विश्व पुस्तक मेला 2020: आधे में लेखक व लोकार्पण, आधे में गांधी

नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2020 की सबसे खास बात थी, महात्मा गांधी को लेकर लोगों का अद्भुत आकर्षण. प्रकाशक और लेखक जहां किताबों के लोकार्पण में व्यस्त थे, वहीं आम जन की रुचि गांधी साहित्य में थी.

नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2020 में महात्मा गांधी पर आधारित एक कार्यक्रम
जय प्रकाश पाण्डेय
  • नई दिल्ली,
  • 13 जनवरी 2020,
  • अपडेटेड 2:21 PM IST

नई दिल्लीः यदि पुस्तक की एक पंक्ति या एक शब्द पाठक के जीवन को बदल सकता है, तो गांधी का जीवन किसी भी काल की महान पुस्तक से कम नहीं है, क्योंकि उनके शब्दों और ज्ञान ने लाखों लोगों के जीवन को बदल दिया, यह बात मानव संसाधन विकास, संचार और इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालयों के राज्यमंत्री संजय धोत्रे ने नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2020 के थीम मंडप में आयोजित पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में कही.ठंड के बावजूद पुस्तक मेले में लोगों की भीड़ किताबों और पाठकों की दोस्ती को दर्शाती रही वहीं यह महात्मा गांधी पर प्रकाशित किताबों के प्रति प्यार भी था. लोग किताबें खरीद रहे थे, परिचर्चा में शामिल हो रहे थे, लेखकों से मिल भी रहे थे. याद रहे कि विश्व पुस्तक मेले में दुनिया भर से लेखकों, प्रकाशकों का मजमा देश की राजधानी में लगातार जुटा रहा. पर मेले की सबसे खास बात थी, महात्मा गांधी को लेकर लोगों का अद्भुत आकर्षण. प्रकाशक और लेखक जहां किताबों के लोकार्पण में व्यस्त थे, वहीं आम जन, युवा, बच्चे और औरतों की रुचि गांधी साहित्य में थी. शायद इसीलिए मंत्री धोत्रे ने कहा भी कि भारत की भाषायी विविधता के महान लेखकों व उनकी कृतियों के बीच स्वयं को पाकर वह असीम आनंद का अनुभव कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि गांधीजी सदी के व्यक्तित्व हैं. पुस्तक मेला पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि पठन-पाठन की कम होती संस्कृति के मध्य इस मेले की प्रासंगिकता व जरूरत और अधिक बढ़ जाती है. एनबीटी के अध्यक्ष प्रो गोविंद प्रसाद शर्मा इस अवसर पर मौजूद थे. न्यास के निदेशक ले. कर्नल युवराज मलिक ने आगामी पुस्तक मेला इससे बेहतर करने की बात कही. राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा प्रकाशित पी डी टंडन की पुस्तक एवं रोलेंड ई बुल्जले लिखित व सुरेश राव द्वारा अनूदित ‘गांधी: अहिंसा का सेनानी' पुस्तक के साथ तमिल, ओड़िया, पंजाबी और मराठी पुस्तकों का लोकार्पण किया.

