जीवन के कठोर सत्य को परिभाषित करता मधु कांकरिया का उपन्यास 'हम यहां थे'

मधु कांकरिया ने अपने उपन्यास 'हम यहां थे' में बहुत ही सहज और आसान भाषा में एक सामान्य स्त्री के जीवन संघर्ष को शब्दों में पिरोया है.

Advertisement
मधु कांकरिया का उपन्यास 'हम यहां थे' का कवर [सौजन्यः किताबघर प्रकाशन] मधु कांकरिया का उपन्यास 'हम यहां थे' का कवर [सौजन्यः किताबघर प्रकाशन]

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 12 जुलाई 2019,
  • अपडेटेड 10:08 AM IST

मधु कांकरिया का उपन्यास 'हम यहां थे' की पृष्ठभूमि को दीपशिखा के इस एक वाक्य से समझा जा सकता है कि 'जंगल कुमार! सफलता-असफलता कुछ नहीं होती. असली चीज होती है आपके जीवन का ताप कितनों तक पहुंचा. जीवन का अर्थ है अपने पीछे कुछ निशान छोड़ जाना.'  इस उपन्यास में लेखिका ने बड़े ही सहज और आसान भाषा में एक सामान्य स्त्री के जीवन संघर्ष को शब्दों में पिरोया है.

कोलकाता की पृष्ठभूमि पर लिखे गये इस उपन्यास में इस महानगर की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक स्थितियों का बखूबी वर्णन किया गया है. उपन्यास के दो मुख्य चरित्र हैं - दीपशिखा और जंगल कुमार. दोनों अलग-अलग पृष्ठभूमि और अलग-अलग शहर से आए लेकिन लक्ष्य की समानता उनको जीवन पथ पर अभिन्न बना देती है.

यह उपन्यास दीपशिखा के संघर्ष से शुरू होता है. घरेलू हिंसा की शिकार दीपशिखा अपने पति का घर छोड़ अपने छोटे बेटे सोनू के साथ मायके आ जाती है. यहां अपने वजूद को तलाशती दीपशिखा कंप्यूटर का कोर्स ज्वाइन करती है और एक जगह प्रोग्रामर की नौकरी भी पा लेती है.

जहां दीपशिखा एक ओर खुले विचारों वाली लड़की थी वहीं उसकी मां रूढ़िवादी और दकियानूसी सोच पर विश्वास रखने वाली. दोनों की सोच में जमीन-आसमान के अंतर के चलते घर में रोज़ क्लेश होता है. ऐसे में तपती धूप में जैसे घना वृक्ष राहत देता है ठीक उसी तरह दोनों के बीच एक पुल का काम करते हैं दीपशिखा के बड़े भाई अतुल.

'...सोचो, हम दोनों ही बेहद पढ़ी-लिखी थीं, हम दोनों ने ही सोचा था कि हमारा जीवन संवर गया पर हुआ क्या, शादी के लिए लड़का तो इसी दकियानूसी और स्त्री-विरोधी समाज में ही ढूंढ़ना पड़ा. शादी के घेरे से निकल जाएं तो प्रेमी भी तो इसी समाज से मिलेंगे. आज समझ पाई हूं कि सर्वोच्च जीवन मूल्य हमें हासिल हो इसके लिए जरूरी है कि इन मूल्यों को ग्रहण करने वाला आधारभूत ढांचा तैयार हो.'

लेखिका इस प्रसंग में जिस तरह से महिलाओं के जीवन संघर्ष के अनछुए किस्से और पहलुओं का जिक्र करती है वह पाठक को सोचने पर मजबूर कर देता है कि एक स्त्री भले ही दुनिया के किसी भी कोने में हो उसका जीवन कभी न खत्म होने वाली एक जंग है.

मधु कांकरिया इक्कीसवीं शताब्दी में भी समाज में फैली ऊंच-नीच की जड़ों पर भी निगाह डालती हैं और उनपर तीखा प्रहार करती हैं. लेखिका ऐसे लोगों की मानसिकता पर तीखा वार करती है, जिनको ऊंचे कुल में जन्म लेने का घमंड होता है,

'सुदामा ने भी ईमानदारी से अपनी भावना प्रकट करते हुए तगड़ा जवाब दिया- 'मां जी इतना धर्म आप करती हैं और इतना नहीं जानती कि सबकी माटी एक है. खून का रंग एक है. हम लोगों को छोटी जाति का बोलती हैं पर आप हमारा काम नहीं सिर्फ चाम देखती हैं. अब आप ही बताइए कौन है छोटी जाति का? आपसे बदला भगवान ने लिया. साड़ी, बाथरूम की बाल्टियां, पानी की टंकी तक को आप मुझसे दूर रखतीं कि कहीं छुआ न जाए...'

घर और ऑफिस के बीच कटती दीपशिखा की जिंदगी में एक दिन अचानक रंग भर जाता है. एक संस्था, दीपशिखा को आदिवासी संस्कृति और जीवन से अवगत कराने के लिए तीन दिनों की वनयात्रा आयोजित करती है, जिसमें दीपशिखा जाती है. आदिवासियों का जीवन और संघर्ष दीपशिखा को बदल कर रख देता है. आदिवासियों के बीच जाकर उनके संघर्ष में सहभागी बनकर दीपशिखा अपने जीवन को दिशा देती है.

मधु कांकरिया ने अद्भुत ढंग से आदिवासी अस्मिता और संघर्ष को शब्द दिए हैं. प्रकृति की मनुष्यों द्वारा हुई बेहाल व्यवस्था पढ़कर मन विचलित हो उठता है. जंगलों की अंधाधुध कटाई और जंगली जानवरों को बेघर होते देख जिस खतरे की ओर लेखिका इशारा करती है उसकी अनदेखी कर भविष्य की ओर देखना संभव नहीं है.

मानव मन के गहरे स्तरों को छूती यह कहानी जीवन के दर्द और सौंदर्य, प्रेम और उदासी को अद्भुत ढंग से रचती है. 'हम यहां थे' जीवन में व्याप्त करुणा, प्रतिरोध, संघर्ष, स्वप्न, संकल्प और समर्पण का अनुसंधन है. किसी ने कहा था कि लक्ष्यहीन जीवन भ्रष्ट और दयनीय होता है. यह जीवन सत्य धीरे-धीरे उपन्यास की नायिका या केंद्रीय अस्मिता दीपशिखा के भीतर आकार लेता है, जिसको वृत्तांत का रूप देने के लिए मधु कांकरिया ने डायरी का शिल्प अपनाया है.

'हम यहां थे' एक ऐसा उपन्यास है जो जीवन के कठोर सत्य को वर्तमान के तीखे प्रकाश में परिभाषित करता है. खुले गगन के लाल सिता, सलाम आखरी, पत्ता खोर, सेज पर संस्कृत और सूखते चिनार जैसे उपन्यासों से हिंदी पाठकों के दिल पर राज करने वाली मधु कांकरिया का यह उपन्यास भी पाठकों के दिल और दिमाग पर बेशक ही एक अलग छाप छोड़ेगा.
***

पुस्तकः हम यहां थे
लेखिका: मधु कांकरिया
विधाः उपन्यास
प्रकाशकः किताबघर प्रकाशन
मूल्यः  300/ रुपए पेपर बैक, 590/ रुपए हार्ड बाउंड
पृष्ठ संख्याः 295

Advertisement

# इस पुस्तक की समीक्षा ईशी कानोडिया ने की है.

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement