Dussehra 2022: जब हम महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों को पढ़ते हैं, तो हमारा ज्यादा ध्यान नायकों और खलनायकों पर जाता है. हम उन पात्रों पर कभी ध्यान नहीं देते हैं, जिनका किरदार इन दोनों खांचों में नहीं आता. ऐसा ही एक पात्र था रावण का बेटा इंद्रजीत यानी मेघनाद. इंद्रजीत था तो रावण की सेना में लेकिन वह बहुत ही शक्तिशाली, निपुण और वफादार था. उसके सामने तमाम शक्तिशाली देवता भी कमतर पड़ जाते थे. आइए जानते हैं इंद्रजीत की कहानी.
1. रावण का निपुण पुत्र
जैसा कि हम जानते हैं रावण बेहद शक्तिशाली था. सभी अहंकारी लोगों की तरह वह भी एक निपुण बेटा चाहता था. उस समय रावण ने हर चीज़ जीत ली थी. रावण के डर से ग्रहों ने ऐसा समय तैयार किया, जिससे रावण का बेटा शुभ समय पर पैदा हुआ. इसके कारण रावण के बेटे को अच्छा जीवन मिला.
2. ऐसा बच्चा जिसके रोने से आसमान में गड़गड़ाहट सुनाई दी
रावण के बेटे को जन्म रावण की पत्नी मंदोदरी ने दिया था. और जब उसका जन्म हुआ तो उसकी चीखें गड़गड़ाहट की तरह सुनाई दीं. इसलिए उसका नाम मेघनाद रखा गया.
3. सबसे शक्तिशाली योद्धा बनने की तैयारी
मेघनाद को शुक्र देव ने शिक्षा दी थी. शुक्र असुरों के गुरु थे. उनके कई प्रसिद्ध शिष्य भी थे. उनके कुछ प्रसिद्ध शिष्य थे जैसे प्रह्लाद, बाली और भीष्म. शुक्र ने उन्हें युद्ध के सभी रहस्य सिखाए. मेघनाद ने उनसे सभी हथियारों और रणनीतियों के बारे में सीखा. इसमें उन्होंने महारत हासिल की. युद्ध कलाओं के अलावा मेघनाद ने जादू-टोने की कलाएं भी सीखीं जो उस समय बहुत ही कम लोगों को आती थी.
4. इंद्र को हराकर स्वर्ग पर विजय
देव और असुर हमेशा से एक दूसरे के खिलाफ लड़ते थे. इनमें से एक युद्ध में रावण और मेघनाद ने भी भाग लिया था. युद्ध के दौरान, रावण हार गया और बेहोश हो गया. मेघनाद ने गुस्से में आकर इंद्र से युद्ध किया. उसने इंद्र को हरा दिया और उसे अपने रथ से बांधकर धरती पर ले गया. ब्रह्मा जी को डर था कि मेघनाद देवताओं के राजा इंद्र को मार सकता है. इसलिए, ब्रह्मा जी ने मेघनाद को वरदान के बदले इंद्र को रिहा करने के लिए कहा.
5. किसी भी युद्ध में पराजित न होने का वरदान
मेघनाद ने अमरता का वरदान मांगा. ब्रह्मा ने कहा कि यह प्रकृति के नियमों के खिलाफ है. इसलिए, ब्रह्मा ने उन्हें युद्ध में पराजित न होने का वरदान दिया. मेघनाद को वरदान मिला कि उसे कभी कोई हरा नहीं पाएगा. लेकिन एक शर्त पर कि उसे युद्ध पर जाने से पहले एक यज्ञ करना होगा और अपनी आराध्य देवी की पूजा करनी होगी. इंद्र को हराने के कारण ही ब्रह्मा जी ने मेघनाद का नाम इंद्रजीत रखा था.
6. रामायण के युद्ध के समय उसने अकेले वानर सेना को हराया
रावण की हार और कुंभकर्ण के मारे जाने के बाद ही इंद्रजीत ने युद्ध में प्रवेश किया. उसने अपने सभी भाइयों को युद्ध में खो दिया था. वह अजेय था. जिस दिन उसने युद्ध में प्रवेश किया, उसी दिन उसने राम की सेना में अपना आतंक फैला दिया. युद्ध के दौरान उसे कोई पराजित नहीं कर पा रहा था.
7. उसने हनुमान जी को भी हराया
हनुमान जी, जो कि धरती पर सबसे ताकतवर थे. उन्हें भी ब्रह्मास्त्र का उपयोग करके इंद्रजीत ने हरा दिया था.
8. राम
राम जो कि विष्णु जी के अवतार थे, उनकी हार भी तब हुई. जब इंद्रजीत ने राम जी पर अपने सबसे शक्तिशाली हथियारों में से एक नागपाश को छोड़ दिया. उस हथियार ने राम और लक्ष्मण के शरीर के चारों ओर लपेटे हुए एक लाख सांपों को छोड़ दिया. जिससे वे हार गए. गरुड़ ने उनकी जान बचाई.
