लंबे जीवन प्रत्याशा यानी लंबे जीवन की उम्मीद रखना स्वस्थ समाज की निशानी है. लेकिन दिल्ली जैसे शहर हर साल 'खतरनाक' स्तर के स्मॉग में लिपटे रहते हैं और यहां रहने वाले लोगों में जीवन प्रत्याशा कम होने का खतरा है. वायु प्रदूषण, खासकर प्रदूषित हवा में पाए जाने वाले सबसे खतरनाक कण PM2.5 के चलते दिल्लीवासियों की जीवन प्रत्याशा (life expectancy) में 17 साल की कमी आ सकती है.
पिछले 20 दिनों के आंकड़े बताते हैं कि दिल्लीवासी विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानक से लगभग 25 गुना अधिक जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं.
20 दिनों में दिल्ली की हवा में PM2.5
इंडिया टुडे की डाटा इंटेलीजेंस यूनिट (DIU) ने दिल्ली में PM2.5 के स्तर का विश्लेषण किया और उसे एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स (AQIL) के साथ मैप किया. AQIL जीवन प्रत्याशा पर वायु गुणवत्ता के प्रभाव का अनुमान लगाने के लिए एक सांख्यिकीय मॉडल है कि जन्म के समय से लेकर कोई व्यक्ति कितने वर्षों तक जीने की आशा रख सकता है. पिछले 20 दिनों ( 1 नवबंर से 19 नवबंर तक) में दिल्ली की हवा में PM2.5 का औसत स्तर 254 रहा है जो 2018 की इसी अवधि की तुलना में 30 अंक ज्यादा है.
हालांकि, यह स्तर पूरे साल नहीं रहता, लेकिन खतरनाक प्रदूषकों का स्तर ऐसे ही बढ़ता रहा तो खराब हवा के कारण दिल्ली में जीवन प्रत्याशा (LIFE EXPECTANCY) आने वाले दिनों में और कम हो सकती है. प्रदूषण को कम करके हम अपनी जीवन बढ़ा सकते है. इसके चलते दिल्लीवासी अपने अपेक्षित जीवन से लगभग 17 साल कम जी सकते हैं. हालांकि, यह अनुमान राजधानी में मौजूदा PM2.5 के स्तर के आधार पर है.
शिकागो विश्वविद्यालय के एनेर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के माइकल ग्रीनस्टोन और क्लेयर किंग फैन ने अपने AQIL उपकरण के जरिये 2016 के PM2.5 डेटा का विश्लेषण किया. उन्होंने पाया कि दिल्ली का निवासी प्रदूषण के कारण औसतन लगभग 10 वर्ष कम जीवित रहेगा जबकि बीजिंग में रहने वाला 6 साल कम और लॉस एंजिल्स में रहने वाला एक साल कम जिएगा. परिस्थितियों से ऐसा लगता है कि पिछले तीन सालों में हालात और बदतर ही हुए हैं.
हालात पहले से बदतर
हवा में पाया जाने वाला प्रदूषक PM2.5 सूक्ष्म कण है जो आदमी के बाल की मोटाई का मात्र 3 प्रतिशत होता है. यह आदमी के रक्त प्रवाह में तेजी से प्रवेश करता है और खून में थक्के (clots) बना देता है जिससे रक्त प्रवाह बाधित होता है जो कि अन्य कई रोगों के अलावा हृदयाघात का कारण बनता है. PM2.5 प्रदूषक की वजह से 2017 में दुनिया भर में लगभग 30 लाख मौतें समय से पहले हुईं. इनमें से आधी मौतें भारत और चीन में हुईं.
द स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर रिपोर्ट 2019 कहती है, 'वायु प्रदूषण दुनिया भर में मृत्यु दर का पांचवां प्रमुख कारक है. कुपोषण, शराब और शारिरिक निष्क्रियता की तुलना में वायु प्रदूषण की वजह से ज्यादा मौतें होती हैं. हर साल सड़क दुर्घटना या मलेरिया की तुलना में वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियों से अधिक लोग मरते हैं.'
प्रदूषण से कम हो रही जिदंगी
वैश्विक स्तर पर वायु प्रदूषण की वजह से जीवन प्रत्याशा में औसतन एक वर्ष और आठ महीने की कमी आती है. ग्राफ में यह धूम्रपान के ठीक नीचे है लेकिन प्रदूषित पेयजल और फेफड़ों के कैंसर से ऊपर है.
पिछले 28 वर्षों के आंकड़ों से पता चलता है कि PM2.5 की उच्च सांद्रता (high concentration) हमेशा तबाही साबित हुआ है. 2017 में वायु प्रदूषण की वजह से दुनिया भर में 50 लाख मौतें हुईं. हालांकि, भारत में वायु प्रदूषण के चलते मृत्यु दर बहुत ज्यादा, 1,00,000 लोगों पर 134 है, जबकि वैश्विक औसत 1,00,000 पर 64 है.
वायु प्रदूषण 40 फीसदी मौतें के लिए जिम्मेदार
वायु प्रदूषण का बीमारियों से घनिष्ट संबंध है. इसकी वजह से श्वसन संबंधी रोग, हृदय रोग, दौरा, फेफड़ों का कैंसर और डायबिटीज जैसे रोग होते हैं. द स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर रिपोर्ट 2019 के मुताबिक, वायु प्रदूषण वैश्विक स्तर पर फेफड़ों संबंधी रोगों से वाली 40 फीसदी मौतें के लिए जिम्मेदार है. वायु प्रदूषण वैश्विक स्तर पर टाइप टू डायबिटीज से होने वाली 20 प्रतिशत मौतों के लिए, 19 प्रतिशत फेफड़े के कैंसर से होने वाली मौतों के लिए, 16 प्रतिशत हृदय रोग से होने वाली मौतों के लिए और 11 प्रतिशत दौरे से होने वाली मौतों के लिए जिम्मेदार है.
हाल ही में दिल्ली की हवा में जहरीले प्रदूषकों का स्तर इतना ज्यादा गंभीर हो गया कि दिल्ली सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया. उत्तर भारत में गंभीर स्तर का प्रदूषण मुख्य रूप से थर्मल पॉवर इंडस्ट्री, वाहनों और किसानों के पराली जलाने के कारण होता है.
दीपू राय