केवल मधुशाला भर नहीं हैं बच्चन, जयंती पर चुनी हुई श्रेष्ठ कविताएं

हरिवंश राय बच्चन हालावाद के प्रतिनिधि कवि थे, पर उनका लेखन इससे विशद था. आज उनकी जयंती पर 'बच्चन रचनावली' से ली गईं उनकी चुनी हुई कविताएं

बच्चन रचनावली के एक खंड का कवर [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन]
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 27 नवंबर 2019,
  • अपडेटेड 5:08 PM IST

आज हरिवंश राय बच्चन की जयंती है. वह हालावाद के प्रतिनिधि कवि थे और उन्होंने मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश, निशा-निमन्त्रण, एकान्त संगीत, आकुल अन्तर, सतरंगिनी, हलाहल, बंगाल का काल, खादी के फूल, सूत की माला, मिलन यामिनी, प्रणय पत्रिका, धार के इधर-उधर, आरती और अंगारे, बुद्ध और नाचघर, त्रिभंगिमा, चार खेमे चौंसठ खूँटे, दो चट्टानें, बहुत दिन बीते, कटती प्रतिमाओं की आवाज, उभरते प्रतिमानों के रूप, जाल समेटा, अतीत की प्रतिध्वनियाँ, प्रारम्भिक रचनाएँ, नयी से नयी पुरानी से पुरानी जैसे काव्य संकलनों से हिंदी साहित्य जगत में एक अलग छाप छोड़ी.बच्चन की आत्मकथा क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक को भी हिंदी साहित्य जगत में खूब सराहना मिली. राजकमल प्रकाशन ने जब अजित कुमार द्वारा संपादित ग्यारह खंडों में बच्चन रचनावली छापी तो उसके परिचय को हिंदी साहित्य और कविता की स्थिति से जोड़ दिया. इस पुस्तक के बारे में लिखा है- हिंदी कविता का एक दौर वह भी था जब हिंदीभाषी समाज को जीवन के गंभीर पक्ष में पर्याप्त आस्था थी, और कविता भी अपने पाठक-श्रोता की समझ पर भरोसा करते हुए, संवाद को अपना ध्येय मानकर आगे बढ़ रही थी. हिंदी साहित्य के उस दौर में मनोरंजक कविता और गंभीर कविता का कोई विभाजन नहीं था; न मनोरंजन के नाम पर शब्दकारों-कलाकारों आदि के बीच जनसाधारण की कुरुचि और अशिक्षा का दोहन करने की वह होड़ थी, जिसके आज न जाने कितने रूप हमारे सामने हैं, और न कविता में इस सबसे बचने की कोशिश में जन-संवाद से बचने की प्रवृत्ति. हरिवंश राय बच्चन उसी काव्य-युग के सितारा कवि रहे हैं. हरिवंश राय बच्चन ने न सिर्फ मंच से अपने पाठकों-श्रोताओं से संवाद किया बल्कि लोकप्रियता के कीर्तिमान गढ़े. कविता की शर्तों और कवि-रूप में अपने युग-धर्म का निर्वाह भी किया और जन से भी जुड़े रहे. यह रचनावली उनके अवदान की यथासम्भव समग्र प्रस्तुति है. साहित्य आजतक पर पढ़िए 'बच्चन रचनावली' से ली गई उनकी चुनिंदा कविताएं.***सत्य की हत्याआज सत्यअसह्य इतना हो गया हैकान में सीसा गलाढलवा सकेंगे,सत्य सुनने को नहीं तैयार होंगे;आँख पर पट्टी बँधा लेंगे,निकलवा भी सकेंगे,रहेंगे अन्धे सदा को,सत्य देखेंगे नहीं पर;घोर विषधर सर्प,लोहे की शलाका, गर्म, लाल,पकड़ सकेंगे मुठ्ठियों में,उँगलियों से सत्यछूने की नहीं हिम्मत करेंगे।इसलिए चारो तरफ़ षड्यन्त्र हैउसके गले को घोंटने का,या कि उस पर धूल-परदा डालने का,या कि उसको खड़ा, जिन्दा गाड़ने का।किन्तु वे अपनी सफलता पर न डालें।सत्य तो बहरूपिया है।सत्य को ज़िन्दा अगर वे गाड़ देंगे,पच न धरती से सकेगा,फ़सल बनकर उगेगा,जो अन्न खायेगाबनेगा क्रान्तिकारी।