9. लक्ष्मण भी दो बार हारे
राम और लक्ष्मण को दोबारा पराजित करने के लिए उसने अपनी जादू-टोने की कला का सहारा लिया. इससे राम और लक्ष्मण के लिए उसे मारना बहुत कठिन हो गया था क्योंकि इंद्रजीत बार बार गायब हो रहा था. राम और लक्ष्मण अगली बार भी उसे पराजित नहीं कर सके. इंद्रजीत ने ब्रह्माण्ड अस्त्र बनाया था जो कि सबसे खतरनाक हथियार था. उस हथियार ने राम और लक्ष्मण की पूरी सेना को बेहोश कर दिया था. यही कारण था कि हनुमान जी को सब के लिए संजीवनी का पौधा प्राप्त करने के लिए हिमालय जाना पड़ा था.
10. राम की सेना का मनोबल टूटा
अगले दिन इंद्रजीत को आश्चर्य हुआ कि राम और लक्ष्मण अभी भी जीवित थे. इसलिए उसने पूरी सेना का मनोबल गिराने के लिए एक योजना बनाई. उसने सीता के भ्रम को असली दिखाया. हर कोई उसे सही समझ रहा था. फिर उसने पूरी वानर सेना के सामने सीता के माया रूप का वध कर दिया. यह खबर सुनकर राम वहीं गिर गए. बाकी वानर सेना भी टूट गई.
11. राम को इंद्रजीत का रहस्य पता चला
इंद्रजीत को लगा कि वह ये युद्ध आसानी से नहीं जीत पाएगा. इसलिए, उसने सोचा कि युद्ध में प्रवेश करने से पहले यज्ञ किया जाए. रावण के भाई विभीषण एक अच्छे व्यक्ति थे. उनका मानना था कि सीता का अपहरण बिल्कुल भी सही नहीं था. उन्होंने राम और लक्ष्मण को इंद्रजीत के अजेय होने का रहस्य बता दिया. जिसके बाद हनुमान ने लक्ष्मण के साथ मिलकर उनका यज्ञ भंग कर दिया था. उस यज्ञ को करने का एक नियम यह भी था कि पूजा स्थल पर शस्त्र न हो. लक्ष्मण ने इस नियम को भी तोड़ने की कोशिश की.
12. निडर होकर उसने अगले दिन लक्ष्मण के खिलाफ सबसे भयानक हथियार उतारे
लक्ष्मण के अपनी देवी का अपमान करने और विभीषण के धोखे की वजह से इंद्रजीत को बहुत गुस्सा आया. उन्होंने विभीषण को भी मारने का संकल्प लिया लेकिन लक्ष्मण ने विभीषण को बचा लिया. युद्ध के अंत में इंद्रजीत ने सारी सृष्टि के तीन सबसे शक्तिशाली हथियारों के इस्तेमाल किया - ब्रह्माण्ड अस्त्र, पाशुपतास्त्र और वैष्णवस्त्र. इन परम अस्त्रों में से एक भी लक्ष्मण को छू तक नहीं पा रहा था.
13. राम कोई साधारण इंसान नहीं
वैष्णवस्त्र - विष्णु का हथियार. जिसने लक्ष्मण को बिना नुकसान पहुंचाए उनकी परिक्रमा की. इंद्रजीत को समझ आ गया कि लक्ष्मण और राम कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं. उन्होंने अपनी जादुई शक्तियों का इस्तेमाल करके तुरंत खुद को रावण के सामने पहुंचाया. उसने अपने पिता से सीता को वापस देने की प्रार्थना भी की.
14. रावण इंद्रजीत को अपमानित करते हैं
शक्ति के नशे में धुत रावण ने अपने ही पुत्र पर ध्यान देने से इंकार कर दिया. जैसे रावण ने विभीषण की उपेक्षा की थी. उन्होंने युद्ध से भागने के लिए इंद्रजीत को कायर कहा. इंद्रजीत ने गुस्से में आकर कहा कि पुत्र के रूप में वह अपना कर्तव्य निभाता रहेगा. जिसके बाद रावण ने भी कह दिया कि वह अपना पक्ष नहीं छोड़ेगा.
15. इंद्रजीत अपनी हार स्वीकारता है
इंद्रजीत को एहसास होता है कि उसके पिता सीता को कभी नहीं छोड़ेंगे. उन्होंने यह भी महसूस किया कि राम और लक्ष्मण इंसानों से कहीं ज्यादा हैं. लक्ष्मण के हाथों अपनी मौत को स्वीकारते हुए, वह अंतिम रूप से युद्ध में चला गया. लेकिन फिर भी उन्होंने युद्ध बहादुरी से लड़ा. लेकिन इस बार, लक्ष्मण ने इंद्रजीत का वध कर दिया था. लक्ष्मण ने पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली योद्धा को समाप्त कर दिया था.
इंद्रजीत पूरे ब्रह्मांड में एकमात्र व्यक्ति थे जिनके पास तीन परम हथियार - ब्रह्माण्ड अस्त्र, पाशुपतास्त्र और वैष्णवस्त्र एक साथ थे. उन्हें अतिमहारथी के रूप में भी जाना जाता था. जो एक ही समय में 12 महारथियों की शक्ति रखते थे. हालांकि अर्जुन, कर्ण, राम, लक्ष्मण, कृष्ण और हनुमान महारथी थे. वह उन सब को आसानी से पराजित कर सकता था. हालांकि रावण और कुंभकर्ण भी शक्तिशाली थे. लेकिन अंत तक भी उन्होंने अपने पिता का साथ नहीं छोड़ा था. एक अच्छे पुत्र की भूमिका निभाई यानी अपनी मृत्यु तक.
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