थीम मंडप में राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद एवं राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के संयुक्त तत्वावधान में पुस्तक लोकार्पण एवं संगोष्ठी का आयोजन किया गया. कार्यक्रम के प्रथम भाग में गांधी की मातृभाषा में शिक्षा दिए जाने की प्रतिबद्धता तथा राष्ट्र-निर्माण में इसके योगदान पर चर्चा हुई. इस अवसर पर  प्रो अख्तर-उल-वासे, प्रो रिजवान कैसर, कुर्बान अली तथा परिषद के निदेशक अकील अहमद व कुलपति शाहिद अख्तर मौजूद थे.  थीम मंडप में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा गांधी दर्शन पर ‘बहुरूप गांधी‘ विषय पर पैनल परिचर्चा का आयोजन किया गया. इस परिचर्चा में सुरेश शर्मा, डॉ राजीव श्रीवास्तव, शशीप्रभा तिवारी, राजीव राज तथा डॉ माला मिश्र उपस्थित थे. अपने व्याख्यान में माला ने इस बात को विशिष्ट रूप से रेखांकित किया कि भाषा एवं जीवन के स्तर पर गांधी अपनी समन्वयवादिता, सहजता, सरलता एवं सादगी के कारण न केवल भारत के लिए बल्कि विश्व भर में स्वीकार्य व प्रेरणा स्रोत हैं. शशीप्रभा तिवारी ने गांधी के संघर्ष में कस्तूरबा गांधी की महती भूमिका पर प्रकाश डाला. उन्होंने दिनकर, सुमित्रानंदन पंत, हरिवंश राय बच्चन, नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र, सुभद्रा कुमारी चौहान आदि की कविताओं को उद्धृत करते हुए उनमें समाहित गांधी की वैचारिकी का विश्लेषण किया.डॉ. राजीव राज ने कहा कि गांधी संभवतः सार्वकालिक महान पत्रकार हैं, जिन्होंने निडर होकर अपने समय की व्यवस्था की कुरीतियों को उजागर किया. गांधी ने पत्रकारिता को एक मिशन के रूप में देखा जो आज के पत्रकारों में नदारद है. डॉ राजीव श्रीवास्तव ने गांधी और सिनेमा पर बात करते हुए बताया कि सिनेमा में गांधी की प्रत्यक्ष उपस्थिति तो नहीं है किंतु उनके विचारों की गहरी पैठ अवश्य है. न्यास से संबद्ध भाग्येन्द्र पटेल ने कार्यक्रम का संचालन किया.

बाल मंडप में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अनुभाग राष्ट्रीय बाल साहित्य केंद्र द्वारा आयोजित ‘डिजिटल कहानीवाचन और पूर्वोत्तर की कहानियां' कार्यक्रम से हुआ. इसका संचालन भाषाविद् उषा छावड़ा और कहानीकार रूमी मलिक द्वारा किया गया. विभिन्न स्कूलों से आए बच्चों का पूर्वोत्तर की कहानियों से परिचय कराया गया. उषा ने बताया कि डिजिटल कहानीवाचन में एक तस्वीर बहुत मायने रखती है और बहुत कुछ कह सकती है. डिजिटल छवियों के माध्यम से बहुत से दृष्टिकोण बनाए जा सकते हैं. बच्चों को पूर्वोत्तर की एक प्रसिद्ध लड़की शेखोम मीराबाई चानू के जीवन पर आधारित सच्ची कहानी भी सुनाई गई. रूमी मलिक की उत्तर-पूर्व की कहानियों ने पूरे कार्यक्रम के दौरान बच्चों को बांधे रखा.बाल मंडप में ‘बच्चों के अधिकार‘ विषय पर एक कार्यशाला आयोजित की गई. बच्चों ने संविधान से संबंधित दिलचस्प और ज्ञानवर्धक बातें ध्यान से सुनीं. बच्चों को सलाह दी गई कि वे किसी समस्या में होने पर पुलिस पर हमेशा भरोसा करें. आयोजक संस्था की निदेशिका और बच्चों के अधिकार कार्यकर्ता कार्तिकेय शुक्ला भी इस अवसर पर उपस्थित थे. निखिल पांडेय ने इस आयोजन का समन्वय किया, जबकि भावना आनंद ने एक पावर प्वाइंट प्रस्तुति दी.