अदब और तहज़ीब का शहर लखनऊ एक बार फिर साहित्य, कला और मनोरंजन के रंगों से सराबोर हो गया है. 'साहित्य आजतक लखनऊ' का भव्य आगाज गोमती नगर स्थित अंबेडकर मेमोरियल पार्क में हुआ, जहां देशभर से आए साहित्यकार, कलाकार और श्रोताओं ने इस सांस्कृतिक आयोजन का आनंद लिया. यह आयोजन साहित्य और संस्कृति प्रेमियों के लिए एक उत्सव की तरह है, जहां किताबों, फिल्मों, अदब और तहज़ीब के साथ-साथ लखनऊ के खास मिज़ाज पर भी चर्चा हो रही है.
इस दौरान मशहूर किस्सागो और दास्तानगो हिमांशु बाजपेयी ने अपने सेशन ‘दास्तान-ए-लखनऊ’ में शहर के दिलचस्प किस्से सुनाए. उन्होंने अपनी कहानियों के जरिए लखनऊ की ऐतिहासिक विरासत, नवाबी दौर और यहां के मिजाज को जीवंत कर दिया.
हिमांशु बाजपेयी ने लखनऊ के जायकों और नवाबों की खान-पान की आदतों पर बात करते हुए एक रोचक किस्सा सुनाया. उन्होंने बताया कि लखनऊ के जायके की बात होती है तो सिर्फ टुंडे कबाब याद आते हैं, लेकिन ये बस एक ब्रांडिंग है. लखनऊ सिर्फ नॉनवेज का शहर नहीं है, बल्कि शाकाहार की भी इसकी अपनी विरासत है. किस्सा है कि अवध के नवाब आसिफुद्दौला ने 500 रु. माहवार की भारी-भरकम तनख्वाह पर सिर्फ दाल पकाने के लिए एक बावर्ची रखा था.
बावर्ची की दो शर्तें थीं. पहली, जब भी नवाब साहब को दाल खाने का दिल करे तो वह पहले से इसकी जानकारी दें. दूसरी शर्त थी कि जब वह बता दे कि दाल तैयार है तो उसे तुरंत खाने के लिए आना होगा. कुछ दिन बीत गए. एक दिन नवाब साहब को दाल खाने का दिल किया. बावर्ची को जानकारी भिजवायी गई. वह दाल बनाने में जुट गया.
जब दाल बन गई तो नवाब साहब को बुलावा भेजा गया. लेकिन नवाब साहब खाने के ही साथ-साथ आराम पसंद भी थे. आहिस्ता मिजाजी भी लखनऊ की एक पहचान है. यहां का आदमी कभी जल्दी में नहीं मिलेगा. क्योंकि जल्दी का काम शैतान का माना जाता है. खैर, नवाब साहब एक बुलावे पर नहीं आए, दूसरे पर भी नहीं पहुंचे और जब तीसरी बार भी बुलावे पर नहीं पहुंचे तो बावर्ची ने झल्लाकर पूरी दाल एक सूखे पेड़ के पास उलट दी और लौटकर फिर कभी नहीं आया.
नवाब साहब को बहुत अफसोस हुआ, कुछ दिनों बाद देखा गया कि जिस सूखे पेड़ के नीचे दाल फेंकी गई थी, वह हरा-भरा होने लगा. इस किस्से के जरिए उन्होंने बताया कि ब्रांडिंग का कितना महत्व है, क्योंकि अवध के व्यंजनों की जबरदस्त ब्रांडिंग हुई है. नवाब भी दाल खाते थे.
लखनऊ की आहिस्ता-मिज़ाजी और मज़ाकिया अंदाज़
लखनऊ सिर्फ तहज़ीब के लिए ही नहीं, बल्कि यहां के ह्यूमर के लिए भी जाना जाता है. दास्तानगो ने अपने अंदाज में मुश्ताक अहमद यूसुफी का जिक्र किया और बताया कि वो कहते थे कि दुश्मनों की तीन कैटेगरी होती हैं— दुश्मन, जानी दुश्मन और रिश्तेदार. एक साहब, रिश्तेदारों की सलाह पर कुछ करने को राजी हुए.
उन्होंने कबाब पराठे की दुकान खोल ली. अब वो कितने आहिस्ता मिजाज के थे, इसका अंदाजा ऐसे लगाइए कि एक दिन एक कुत्ता पराठा लेकर भाग गया. लोगों ने कहा, अरे पकड़ो पकड़ो, कुत्ता पराठा लेकर भाग गया. उन्होंने कहा, अरे जाने भी दीजिए, अभी कबाब लेने आएगा तब पकड़ते हैं.
