1989 की हिंसा को पीछे छोड़ विकास की पटरी पर तेज दौड़ना चाहता है भागलपुर

गंगा किनारे बसा ये शहर अब सौहार्द की मिसाल है और यहां के लोग कुछ चाहते हैं तो बस ये कि भागलपुर भी विकास की पटरी पर तेजी से दौड़े.

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विकास की बाट जोह रहा है भागलपुर (फोटो- आजतक) विकास की बाट जोह रहा है भागलपुर (फोटो- आजतक)

सत्यजीत कुमार

  • रांची,
  • 08 नवंबर 2020,
  • अपडेटेड 2:09 PM IST
  • गंगा जमुनी तहजीब की दुहाई देते हैं लोग
  • भागलपुर को मिल चुका है स्मार्ट सिटी का दर्जा
  • स्मार्ट सुविधाओं का शहर को अभी इंतज़ार

बिहार के भागलपुर का नाम लेते ही आज भी 1989 की हिंसा की खौफनाक यादें जेहन में आ जाती हैं. सिल्क बेल्ट के रूप में जाने जाने वाले इस शहर को 31 साल पहले किसकी नज़र उस वक़्त लग गई थी. आज भी इस बात की चर्चा होने पर भागलपुर वासियों के दिल में टीस उठती है, लेकिन अब सब उसे बहुत पीछे छोड़ कर आगे बढ़ चुके हैं.

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गंगा किनारे बसा ये शहर अब सौहार्द की मिसाल है और यहां के लोग कुछ चाहते हैं तो बस ये कि भागलपुर भी विकास की पटरी पर तेजी से दौड़े. 

तीन दशक से ज्यादा के अर्से में गंगा में न जाने कितना पानी बह चुका. गंगा जमुनी तहजीब की अब यहां के सब लोग दुहाई देते हैं. शीतला स्थान चौक मिरजानहाट में रहने वाले अजय सिन्हा कहते हैं कि यहां सभी धर्मों के लोग भाईचारे से रहते हैं. शहर अब विकास के बारे में सोचता है.

यहां गंगा ब्रिज बनने के बाद पूर्वी बिहार से कनेक्शन पहले से काफी सुगम हो चुका है. स्मार्ट सिटी का दर्जा भी भागलपुर को मिल चुका है, हालांकि स्मार्ट सुविधाओं का शहर को अभी इंतज़ार है.

सांस्कृतिक विरासत की बात की जाए तो ये शहर बहुत समृद्ध है, विक्रमशिला जो नालंदा यूनिवर्सिटी का समकालिक है उसको बौद्ध सर्किट से जोड़ने की मांग है. ये भूमि शरतचंद्र की है.

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बॉलीवुड के प्रख्यात अभिनेता दिवंगत अशोक कुमार और अमर गायक स्वर्गीय किशोर कुमार का यहां ननिहाल रहा है. कहते हैं कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने भी यहां कुछ रचनाओं को जन्म दिया. 

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अजय सिन्हा कहते हैं, “शहरवासी प्रगति पथ पर बढ़ना चाहते हैं, ये तभी संभव है जब यहां तेजी से आर्थिक विकास हो. भागलपुर सिल्क इंडस्ट्री के रिवाइवल की भी बाट जोह रहा है ताकि रोज़गार बढ़े और पलायन रुके.”  

भागलपुर में बुनकरों की समस्या पर धयान देने की ज़रूरत है. यहां फ्रूट और फ़ूड प्रोसेसिंग की असीम संभावना है. गंगा किनारे बसे होने के कारण यहां कतरनी चावल, चूड़ा, केला और तमाम फल खासकर यहां के जर्दालु आम काफी मशहूर हैं. यहां के आम हर साल राष्ट्रपति भवन भी भेजे जाते हैं.  

1989 हिंसा की गवाह मल्लिका बेगम अब 45 साल की हैं. उनका कहना है कि उस अफोसोसजनक घटना पर सिर्फ राजनीति होती रही. जिन्होंने अपनों को खोया, उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ.

मल्लिका बेगम तब महज 14 साल की थीं. उन्हें एक पैर गंवाना पड़ा. किसी तरह जीवन की गाड़ी को आगे खींचने के लिए वे गांव छोड़कर आ गईं लेकिन दुर्भाग्य ने उनका पीछा नही छोड़ा. जिस शख्स से शादी हुई थी वो मुआवजा मिलते ही पैसा हड़प कर उन्हें छोड़ गया.  

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1989 में शहर ने वो खौफनाक दिन देखे. तब बिहार में कांग्रेस सरकार थी. उसके बाद 1990 से बीजेपी ने भागलपुर को अपना मजबूत किला बना लिया. बीजेपी ने यहां से फिर विधानसभा चुनावों में लगातार पांच बार जीत हासिल की.

2015 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने यह सीट फिर हासिल कर ली. तब कांग्रेस को जेडीयू और आरजेडी के साथ महागठबंधन में चुनाव लड़ने का फायदा मिला था. इस बार यहां दूसरे चरण में 3 नवंबर को मतदान हुआ.  

(भागलपुर से राजीव सिद्धार्थ के इनपुट्स के साथ) 

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