बाल मंडप में ही हैप्पी होराइजंस ट्रस्ट द्वारा बच्चों के लिए रचनात्मक लेखन पर एक कार्यशाला आयोजित की गई. बापू को या बापू पर पत्र लिखने के लिए कहा गया. बच्चों ने लिखा कि महात्मा गांधी ने कैसे स्वच्छ भारत अभियान के लिए मार्ग प्रशस्त किया, जबकि कुछ ने आज के समय में उनके मूल्यों की प्रासंगिकता पर लिखा. कुछ ने उनके चित्र, पोस्टर बनाकर उनके प्रति अपने प्यार को व्यक्त किया. एक और प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमें बच्चों को किसी अपने प्रिय को एक पत्र लिखना था, जो उनके मित्र, माता, पिता या कोई प्रियजन हो सकता है. यह कार्यक्रम नव भारत जन सेवा संस्थान द्वारा आयोजित किया गया, जिसका समन्वय राजकुमार दुबे ने किया.बाल मंडप में ही एक अन्य कार्यक्रम में बच्चों के लिए ड्राइंग व पेंटिंग कार्यशाला से हुई. विषय था- ‘चलो, गांधी का चित्र बनायें'. जाने-माने कलाकार देवव्रत सरकार व लेखक दीपा अग्रवाल की देखरेख में दर्शन अकादेमी, सलाम बालक ट्रस्ट तथा राजीव गांधी फाउंडेशन से बड़ी संख्या में आए बच्चों ने भाग लिया. इस अवसर पर दीपा अग्रवाल ने दांडी मार्च और स्वतंत्रता संग्राम में गांधी की भूमिका के बारे में बताया. अगले सत्र में दर्शन अकादेमी द्वारा कहानी लेखन कार्यक्रम आयोजित हुआ. इस सत्र में बच्चों ने बहुत दिलचस्पी ली क्योंकि कहानी लेखन के माध्यम से उन्हें अपनी कल्पना को साकार करने का मौका दिया गया था. इस अवसर पर अंसल विश्वविद्यालय के मुख्य पुस्तकालयाध्यक्ष आर एन मालवीय उपस्थित थे. संचालन दर्शन अकादेमी की पुस्तकालयाध्यक्ष ममता अमरपुरी ने किया.

वंडररूम व गांधी फाउंडेशन की ओर से एक नाटक ‘पर हमें खेलना है' का मंचन भी हुआ. श्रीरंग गोडबोले द्वारा लिखित यह नाटक मुंबई विस्फोटों के तुरंत बाद हुई घटनाओं पर आधारित था. बच्चों ने दंगों की व्यंगात्मक प्रस्तुति का खूब आनंद लिया. सर्वोदय बाल विद्यालय द्वारा बहादुरी पुरस्कार विजेता बच्चों के साथ संवाद-सत्र का आयोजन हुआ. इस सत्र का संचालन बच्चों के लेखक रजनीकांत शुक्ल ने किया. प्रमुख वक्ता थे हरिश्चंद्र मेहरा, अक्षित व महिका गुप्ता.लेखक मंच पर हिन्द पॉकेट बुक्स द्वारा आयोजित कार्यक्रम में लोकप्रिय साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर सुरेंद्र मोहन पाठक के नए उपन्यास ‘काला नाग‘ का लोकार्पण किया गया. इस उपन्यास का केंद्र पुलिस भ्रष्टाचार है जिसकी कथा व्यक्ति के सामान्य जीवनानुभवों से बुनी गई है.  अपने आपको कृशन चन्दर का शिष्य मानते हुए सुरेंद्र मोहन पाठक ने यह बताया कि उनके पठन-पाठन की कोई विशिष्ट परिधि नहीं है. उर्दू साहित्यकारों को बेजोड़ बताते हुए उन्होंने फैज की कुछ पंक्तियों को गुनगुनाया और उनकी वर्तमान प्रासंगिकता पर बात की. अपने उपन्यास की चर्चा करते हुए उन्होंने प्रकाशकों की भूमिका और लोकप्रिय साहित्य के प्रति गंभीर साहित्य की हिकारत भरी दृष्टि का भी जिक्र किया. गौरतलब है कि सुरेंद्र मोहन पाठक वर्तमान लोकप्रिय साहित्य के विराट व्यक्तित्व हैं जिन्होंने 300 से अधिक उपन्यासों की रचना की है.