''आप ऐसे कैसे रोक सकते हैं मुझे? मैं कोई टेररिस्ट नहीं हूं, पैसे देकर डेलिगेट बना हूं. बुलाइए आर्गनाइजर को...'' ऐसे तनाव और उत्तेजना भरे मौके अक्सर बनते रहे पणजी (गोवा) में पिछले हफ्ते संपन्न भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह (आइएफएफआइ) के स्वर्ण जयंती आयोजन में. ब्रिटेन में सामाजिक विसंगतियों को पकडऩे वाले स्वतंत्र फिल्मकार केन लोआच की ताजा फिल्म सॉरी वी मिस्ड यू का शो 1,000 सीटों की क्षमता वाले कला अकादमी सभागार में था. हालत यह हुई कि मौके पर टिकट के लिए भरी दुपहरी में घंटों लाइन में लगने के बावजूद पुलिस और बाउंसरनुमा मुस्टंडों ने सैकड़ों फिल्मप्रेमियों को धकेल और धमकाकर भगा दिया. सारे टिकट/पास पहली बार ऑनलाइन कर दिए जाने की बात बहुतों को मौके पर ही पता चली. ''मैं मिनिस्ट्री ऑफिशियल हूं,'' ''मीडिया कोटे से देखिए'' जैसी दलीलों पर भी काउंटर से 'सॉरी' के अलावा कुछ न मिला. ऐसे में अकादमी और जीएमसी ओल्ड बिल्डिंग परिसर से सटे आइनॉक्स के चार सभागारों (करीब 1,200 सीटें) में सुबह आठ से रात दो बजे तक लोआच, पेद्रो अल्मोदोवोर, फतेह अकिन जैसे चर्चित फिल्मकारों की फिल्मों के टिकट मिल पाना ही उपलिब्ध हो गया था. नेट और दूसरे माध्यमों पर फिल्मों की पड़ताल कर लेने वाले चतुर टेक्नोसैवी डेलीगेट एक दिन पहले बुकिंग खुलते ही मोबाइल के जरिए काम तमाम कर डालते.
पर फिल्में देख पाने वालों के पास बहस के अपने मुद्दे बन रहे थे. और ये मुद्दे सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशक के फिल्मोत्सवों में छाए रहने वाले मुद्दों से अलग थे. तब गुटनिरपेक्ष देशों का सिनेमा, चीन और पाकिस्तान का सिनेमा, गरीबी का महिमामंडन जैसे मसले उठा करते थे. और सेक्स तो साठ के दशक से अभी 2009-10 तक के समारोहों में गदर मचाता आया था. पर अब आतंकवाद, हिंसा, विस्थापन और सबसे बढ़कर तथाकथित धर्म का कहर मुद्दे हैं. खासकर बाल्कन क्षेत्र के युवा फिल्मकार वहां के नस्लीय नरसंहार और मानवीय त्रासदी के किस्सों को लेकर आ रहे हैं. फुटबॉल और टेनिस की ग्रैंडस्लैम स्पर्धाओं में ध्यान खींचने के बाद बाल्कन प्रतिभाएं अब सिनेमा को समृद्ध करने आ पहुंची हैं. सर्बिया के मिरोस्लाव टर्जिच स्टिचेज में दो दशक पहले अस्पताल से चुराए गए अपने नवजात का पता लगाने की एक अधेड़ मां की कहानी बड़े ही शांत अंदाज में कहते हैं. स्लोवेनिया की तेवना स्ट्रगर मितेव्स्का मर्दवाद और धार्मिक रुढिय़ों से एक साथ मुचैटा लेती हैं गॉड एक्जिस्ट्स, हर नेम इज पेत्रूनिया में. मोटी बदशक्ल बेरोजगार लड़की पेत्रूनिया एक पारंपरिक आयोजन के दौरान नदी में फेंके गए सलीब को पा लेती है. कड़कड़ाती ठंड में उसे लूटने को जमे सैकड़ों पुरुषों और परोक्ष रूप से परंपरा को भी इस तरह ललकारती हुई वह मॉब लिंचिंग की जद में आ पहुंचती है. यहां तक कि मराठी फिल्मकार शिवाजी पाटील भी भोंगा (मराठी) में लाउडस्पीकर पर नमाज पढऩे के मुद्दे को शिद्दत से रेखांकित करते हैं. एक बीमार शिशु की जान बचाने को मुअज्जिन से बिना लाउडस्पीकर के नमाज पढऩे या उसका मुंह दूसरी ओर करने की गुजारिश काम नहीं आती. अंत में शिशु की मौत हो जाने पर मुअज्जिन को मिट्टी में शामिल नहीं होने दिया जाता.
इस तरह की तमाम फिल्में आज के चलन के अनुरूप सच्चे वाकयों से सूत्र लेकर किस्सा बुन रही हैं. और इनमें सबसे ऊपर बैठती है फ्रांस्वां ओजों की बाइ द ग्रेस ऑफ गॉड. 2016 में 70 बच्चों के साथ दुराचार के आरोपी फादर प्रैनेट पर केंद्रित इस फिल्म में उसका नाम तक नहीं बदला गया है. कभी उसका शिकार हुए और अब तीन बच्चों के पिता एलेक्जेंडर उसका कच्चा चिट्ठी सामने लाने को कमर कसते हैं. कला अकादमी में रात डेढ़ बजे तक चलने और परदे पर संवाद बारात के बताशों की मानिंद लगातार बरसते रहने के बावजूद 500 से ज्यादा दर्शक इसे देख रहे होते हैं.
इन सबसे इतर वह जीवंत दृश्य ज्यादा अहम था जो सिनेमा के इतिहास की प्रदर्शनी में घटा: प्राइमरी स्कूल से आई टोली को एक वालेंटियर वीडियो के जरिए लूमियर ब्रदर्स से शुरू हुए सिनेमा के सफर के बारे में समझा रही है. उससे बेखबर, टोली की 5-6 साल की दो बच्चियां पीठ पर बस्ता उचकाते एक-दूसरे का रीबन खींचते हुए गुदगुदी कर रही हैं. पीछे दीवार पर श्याम बेनेगल का एक वाक्य टंगा है: सिनेमा टेक्नॉलोजी की संतान है.
शिवकेश मिश्र