सत्य पर गर धूल-परदा डाल देंगे,वह हटा कर-फाड़ कर के नग्न ।रस्मी लाज को धक्का लगायेगा,सभी का ध्यान आकर्षित करेगा।गला घोंटगे अगर उसकाकिसी कवि-कण्ठ में वह छटपटायेगा,निकलकर, गीत बनकरहृदय में हलचल मचायेगा।***मिलावट का युगमैं भीइस बात का पैरोकार हूँकि हमें सत्य कहने का अधिकार होना चाहिएऔर हम गर्व से हैं कहतेकि हमारी सरकार का तो यह आदर्श-वाक्य ही हैकि सत्यमेव जयते !पर सब जानते हैंकि यह युग है मिलावट का-खाद्य पदार्थों में मिलावट हैजिससे हम पाल रहे हैं तरह-तरह के रोग,शराब में मिलावट हैजिससे बीमार पड़ने, अन्धे होने,मरनेवालों की अक्सर छपती है रिपोर्ट;जीवनदायी दवाओं के नाम पर,हमें मालूम भी नहीं पड़ताकि हम पी रहे हैं जहरीले घूँट;लेकिन, लेकिन,मैं अपनी दोनों भुजाएँ ऊर्ध्व उठाकर उद्घोष करता हूँकि मिलावटों मेंकोई भी नहीं होता इतना ख़तरनाकजितना सत्य के साथ मिला हुआ झूठ।हाँसत्य में झूठ-यानी कल्पना-मिलाने का अधिकारपरम्परा से पाये हुए हैं केवल कवि, हम,क्योंकि हम सत्य कोप्रस्तुत करते हैं बनाकरशिवम् और सुन्दरम्!***एक समय थाएक समय थाजब अन्याय अत्याचार को भय थाकि इसके विरोध मेंआवाजें उठेंगे,हाथ उठेंगे,हथियार उठेंगे।नौजवानों के ही नहीं,जिनके दिलों में जोश होता है,खून में गर्मी होती है औरआक्रोश होता है जिनकीतनी हुई भौहों में,वृद्धों के भी;क्या वृद्ध थे वे !जब रावण---दस शीश-बीस भुजा--सीता हरण कर चला थाऔर जटायु ने उससे युद्ध किया था-अकेले-चोंच से, पंजों से, पंखों से,तब उसकी उम्र क्या थी ?मुझसे न पूछे,वाल्मीकि से पूछे।और आज लोग-लाख-हा-लाख-निबलों के वध,और अबलाओं पर बलात्कार की खबरें-रोज़-ब-रोज-सुबह की चाय में घोलकर-पीकरया सिगरेट की दो-चार कशों में खींचकमोड पर जा बैठते हैं!***जो बीत गयीजो बीत गयी सो बात गयी!जीवन में एक सितारा था,माना, वह बेहद प्यारा था,कितने इसके तारे टूटे,कितने इसके प्यारे छूटे,जो छूट गये फिर कहाँ मिले;पर बोलो टूटे तारों परकब अम्बर शोक मनाता है।जो बीत गयी सो बात गयी !जीवन में वह था एक कुसुम,थे उस पर नित्य निछावर तुम,वह सूख गया तो सूख गया;मधुवन की छाती को देखो,सूखी कितनी इसकी कलियाँमुरझाई कितनी वल्लरियाँ,जो मुरझाई फिर कहाँ खिले ;पर बोलो सूखे फूलों परकब मधुवन शोर मचाता है!जो बीत गयी सो बात गयी!जीवन में मधु का प्याला था,तुमने तन-मन दे डाला था,वह टूट गया तो टूट गया;मदिरालय का आंगन देखो,कितने प्याले हिल जाते हैं,गिर मिट्टी में मिल जाते हैं,जो गिरते हैं कब उठते हैं;पर बोलो टूटे प्यालों परकब मदिरालय पछताता है!जो बीत गयी सो बात गयी !मृदु मिट्टी के हैं बने हुए,मधुघट फूटा ही करते हैं,लघु जीवन लेकर आये हैं,प्याले टूटा ही करते हैं,फिर भी मदिरालय के अन्दरमधु के घट हैं, मधुप्याले हैं, जो मादकता के मारे हैं,वे मधु लूटा ही करते हैं;वह कच्चा पीनेवाला हैजिसकी ममता घट-प्यालों पर,जो सच्चे मधु से जला हुआकब रोता है, चिल्लाता है!जो बीत गयी सो बात गयी!***पुस्तकः बच्चन रचनावली लेखक: हरिवंश राय बच्चनविधाः कविता प्रकाशनः राजकमल प्रकाशन

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