लेखक मंच पर ही एक अन्य कार्यक्रम में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा आयोग की प्रकाशन संबंधी जानकारी हेतु कार्यशाला का आयोजन किया गया. इस आयोजन के अंतर्गत पाठकों को शब्दावली, परिभाषा कोश, विभागीय शब्दावली आदि के निर्माण से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों की जानकारी पाठकों को दी गई. ‘सीएसटीटी  पब्लिकेशन‘  एप के बारे में बताया गया, जिसके अंतर्गत तकनीकी शब्दों का आसानी से अनुवाद प्राप्त किया जा सकता है, धर्मेंद्र कुमार, शिवकुमार चौधरी और दीपक कुमार ने भाषा विज्ञान और कम्प्यूटर विज्ञान को जोड़कर शब्दावली निर्माण की प्रक्रिया को भी समझाया. इस अवसर पर आयोग के अध्यक्ष प्रो अवनीश कुमार, विशिष्ट अतिथि उमाकांत खुआलकर, मुख्य अतिथि प्रो योगेंद्र नाथ शर्मा, मुख्य वक्ता के रूप में पी एन शुक्ला और हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी के अध्यक्ष सुधाकर पाठक आदि विद्वान उपस्थित थे. कार्यक्रम का संचालन डॉ अशोक सेवलटकर ने किया.लेखक मंच पर ही भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘नई भाषा‘ पर बात के अंतर्गत कपिल इसापुरी के उपन्यास ‘फरिश्ता‘ का लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार ममता कालिया ने किया. अपने उपन्यास का परिचय देते हुए लेखक ने किताब क्रांति की जरूरत को रेखांकित किया. गोष्ठी में साहित्यिक चोरी, कॉपीराइट संबंधी चिंताएं एवं इस संदर्भ में सरकार व न्यायपालिका की जिम्मेदारी पर भी सार्थक बातचीत हुई. कार्यक्रम का सफल संचालन जामिया के प्रोफेसर रहमान मुसव्विर ने किया.‘केंद्रीय हिंदी निदेशालय’ द्वारा सूचनात्मक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में चार श्रेणियों- द्विभाषा कोश, त्रिभाषा कोश, वार्तालाप पुस्तक तथा विदेश भाषा वार्तालाप के कोशों पर बात की गई. तीन नूतन प्रकाशन पंजाबी-हिंदी कोश, गुजराती-हिंदी कोश तथा वृहत हिंदी कोश पर विशेष चर्चा हुई. विशिष्ट अतिथि के रूप में पद्मश्री श्याम सिंह शशि, अवनीश कुमार वक्ता के रूप में दीपक पांडे, किरण झा, प्रो योगेन्द्र नाथ शर्मा उपस्थित थे. समारोह में निदेशालय के आधिकारिक यूट्यूब चैनल ‘हिन्दीभाषावाणी‘ तथा कोश योजना, शब्दावली योजना, परिभाषा कोश योजना के बारे में सूचना देते हुए अष्टम सूची में शामिल भाषाओं व विदेशी भाषाओं के आपसी संवाद बढ़ाने पर चर्चा हुई. श्याम सिंह ने निदेशालय द्वारा निर्मित शब्दों के प्रचलन तथा ‘सामाजिक विज्ञान हिंदी कोश’ के छठे भाग को निकालने का सुझाव दिया. लेखक मंच पर शरद आलोक की पुस्तक ‘प्रवासी का अंतर्द्वंद’ का भी लोकार्पण हुआ. मो नसीम ने कार्यक्रम का संचालन किया.‘केंद्रीय हिंदी संस्थान‘ द्वारा ‘हिंदी की समृद्धि भारतीय भाषाओं के साथ‘ विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया. ‘केंद्रीय हिंदी शिक्षण‘ मंडल के उपाध्यक्ष डॉ. कमल किशोर गोयनका की अध्यक्षता में सम्पन्न इस परिचर्चा में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. योगेंद्रनाथ शर्मा, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चन्दन कुमार तथा वरिष्ठ शिक्षाविद् अतुल कोठारी वक्ता के रूप में उपस्थित थे. इस कार्यक्रम के अंतर्गत प्रो चंदन कुमार की पुस्तक ‘संवाद यात्रा‘ का लोकार्पण भी किया गया. कार्यक्रम का संचालन केंद्रीय हिंदी संस्थान, दिल्ली के क्षेत्रीय निदेशक प्रो. महेंद्र सिंह राणा ने किया.