संजीव बख्‍शी का संस्‍मरण 'केशव, कहि न जाइ का कहिये', रोमांचक है जिये को सिलसिलेवार दर्ज कर पाना

संजीव बख्‍शी का प्रशासनिक जीवन उनके साहित्‍यिक जीवन से गुंथा हुआ है. अपने संस्‍मरणों में वे दोनों को साथ-साथ साधते हैं. 'केशव, कहि न जाइ का कहिये' में भी उन्होंने यही दर्ज किया है.

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लेखक संजीव बख्‍शी और 'केशव, कहि ना जाइ का कहिये' का आवरण चित्र लेखक संजीव बख्‍शी और 'केशव, कहि ना जाइ का कहिये' का आवरण चित्र

ओम निश्चल

  • नई दिल्ली,
  • 02 मार्च 2022,
  • अपडेटेड 11:15 PM IST

संस्‍मरणों में संजीव बख्‍शी अनूठे हैं. वे मूलत: कवि हैं. कविता में एक धीर गंभीर छवि बनाए रखने वाले. उनके कई कविता संग्रह आ चुके हैं. बीच में उनके दो उपन्‍यास भी आए- भूलन कांदा और खैरागढ़ नांदगांव. पर यह खैरागढ़ और नांदगांव उन्‍हें कभी भूलता नहीं. वे कुछ भी लिख रहे हों, इसका लोकेल उनका पीछा करता रहता है. इसीलिए जब 2014 में उनके संस्‍मरणों की पहली पुस्‍तक 'खैरागढ़ में कट चाय और डबल पान' आई तो उनके भीतर की अब तक की साहित्‍यिक, सांस्‍कृतिक यात्राओं के साथ उनके प्रशासनिक जीवन की भी कुछ झलकियां सामने आईं. मिजाज से विनयी संजीव बख्‍शी जब संस्‍मरणों के बीहड़ में उतरते हैं तो वे एक-एक डिटेल को बहुत गहराई से याद करते और रेखांकित करते हुए चलते हैं. उनका प्रशासनिक जीवन उनके साहित्‍यिक जीवन से गुंथा हुआ है. अपने संस्‍मरणों में वे दोनों को साथ-साथ साधते हैं. वे जहां रहे, वहां एक साहित्‍यिक संसार बसा कर रहते थे. खैरागढ़ में जनमे, राजनांद गांव के दिग्‍विजय महाविद्यालय में पढ़े. गणित विषय से एमएससी किया पर संयोग देखिये कि जिस दिग्‍विजय महाविद्यालय में वे पढ़े वहां कभी मुक्‍तिबोध रह चुके थे. हालांकि जब वे मिडिल क्‍लास में रहे होंगे, मुक्‍तिबोध का प्रयाण हो चुका था किन्‍तु उनका कुछ असर तो पड़ा ही होगा, उनकी अनुपस्‍थिति में भी. दूसरे, उनकी अपनी भी एक साहित्‍यिक विरासत थी, पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी जी से जुड़ती हुई, सो गणित जैसे कष्‍टसाध्‍य विषय में निपुणता के साथ-साथ कविता लेखन में भी उनकी रुचि जाग्रत हुई और अब तक चल रही है.
हाल ही में संजीव बख्‍शी के संस्‍मरणों की पुस्‍तक 'केशव, कहि न जाइ का कहिये'- आई है जो उनके पिछले संस्‍मरण 'खैरागढ़ में कट चाय और डबल पान' की तरह ही रोचक और रोमांचक है. 1973 में ग्रेजुएट होने के बाद मध्‍यप्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में पहली बार फार्म भरा तो उन्‍हें नायब तहसीलदार की नौकरी मिल गयी, हालांकि वे तब तक नहीं जानते थे कि नायब तहसीलदार को क्‍या कार्य करने होते हैं. यह तो बिल्‍कुल पता न था कि उनके कोर्ट होते हैं तथा वकीलों से साबका पड़ सकता है. पर एक दिन उन्‍होंने अपने जीवन की यह पहली नौकरी कांकेर में ज्‍वाइन ही कर ली. कविता की लत उन्‍हें यहीं लगी. खाली समय में डायरी में कविताएं लिखी जाने लगीं. लिहाजा कांकेर की उनके पूरे जीवन में बहुत अहमियत है. वे प्रशासन की भूल भुलैया में खो गए होते यदि वे यहां रहते हुए लिखने पढ़ने की दुनिया में न आए होते.
'केशव, कहि न जाइ का कहिये' के संस्‍मरणों में साधारणता का बहाव है. कुल सत्रह आलेखों में उन्‍होंने अपने प्रशासनिक एवं जीवनानुभवों को तथ्‍यात्‍मक रूप से यहां उकेर दिया है. खूबी यह कि वे अपने नैरेशन में हवाई किले नहीं बांधते. कांकेर में बाजार, कचहरी, पोस्‍ट आफिस सबका रोचक विवरण उन्‍होंने दिया है. कांकेर में समय अच्‍छा गुजरा, वहीं उनकी शादी हुई. वहीं उनकी क्रिकेट टीम बनी, एक से एक नायाब किस्‍से कांकेर के हैं उनके पास. एक किस्‍सा उन्‍होंने जगदलपुर के कलेक्‍टर डॉ ब्रह्मदेव शर्मा का बयान किया है, जो कि एक लेखक भी थे, कि कैसे एक बिल का भुगतान समय पर न करने के लिए उन्‍होंने बैंक के एक मैनेजर से बैंक को टेक ओवर करने की धमकी दे दी तो उसके हाथ पांव फूल गए और बिल का भुगतान करना पड़ा. यहां रह कर उन्‍होंने आदिवासियों की सरलता देखी कि कैसे वे एक किलो नमक के बदले एक किलो चिरौंजी दे दिया करते थे और तिस पर वे अपने को ठगा हुआ नहीं मानते थे. यही सरलता शायद आगे चल कर उनके उपन्‍यास 'भूलनकांदा' में प्रकट हुई है.
