एक खास काम के लिए इस शख्स ने छोड़ दी नौकरी, अब साथ हैं 450 लोग

डिफेंस में युवाओं को ट्रेनिंग देने वाली अपनी अच्छी आमदनी की नौकरी छोड़ कर रवि कालरा अब बेघर लोगों की मदद को ही अपने ज़िन्दगी का मकसद बना चुके हैं. 2007 से वो पूरी तरह इसी काम में जुट गए हैं.

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रव‍ि कालरा रव‍ि कालरा

स्मिता ओझा / रणविजय सिंह

  • नई द‍िल्ली,
  • 11 जनवरी 2018,
  • अपडेटेड 1:48 PM IST

कई बार हम अपनी महंगी गाड़ियों में बैठ कर सड़क किनारे बेघर लोगों को देखते हैं. कई बार अपना मानसिक संतुलन खो चुके लोगों को भी सड़कों पर बदहाल घूमते देखा है. लेकिन उनके लिए हमारे पास कुछ मिनटों के अफसोस और चंद खुले पैसों के सिवा देने के लिए कुछ नहीं होता. अपनी जिन्दगियों में हम इतने उलझे होते हैं कि हमें उनके चहरों के पीछे छुपी मायूसी नहीं दिखती, उनका दर्द नहीं दिखता. लेकिन आज भी हमारे बीच ऐसे लोग मौजूद हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी ऐसे जरूरतमंदों की मदद में लगा दी है. गुरुग्राम के रवि कालरा उन्हीं में से एक है.

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सेवा के लिए अपना सब कुछ छोड़ दिया

डिफेंस में युवाओं को ट्रेनिंग देने वाली अपनी अच्छी आमदनी की नौकरी छोड़ कर रवि कालरा अब बेघर लोगों की मदद को ही अपने ज़िन्दगी का मकसद बना चुके हैं. 2007 से वो पूरी तरह इसी काम में जुट गए हैं. पहले अपने घर पर बेघर बेसहारा और मानसिक संतुलन खो चुके लोगों को ये लाकर उनकी सेवा किया करते थे. आज इनके पास 450 से ज्यादा ऐसे लोग हैं, जिनको अपनों ने ठुकरा दिया है या जो हालात के मारे हैं.

रवि कालरा का कहना है कि, 'शुरुआत में बहुत मुश्किल हुई. घर वालों ने साथ छोड़ दिया. अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी. लेकिन मैं हमेशा से जनता था कि मुझे ये ही करना है. आज मुझे 10 साल हो गए और मैं खुश हूं कि मैं दुसरों के लिए कुछ कर पा रहा हूं.'

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नहीं मिली सरकारी मदद

सरकार की मदद की आस लगाए बैठे रवि कभी भी पैसों की तंगी या जगह की कमी के चलते पीछे नहीं हटे. शुरुआत में काफी दिक्कतों की वजह से इनकी पत्नी और बच्चे इन्हें छोड़ गए. लेकिन बिना हिम्मत हारे आज ये यहां तक पहुचे हैं और यहां आने वाले हर शख्स को अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं.

रवि की इस सराहनीय कोशिश से प्रभावित हो कर अब लोग इनके साथ जुड़ने लगे हैं. लोग कपड़ों से लेकर राशन और रुपयों की मदद इन तक पहुंचाते रहते हैं. गुरुग्राम का ही यादव परिवार अपनी एकलौती पोती का जन्मदिन किसी बड़े होटल की बजाए यहां मनाने पहुंचा है.

उनका कहना है कि, 'हम चाहते थे कि मेरी पोती और पोते में दुसरों के लिए कुछ करने की भावना हो. आज कल सभी अपना अपना करते हैं. लेकिन मेरी कोशिश है कि हमारे बच्चे ऐसे न बनें.'   

रवि कालरा की तरह राशि आनंद भी जरूरतमंदों को एक सम्मानित जीवन देने और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के काम मे जुट गई हैं. ये काम उन्होंने अकेले ही 7 साल पहले शुरू किया था और आज ये दिल्ली एनसीआर के कई बड़ी झुग्गी-बस्ती का एक जाना पहचाना चेहरा हैं.

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राशि कहती हैं, "मुझे बुरा लगता था जब मैं छोटे बच्चों को भीख मांगते देखती थी. मैंने सोचा लिया था इनके लिए ही कुछ करना है. अभी तो शुरआत है, इन लोगों को जगरूक करना मुश्किल है. क्यों कि ये खुद अपने बच्चों से भीख मंगवाते हैं. अभी बहुत काम बाकी है.'

रेड लाइट पर भीख मांगते बच्चो को बेहतर ज़िन्दगी देना और झुग्गी बस्ती में रह रही महिलाओ को स्किल ट्रेनिंग देना अब राशि की ज़िंदगी का लक्ष्य बन गया है. हिस्ट्री ग्रेजुएट और इवेंट मैनेजमेंट में मास्टर्स करने के बाद राशि अगर चाहती तो किसी आम लड़की की तरह नौकरी कर अच्छी आमदनी और आसान जीवन चुन सकती थी पर उसने ये रास्ता नहीं चुना.

रवि कालरा और राशि आनंद जैसे लोग दूसरों के लिए मिसाल हैं. जरूरी नहीं के किसी की मदद अपना सब कुछ लुटा कर की जाए. हम अगर चाहे तो ज़िन्दगी के कुछ पल और थोड़ी सी इंसानियत किसी के जीवन की दशा और दिशा बदलने का काम कर सकती है.

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