किताबघर प्रकाशन द्वारा साहित्य अकादेमी से सम्मानित प्रसिद्ध लेखिका नासिरा शर्मा के उपन्यास ‘कागज की नाव‘ पर परिचर्चा का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम का संचालन प्रज्ञा पांडे ने किया.मेले में आथर्स कार्नर के रिफ्लेक्शंस हाल में एनबीटी तथा भारतीय शिक्षा मंडल के संयुक्त तत्वावधान में ‘एसेंशियल विवेकानंद‘ पुस्तक पर परिचर्चा का आयोजन किया गया. डॉ रवि प्रकाश टेकचंदानी ने कहा कि स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएं और विचार अमर हैं. इस अवसर पर अन्य वक्ताओं में पुस्तक के लेखक मुकुल कानिटकर और अनूप एजे, सच्चिदानंद जोशी और संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष शेखर सेन व एनबीटी अध्यक्ष प्रो गोविंद प्रसाद शर्मा भी उपस्थित थे. इसी जगह ‘हमारे देश के अनकहे इतिहास और हमारे पूर्वजों ने आक्रमणकारियों के खिलाफ कैसे बचाव किया' पुस्तक पर एक परिचर्चा आयोजित की गई. अंकुर पाठक, संक्रांत सानू और मनोशी सिन्हा रावल इस अवसर पर वक्ता थे. कार्यक्रम का आयोजन गरुड़ प्रकाशन ने किया.आथर्स कार्नर में ही साहित्य अकादमी द्वारा उत्तर-पूर्वी तथा उत्तर क्षेत्रीय लेखक सम्मेलन का आयोजन किया गया. जिसमें मधु आचार्य, संजीव पाल डेका, चरन सिंह पथिक, सालिम सलीम, गगनदीप शर्मा व जितेन ओइनाम्बा ने भाग लिया. संजीव पाल डेका ने अंग्रेजी में तथा चरन सिंह ने हिंदी में एक-एक लघु कहानी श्रोताओं को सुनाईं. एक अन्य कार्यक्रम में अमरदीप थिंड की पुस्तक ‘द सीक्रेट ऑफ विनिंग‘ का लोकार्पण हुआ. पुस्तक पर चर्चा के दौरान लेखक अमरदीप ने कहा कि जब आप अपने तरीके से भय से मुक्ति पा लेते हैं, तभी आप विजयी कहलाते हैं. इस चर्चा में डॉ प्रीति नंदा सिब्बल, अमित चावला, आशुतोष के कांत, गुरुप्रीत, सुरुचि शर्मा व दिनेश वर्मा आदि ने भाग लिया.थीम पवेलियन में एक अन्य कार्यक्रम में भारत सरकार के न्याय विभाग, विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा एक प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया. प्रश्नोत्तरी का उद्देश्य लोगों को भारतीय संविधान में निहित मौलिक अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति लोगों को जागरूक करना था. प्रश्नोत्तरी के उपरांत कानूनी सलाहकार शिखा हुंडल द्वारा एक परिचर्चा प्रारंभ की गई. इसमें कंवलजीत अरोड़ा, चंद्रजीत, नम्रता अग्रवाल, नुसरत खान, मारिया फरीदी आदि कानूनी विशेषज्ञों ने भाग लिया. इस कार्यक्रम में नेशनल लॉ कॉलेज रांची के छात्र विनीश व कामरा ने भी हिस्सा लिया. क्विज प्रतियोगिता में सीनियर बॉयज स्कूल, वसंत कुंज व इंद्रपुरी के बच्चों ने भाग लिया.सेमिनार हॉल में ‘महात्मा गांधी और हिंदी‘ विषय पर नागरी लिपि परिषद द्वारा हिंदी के विकास में गांधी का योगदान विषय पर परिचर्चा कराई गई. जिसमें वक्ताओं ने बताया कि कैसे गांधी ने अपने विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा दिया. युवाओं में हिंदी के प्रयोग के प्रति बढ़ती उदासीनता पर वक्ताओं ने गहरी चिंता प्रकट की. परिचर्चा में डॉ पांचाल, नारायण कुमार, आचार्य ओम प्रकाश, श्याम सुंदर कठूरिया व रा.पु.न्यास के उपनिदेशक राकेश कुमार ने भाग लिया. संचालन डॉ हरी कुमार ने किया.

