प्रेम इस तरह किया जाएः गीत चतुर्वेदी के जन्मदिन पर उनकी कविताएं

नामवर सिंह ने गीत चतुर्वेदी को इक्कीसवीं सदी के पहले दशक का अपना प्रिय कवि व कथाकार बताया था. उनके जन्मदिन पर साहित्य आजतक पर पढ़िए कुछ कविताएं.

न्यूनतम मैं का कवर [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन]
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 27 नवंबर 2019,
  • अपडेटेड 6:50 PM IST

नामवर सिंह ने गीत चतुर्वेदी को इक्कीसवीं सदी के पहले दशक का अपना प्रिय कवि व कथाकार बताया था. गीत चतुर्वेदी 27 नवंबर 1977 को मुंबई में पैदा हुए और  'आलाप में गिरह' और 'न्यूनतम मैं' नामक कविता-संग्रहों से कवि के रूप में अपनी एक खास पहचान बनाई. इसी बीच उनकी कहानियों की दो किताबें सावंत आंटी की लड़कियाँ व पिंक स्लिप डैडी आई. कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, गल्प के लिए कृष्ण प्रताप कथा सम्मान से नवाजे गए इस युवा रचनाकार के जन्मदिन पर साहित्य आजतक पर पढ़िए कुछ कविताएं.ये कविताएं गीत चतुर्वेदी के संकलन 'न्यूनतम मैं' से ली गई हैं, जिसके बारे में विष्णु खरे ने लिखा था, 'गीत चतुर्वेदी की काव्य-निर्मिति और शिल्प की एक सिफत यह भी है कि वे 'यथार्थ' और 'कल्पित', ठोस और अमूर्त, संगत से विसंगत, रोज़मर्रा से उदात्त की बहुआयामी यात्रा एक ही कविता में उपलब्ध कर लेते हैं.' तो पढ़िए ये कविताएं ***न्यूनतम मैंवह फ़ोटो जो मैंने कभी नहीं खींचाउसमें मैं सड़क पर भटक रहामैं एक पेड़ से कूद रहापानी से खौफ़ के बावजूद पानी में तैर रहा उसमें मैं कुछ लोगों से छिप रहाकुछ लोगों से कह रहा कि मुझे देख लोकुछ लोग मुझे मार रहे थेमैं भी कुछ लोगों को मार रहा था उसमें एक गुमटी पर चाय पीता मैंअचानक किसी जुलूस में शामिल हो गया उसमें एक इमारत की बाल्कनी में सिर झुकाए बैठा मैंसड़क पर भटकते मैं से लेकरपेड़ से कूदते मैं तकतमाम मैं को देख रहा था जब भी मैं मैं लिखता हूँमैं न्यूनतम मैं होता हूँ* वह फ़ोटो जो मैंने कभी नहीं खींचीउसमें एक दरवाज़े के किनारे स्टूल पर बैठा हूँ मैंकिसी दरबान की तरहअनधिकार प्रवेश की चेष्टाओं को रोकता मैं यह फ़ोटो कभी नहीं खींच पायामैं इस फ़ोटो से निकल जाना चाहता हूँ बाहर का रास्ता भीतर वाले कमरे से होकर गुज़रता है *ये दो पंक्तियाँ ऑस्कर वाइल्ड की कुछ बातों को जोड़ने से बनी हैं।***तुम्हारा शुक्रवारतुमने कहा था कि तुम पेड़ इसलिए नहीं होकि तुमने कभी पत्ते नहीं पहनेफिर भी मैं तुम्हारी छाँह में बैठाऔर तुम्हारे पत्तों से ढँका अँधेरा देखा मैं तुम्हारी तस्वीर कभी नहीं बना सकताकुछ आकार मैंने इससे पहले कभी नहीं जानेइतने ज़्यादा कोण मिल जाएँतो सिर्फ़ वृत्त बनता है जो हमने साथ गुज़ाराइस पूरे दिन को भविष्य में प्रवेश के लिएएक छद्म नाम चाहिए होगाहम अपनी देह एक-दूसरे से छिपा ले जाएँगेकिसी दिन हम अपने शब्दों से बनाएँगेएक-दूसरे का रूपऔर बिना बताए अपने पास रख लेंगे तुम हर सुबह मेरी आवाज़ सुनोगीजो मैंने तुम्हारे कानों तक नहीं भेजीएक दिन तुम्हारे पास अपनी कोई देह न होगीसिर से पाँव तक मेरी लहराती हुई फुसफुसाहट होगी वह देहमेरी आवाज़ की गूँज से बनी मीनार होगी तुम्हारी आत्मा हम कभी नहीं मिले फिर भीजो हमने साथ गुज़ाराइस पूरे दिन को भविष्य में प्रवेश के लिएभविष्य की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी जैसे तुममें समाने के लिए तुम्हारी ज़रूरत भी कहाँ पड़ी थी मुझे इस धरती पर तुम कहीं नहीं रहतीं सिवाय मेरी बातों केऔर मैं भी कहीं नहीं हूँ सिवाय तुम्हारी बातों केहम दोनों ने ही घर बदल लिया है***  चोरीप्रेम इस तरह किया जाएकि प्रेम शब्द का कभी ज़िक्र तक न हो चूमा इस तरह जाएकि होंठ हमेशा गफ़लत में रहेंतुमने चूमाया मेरे ही निचले होंठ ने औचक ऊपरी को छू लिया छुआ इस तरह जाएकि मीलों दूर तुम्हारी त्वचा परहरे-हरे सपने उग आएँ तुम्हारी देह के छज्जे के नीेचमुँह अँधेरे जलतरंग बजाएँ रहा इस तरह जाएकि नींद के भीतर एक मुस्कानतुम्हारे चेहरे पर रहे जब तुम आँख खोलो, वह भेस बदल ले प्रेम इस तरह किया जाएकि दुनिया का कारोबार चलता रहेकिसी को ख़बर तक न हो कि प्रेम हो गया ख़ुद तुम्हें भी पता न चले किसी को सुनाना अपने प्रेम की कहानीतो कोई यक़ीन तक न करे बचना प्रेमकथाओं का किरदार बनने सेवरना सब तुम्हारे प्रेम पर तरस खाएँगे***  पंचतत्त्वमेरी देह से मिट्टी निकाल लो और बंजरों में छिड़क दोमेरी देह से जल निकाल लो और रेगिस्तान में नहरें बहाओमेरी देह से निकाल लो आसमान और बेघरों की छत बनाओमेरी देह से निकाल लो हवा और कारख़ानों की वायु शुद्ध कराओमेरी देह से आग निकाल लो, तुम्हारा दिल बहुत ठंडा है***पुस्तकः न्यूनतम मैं लेखक: गीत चतुर्वेदीविधा: कविताएं प्रकाशन: राजकमल प्रकाशनमूल्य: 300/- रुपए, पेपरबैक पृष्ठ संख्या: 160

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