इन संस्‍मरणों में तहसीलदार के रूप में उनके अनुभव खुल कर प्रकट हुए हैं. पैरी नदी में नाव और नाव में तहसीलदार और अगले एकाधिक अध्‍यायों में ये अनुभव दर्ज करते हुए उन्‍होंने राजस्‍व जीवन की पेचीदगियों को भी सामने रखा है. इस दौरान उन्‍होंने कलेक्‍टर हर्ष मंदर के साथ भी काम किया, जो अपने समय के ईमानदार अधिकारियों में जाने जाते थे. कांकेर पहाड़ियों से घिरा इलाका है सो कांकेर की पहाड़ियों के रोचक वृत्‍तांत उन्‍होंने बुने हैं. यानी जैसे कि पहाड़ इतना कि खिड़की खोलो और छू लो. नवंबर 2000 में छत्‍तीसगढ़ राज्‍य बना तो उसके बनने की कथा भी उन्‍होंने दर्ज की है. छत्‍तीसगढ़ राज्‍य बनते ही 2001 में रायपुर में उनकी पदस्‍थापना हुई, तब से सेवानिवृत्‍ति तक तो रहे ही, उसके बाद भी वे संविदा पर लगभग छह साल पदस्‍थ रहे. यहीं 'भूलनकांदा'  के लिखने की शुरुआत हुई और बाद में दूसरा उपन्‍यास खैरागढ़ नांदगांव करघे पर आया. विष्‍णु खरे व चंद्रकांत देवताले से मुलाकातों के हवाले उन्‍होंने दर्ज किए हैं. उनके प्रशासन में रहते कई कार्यक्रमों में लेखकों की आवाजाही रही. केदारनाथ सिंह, नरेश सक्‍सेना, विष्‍णु खरे, नामवर सिंह कौन नहीं आया. रायपुर आए तो विनोदकुमार शुक्‍ल, रमेश अनुपम आदि से नजदीकियां पनपीं. कथाकार तेजिंदर से भी निकटता रही. मुख्‍यमंत्री डॉ रमन सिंह के करीबी अधिकारी होने के नाते संजीव बख्‍शी की उदारता से लोगों का मिलना-जुलना मुख्‍यमंत्री से सहज ही हो जाता था. यही वह दौर था जब 'भूलनकांदा' का फिल्‍मांकन शुरू हुआ 'भूलन द मेज' के रूप में. इसे देश विदेश में कई अवार्ड मिले. 'भूलनकांदा' ने उनके लेखकीय कद के साथ समाज में भी एक पहचान दी है.
कहना न होगा कि रायपुर आकर उनकी साहित्‍यिक यात्रा परवान चढ़ी. वे हिंदी के मुख्‍य धारा के रचनाकार बनते गए. कई कविता संग्रहों में अनेक यहीं रह कर लिखे गए. कई नामचीन पत्रिकाओं में छपने का सिलसिला चलता रहा. गद्य में हाथ रवां हुआ. इस संस्‍मरण सीरीज का आखिरी संस्‍मरण हरिओम नाम से है, जिसमें स्‍वामी निरंजनानंद जी के दर्शन का आख्‍यान दिया है कि कैसे उनसे राजनांद गांव में दीक्षा लेने के बाद वे मुंगेर आश्रम उनके दर्शन के लिए गए. कुल मिला कर उनके जीवन की सारी घटनाएं और स्‍मृतियां इस संस्‍मरण में गुंथी हुई हैं. उन्‍हें अपने घटना बहुल जीवन में साहित्‍य के लिए जो वक्‍त मिला, जो कुछ रचा, यत्र-तत्र जहां-जहां वे छपे, उसका ब्‍यौरेवार विवरण उन्‍होंने यहां दिया है. अब जिसका जीवन आदिवासी बहुल जीवन से होता हुआ नई-नई बनी राजधानी में आकर एक पड़ाव पर ठहर गया हो, जहां उनके भीतर का लेखक अपनी अब तक की अनकही को सिलसिलेवार दर्ज कर रहा हो, उसे कहना आसान तो नहीं. ऐसे में वे 'केशव, कहि ना जाइ का कहिये'- न कह उठें तो क्‍या करें.
अपने जिये-रचे को पूरा-पूरा कह पाना दुस्‍साध्‍य तो नहीं पर मुश्किल अवश्‍य है. फिर भी बहुत रोचक अंदाज में संजीव बख्‍शी ने अपने जीवन का अब तक का सब कुछ किया धरा यहां पर व्‍यक्‍त किया है जिसे पढ़ते हुए बहुत संतोष का अनुभव होता है.
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पुस्तकः केशव, कहि ना जाइ का कहिये
लेखक: संजीव बख्‍शी
भाषाः हिंदी 
विधाः संस्मरण
प्रकाशक: अंतिका प्रकाशन
पृष्ठ संख्याः 208
मूल्यः 490 रुपए

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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

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