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भारत

1962 के चीन युद्ध में नेहरू की शर्त ने रोकी थी इजरायल से मिल रही मदद

aajtak.in
  • 05 जुलाई 2017,
  • अपडेटेड 12:36 PM IST
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पीएम नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा को लेकर चर्चा ये हो है कि क्या भारत अरब वर्ल्ड के साथ पारपंरिक संबंधों से इतर तो नहीं जा रहा तब इतिहास के पन्ने बताते हैं कि 62 , 71 और 99 के  करगिल युद्ध के वक्त इजरायल ने गुपचुप तरीके से भारत की मदद की थी. भारत ने बिना राजनयिक संबंधों के इजरायल से मदद मांगी थी. जानें- कब- कब इजरायल ने की भारत की मदद.

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1962 भारत- चीन युद्ध: 1962 का युद्ध तो चीन का भारत की पीठ में छुरा घोंपने जैसा था. भारत युद्ध के मैदान में जा पहुंचा था लेकिन भारत की हालत ठीक नहीं थी. जिन जवाहर लाल नेहरू की अगुवाई में इजरायल गठन के विरोध में भारत ने 1950 में संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग की थी, उन्हीं नेहरू ने 1962 युद्ध के वक्त इजरायल से मदद मांगी. इजरायल मदद के लिए फौरन तैयार हो गया लेकिन नेहरू ने इजरायल के सामने एक शर्त रख दी.

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शर्त यह थी कि जिस शिप से हथियार भेजे जाएं, उस पर इजरायल का झंडा ना हो और दूसरे सभी हथियारों पर इजरायल की मार्किंग भी नहीं होनी चाहिए. इजरायल के पीएम को बगैर झंडे वाली बात हजम नहीं हुई और इजरायल ने हथियार देने से इंकार कर दिया. बाद में इजरायल के झंडे लगे जहाज को भारत ने मंजूर कर लिया, इसके बाद इजरायली मदद भारत पहुंची.

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1971 का युद्ध: 1971 का युद्ध भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ा गया था. इस युद्ध में अमेरिका ने भारत के खिलाफ ही अपने सातवें बेड़े को भेज दिया लेकिन तब भी इजरायल ने भारत की मदद की. उसने गुपचुप तरीके से भारत को हथियार भेजे और उन्हें चलाने वाले लोग भी. अमेरिकी पत्रकार गैरी बैस की किताब 'द ब्लड टेलीग्राम' में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव पी. एन हक्सर के दस्तावेजों के हवाले से इस बात की जानकारी दी है.

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इस किताब में कहा गया है कि 'जुलाई 1971 में इजरायल की प्रधानमंत्री गोल्डा मायर ने गुप्त तरीके से एक इजरायली हथियार निर्माता से कहा कि वह भारत को कुछ मोर्टार और हथियार मुहैया कराए और साथ ही उन्हें चलाने का प्रशिक्षण देने वाले कुछ लोग भी दे. जब हक्सर ने समर्थन के लिए इजरायल पर जोर डाला तो गोल्डा मायर ने मदद जारी रखने का वादा किया.' जाहिर है इजरायल ने भारत से दोस्ती निभाई.

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1999 करगिल युद्द: 1999 में करगिल युद्ध तो नई पीढ़ी के जहन में भी ताजा है. इस युद्ध से महज सात साल पहले ही भारत ने इजरायल के साथ पूर्ण रूप से राजनयिक रिश्ते के तार जोड़े थे, लेकिन महज सात साल की औपचारिक दोस्ती को इजरायल ने युद्ध में निभाया.

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इस युद्ध के लिए इजरायल ने भारत को हेरॉन और सर्चर यूएवी दिए, जिनकी मदद से कारगिल की तस्वीरें ली गईं थीं. उसने भारत को मानवरहित विमान भी उपलब्ध कराए.

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इतना ही नहीं इजरायल ने सैटेलाइट से ली गई उन तस्वीरों को भी भारत से साझा किया, जिसमें दुश्मन के सैन्य ठिकाने दिख रहे थे.

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इजरायल ने भारत को बोफोर्स तोप के लिए गोला बारूद मुहैया कराया. भारतीय वायु सेना को मिराज 2000 एच युद्धक विमानों के लिए लेजर गाइडेड मिसाइल भी उपलब्ध कराए.

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यानी जिस दौर में इजरायल से कोई रक्षा समझौता भारत ने किया ही नहीं उस दौर में इजरायल ने भारत को हथियार दिये और अब इजरायल के साथ खुले तौर पर रक्षा संबंधों का दायरा इतना बड़ा हो चला है कि प्रधानमंत्री की यात्रा से पहले ही रक्षा क्षेत्र में एकमुश्त कई बड़ी डील की तैयारी हो चुकी है. पीओके में आतंकियों के ट्रेनिंग कैंप को तबाह करने वाले मिसाइलों से लैस ड्रोन भारत को मिलने वाला है. 17 हजार करोड़ की मिसाइल डील को भारत मंजूरी दे चुका है.

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करगिल युद्ध खत्म हुआ तो इजरायल ने भारत को सैन्य ट्रेनिंग भी उपलब्ध कराई थी. दरअसल कारगिल से पहले होता ये था कि सर्दी के मौसम में भारत की सेना पहाड़ों से नीचे आ जाती थी क्योंकि बहुत बर्फ और ठंड होती थी. इसी का फायदा उठाकर पाकिस्तानी सेना ने खाली बंकरों पर कब्जा किया था. कारगिल युद्ध के बाद इजरायल ने ऐसे इलाके में बने रहने की ट्रेनिंग भी भारतीय सेना को दी.

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