तो 1970 के दशक तक स्वतंत्रता सेनानी तक घोषित नहीं किया गया था.
संदीप उन्नीथन