राजकमल प्रकाशन के अनुसार मेले का अनुभव हमेशा भव्य रहा. एक तरफ गांधी साहित्य की किताबों की ब्रिक्री हो रही थी, तो दूसरी तरफ रामधारी सिंह दिनकर की किताबें भी खूब पसंद की जा रही हैं. रश्मिरथी, संस्कृति के चार अध्याय, हे राम, हारे को हरिनाम किताब पाठकों की पसंद बनकर उभर रहे हैं. दिनकर छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे. एक ओर उनकी कविताओं में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रांति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति. वे संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू के भी बड़े जानकार थे. पुस्तक मेला में ही राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर दिनकर ग्रंथमाला सीरीज में 29 किताबों का लोकार्पण किया गया. लोकभारती प्रकाशन से राष्ट्रकवि दिनकर की 29 पुस्तकों को नए रूपाकार में प्रस्तुत किया गया है. दिनकर साहित्य की अन्य पुस्तकें भी नयनाभिराम प्रस्तुति के साथ इसी वर्ष प्रकाशित होंगी. कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर गोपेश्वर सिंह ने कहा, "दिनकर को पढ़ना भारत की सांस्कृतिक आत्मा को पढ़ना है. "खम ठोंक ठेलता है जब नर,पर्वत के जाते पाँव उखड़.मानव जब जोर लगाता है,पत्थर पानी बन जाता है." -रश्मिरथी/ रामधारी सिंह दिनकर.यहीं मोहन राकेश के कश्मीर की पृष्ठभूमि पर आधारित उनके उपन्यास ‘कांपता हुआ दरिया’ का भी लोकार्पण हुआ. यह मोहन राकेश का अधूरा उपन्यास था, जिसे उनकी साहित्य चेतना के मर्मज्ञ जयदेव तनेजा की पहल पर एक प्रयोग के तौर पर मीरा कान्त ने पूरा किया. मोहन राकेश इस उपन्यास को कश्मीर की पृष्ठभूमि पर लिखने की कोशिश थी थी लेकिन वो इसे पूरा नहीं कर पाए थे. मोहन राकेश की अंतिम इच्छा थी कि इस उपन्यास को कोई कश्मीरी ही पूरा करे.इस मौके पर साहित्यकार कृष्ण कल्पित ने कहा, ''मोहन राकेश की अँधेरे बंद कमरे हिंदी साहित्य में मील का पत्थर है. काँपता हुआ दरिया में भी वही औपनिवेशिक दृष्टि लक्षित होती है.''एक अन्य कार्यक्रम में अशोक कुमार पांडेय के कश्मीर पर लिखे उपन्यास का लोकार्पण किया गया. कश्मीर का इतिहास, समाज, राजनीति और उसकी समस्याओं को इस किताब में विस्तार से बताया है. हिंदी में कश्मीर पर एक मुकम्मल किताब है ‘कश्मीर और कश्मीरी पंडित. कश्मीर पर ये अपनी तरह की प्रामाणिक उपन्यास है. इस उपन्यास में अशोक कुमार पांडेय ने कश्मीर के 1500 साल के कश्मीर के इतिहास और कश्मीरी पंडितों के पलायन को समेटा है. इस मौके पर कश्मीरी पंडित कुमार वांचु परिवार के लोग भी उपस्थित थे. कुमार वांचु और उनके परिवार ने अपनी बात रखते हुए कहा, ''कश्मीर उतना नहीं है जो हम खबरों में देखते हैं. कश्मीर पंडितों पर दो पक्ष चलते रहते हैं. एक में उनको हीरो