एक और मजेदार किस्सा उन्होंने सुनाया कि एक चोर चोरी करने गया, लेकिन घर में कोई नहीं था. इत्मीनान से उसने सामान समेटा. जून का महीना था तो गर्मी बहुत थी, चोर ने एसी ऑन कर दिया और वहीं सो गया. सुबह मकान मालिक आए, लेकिन उन्होंने चोर को जगाया नहीं. पुलिस भी आई, लेकिन पुलिस भी लखनऊ की थी, तो उन्होंने भी चोर को सोने दिया. जब चोर साहब नींद पूरी करके उठे और ठीक से अंगड़ाई वगैरह ले ली तब पुलिस उन्हें अपने साथ ले गई. यह किस्सा इस बात का गवाह है कि लखनऊ वाले न सिर्फ अपने बल्कि दूसरों की नींद का भी खूब ख्याल रखते हैं. यही है लखनऊ की आहिस्ता-मिज़ाजी.
लखनऊ के शायरों और उनकी किस्सागोई
लखनऊ की शायरी का अपना एक अलग रंग है. इस आयोजन में मीर तकी मीर पर भी चर्चा हुई. मीर साहब को लखनऊ पसंद नहीं था, लेकिन इस पर हिमांशु बाजपेयी ने दिलचस्प तर्क दिया. उन्होंने कहा कि मीर जब 60 साल की उम्र में लखनऊ आए, तो स्वाभाविक रूप से उन्हें नया शहर रास नहीं आया. किसी भी व्यक्ति को इस उम्र में कहीं किसी नई जगह भेजा जाए, तो वह वहां सहज महसूस नहीं करेगा.
आरज़ू लखनवी के शायरी के शुरुआती दौर का एक किस्सा भी सुनाया गया. कहा जाता है कि जब वे बच्चे थे, तो उनके रिश्तेदारों ने चुनौती दी कि यदि वे एक मिसरे को अगले दस साल में पूरा कर सके, तो उन्हें शायर माना जाएगा. उस मिसरे का जवाब उन्होंने कुछ यूं दिया—
"उड़ गई सोने की चिड़िया, रह गए पर हाथ में" दामन उस यूसुफ का आया पुर्जे होकर हाथ में"
इसी तरह मजाज लखनवी का जिक्र भी हुआ, जिन्हें जोश मलीहाबादी ने शराब पीना सिखाया था, लेकिन मजाज साहब ज्यादा ही पीने लगे. ये बात जोश मलीहाबादी तक भी पहुंची. जोश ने उन्हें समझाया कि थोड़ी कम पिया करो. एक काम करो, मैं जब शराब पीता हूं तो घड़ी सामने रख लेता हूं. इस पर मजाज लखनवी ने जवाब दिया, आप घड़ी सामने रखकर पीते हैं, मेरा बस चले तो मैं घड़ा सामने रखकर पीयूं.इसी तरह उन्होंने एक और दिलचस्प दास्तान सुनाई. एक पीर साहब के घर शादी हुई. जब सब हो गया तो सब शादी के इंतजाम वाले तगादे के लिए पहुंचे, तो पीर साहब ने उनसे पूछा कि पैसे लोगे या दुआएं? सब डर गए कि कहीं पैसे की बात कह दी तो पीर साहब नाराज होकर बद्दुआ न दे दे. इस पर सबने कहा कि साहब पैसों का क्या है, दुआएं ही दे दीजिए. इस दौरान एक किस्सागो भी पहुंचा था, साहब ने उससे भी वही सवाल किया कि, पैसे लोगे या दुआएं. तो उसने कहा कि, ऐसा है पीर साहब 20 रुपये की दुआएं दे दीजिए, बाकी 480 नगद दे दीजिए.
असली लखनऊ कहां मिलेगा?
हिमांशु बाजपेयी ने कहा कि लखनऊ के बारे में यही कहा जाता है कि यदि इसे समझना है, तो असली लखनऊ की गलियों में जाना होगा. गोमती नगर की चमक-धमक में लखनऊ का असली मिजाज नहीं मिलेगा. इसे महसूस करने के लिए चौक, अमीनाबाद और नखास की गलियों में जाना पड़ेगा.
लखनऊ जो समझना है, जरा पास आइए
इस काम के लिए बतौर-ए-खास आइए
गोमती नगर में लखनऊ मिलता नहीं जनाब
अमीनाबाद, चौक या नखास आइए.
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