बना दिया जाता है और दूसरे में बस बहस होती है." उन्होंने कहा, ''हर कोई जानता है कि नब्बे दशक में कश्मीर पंडितों ने पलायन किया, कैंपों में उन्हें जगह दी गई. लेकिन ये बहुत कम लोगों को पता है कि उसी समय 50 हजार मुसलमानों ने भी पलायन किया था और उनको कैंपों में भी जगह नहीं दी गई.'' पुस्तक के बारे में लेखक से पत्रकार प्रकाश के रे ने कश्मीर के मौजूदा हालात और इसके इतिहास पर कई सवाल किए. अशोक कुमार ने कहा कि, 'किताब के रिसर्च के लिए मैं 5 अगस्त के बाद कश्मीर गया और कई कश्मीरियों से बातचीत की. धारा 370 के हटने का असर हम बर्फ़ पिघलने के बाद ही समझ पाएंगे. मार्च के बाद हमें पता चलेगा कि धारा 370 के हटने का क्या असर हुआ है.' पत्रकार प्रकाश के रे ने कहा, ''कश्मीर के बारे में पहले सिर्फ घटनाओं पर भी बात होती है. उसमें तथ्य, विमर्श और विश्लेषण बहुत कम होता था. कश्मीर और कश्मीरी पंडित किताब के आने के बाद ये कमी पूरी हो गई.''राजकमल के ही स्टॉल पर लेखिका महुमा माजी की ने अपने शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास से एक छोटा सा हिस्सा पढ़ कर सुनाया. महुआ के दो उपन्यास ‘मैं बोरिशाइल्ला‘ और ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ' राजकमल प्रकाशन से पहले से प्रकाशित हैं. जब उनसे उपन्यास के नाम को लेकर किए गए सवाल किए गए तो महुआ ने कहा, ''उपन्यास के नाम को लेकर अक्सर मुझसे सवाल पूछे जाता है, लेकिन मैं बहुत पर्फेक्शनिस्ट हूँ. जब तक उपन्यास पूरा न हो जाए नाम तय कर पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल होता है.''इसी स्टॉल पर ‘रमुआ-कलुआ-बुधिया और राष्ट्रवाद’ पुस्तक का लोकार्पण किया गया. इस समय देश में राष्ट्रवाद पर बहस चल रही है और उसी राष्ट्रवाद को समझाने की कोशिश लेखक ने अपनी किताब में की है. किताब पर आलोचक मृत्युंजय से बातचीत करते हुए लेखक राम मिलन ने कहा, ‘आज सारी राजनीति धर्म पर टिकी हुई है. रमुआ-कुलआ-बुधिया कोई नाम न होकर पूरा जनमानस है.‘ किताब में लेखक ने राष्ट्रवाद की कई प्रकार की अवधारणाओं पर विस्तार से बताया है. किताब के लोकार्पण की चर्चा में लेखक राममिलन ने लैंगिक राष्ट्रवाद के बारे में कहा, नारी को हम हर जगह प्रतीकात्मक रूप में देखते हैं लेकिन वास्तविकता कुछ और होती है. हमने नारी को न जानने का प्रयास किया और न ही उसकी संवेदना को जानने का प्रयास किया. यहां तक कि गांधीजी का भी रवैया नारी के लिए ज्यादा उदार नहीं रहा.राष्ट्रवाद के बारे में लेखक ने बताया, राष्ट्रवाद की सबसे पहली इकाई मनुष्य है. मैंने इस किताब में जातिवाद, धार्मिक, लैंगिक राष्ट्रवाद के बारे में विस्तार से बताने की कोशिश की है. लेखक ने ये भी कहा, हो सकता है इस पर कुछ लोग सहमत हों और कुछ लोग असहमत हों.

उधर वाणी प्रकाशन के स्टॉलपर चर्चित वरिष्ठ पत्रकार ज्ञान चंद बागड़ी के नये उपन्यास 'आख़िरी गाँव' का लोकार्पण और परिचर्चा हुई. इस किताब में नयी पीढ़ी के लिए लुप्त होते गाँवों के रीति-रिवाज़, त्योहारों का रोचक उल्लेख है. ज्ञानचंद बागड़ी जी ने बताया की जो रीति रिवाज़ बदलते जा रहे हैं उनका पुनः स्मरण किया जाना नयी पीढ़ी के लिए अति आवश्यक है, इसी उद्देश्य से इस उपन्यास की रचना की गयी है. सभी अतथियों का परिचय देते हुए ज्ञानचंद बागड़ी ने हिन्दी के वरिष्ठ कवि कृष्ण कल्पित से अपने उपन्यास पर कुछ टिप्पणियाँ का आग्रह किया. कवि कृष्ण कल्पित के अनुसार यह उपन्यास पुराने गाँव का समाजशास्त्रीय अध्ययन बड़े रोचक ढंग से प्रस्तुत करता है. वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार ईश मधु तलवार ने भी इस उपन्यास को भारतीय धरोहर की रक्षा करने वाला और नयी पीढ़ी के लिए भी एक महत्वपूर्ण उपन्यास माना. कार्यक्रम के अन्त में सभी अतिथियों द्वारा उपन्यास 'आख़िरी गाँव' का विमोचन किया गया.इस अवसर पर हिन्दी के वरिष्ठ कवि कृष्ण कल्पित, वरिष्ठ साहित्यकार विनोद भारद्वाज, मानवशास्त्री एन.के.वैद, कवि अजंता देव, वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार ईश मधु तलवार, कथाकार चरणसिंह पथिक, मीमांसा के सम्पादक नितिन यादव और लेखक ज्ञान चंद बागड़ी के अतिरिक्त अन्य साहित्यकार भी उपस्थित थे. वाणी प्रकाशन की निदेशक अदिति माहेश्वरी गोयल ने मंच का संचालन किया. वाणी के ही स्टॉल पर चर्चित पत्रकार आशुतोष नाड़कर का नया उपन्यास 'शकुनि: पासों का महारथी' का लोकार्पण और परिचर्चा की गयी. कार्यक्रम में मुख्य वक्ता कथाकार आकांक्षा पारे काशिव और प्रणय उपाध्याय थे. अदिति माहेश्वरी ने मंच का संचालन करते हुए आशुतोष नाड़कर से प्रश्न किया कि, वह ऐतिहासिक पात्र जिसके बारे में दुनिया जानती है, उसको केन्द्र में रखकर निष्पक्ष होकर किस प्रकार उन्होंने यह उपन्यास लिखा. नाड़कर का उत्तर था, 'शकुनि' महाभारत का एक अहम पात्र है, उसी पर पूरी महाभारत कथा केन्द्रित है.

आशुतोष नाड़कर ने अपने उपन्यास के कुछ अंशो का पाठ करते हुए बताया कि इसमें उन्होंने 'शकुनि' को नायक या खलनायक बनाने का निर्धारण नहीं किया. इसका अधिकार उन्होंने केवल पाठकों को दिया है. जिस प्रकार 'शकुनि' ने महाभारत में रणनीतियों का निर्माण किया, वही वर्तमान समय में 'अमेरिका', 'इराक़' के सम्बन्ध में भी दिखटाआ है. इस प्रकार यह उपन्यास सम्यक आकलन में मदद करता है. आख़िर में दर्शकों ने भी अपने प्रश्न उपन्यासकार आसुतोष नाड़कर से किया, कि शकुनि के साथ बाकी महाभारत के पात्रों के सम्बंध में उनकी क्या राय है, जिसका उत्तर देते हुए उन्होंने बताया कि महाभारत के सभी पात्रों के स्वभाव में एक प्रकार का 'ग्रे शेड' है.'शकुनि' उपन्यास पर अपनी टिप्पणी करते हुए, पत्रकार आकांक्षा पारे काशिव ने कहा कि इस उपन्यास में केवल विजेताओं की कथा नहीं बल्कि एक ऐसे हारे हुए व्यक्ति की कथा है, जो अपने को संपूर्ण करने की जद्दोजहद में है. प्रणय उपाध्याय के अनुसार, यह उपन्यास भारतीय मानस की अदालत में शकुनि का रिव्यु पेटिशन' है, जो भारत की बनी बनाई धारणाओं को तोड़ता है.

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