अगर आप हिंदी मीडियम के छात्र हैं और किसी प्रश्न पत्र में आंकड़े की जगह दत्त, जनसंख्या की जगह समष्टि, प्लास्टिक की जगह सुघट्य, आधारभूत के बजाय अधःशायी जैसे शब्द लिखे मिलें तो क्या आपका दिमाग चकरा नहीं जाएगा? क्या आप सीमित समय में सवालों को समझकर सही जवाब दे सकेंगे? शायद नहीं.
मगर, संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) पिछले कुछ वर्षों से आईएएस-आईपीएस सहित दो दर्जन सेवाओं के लिए आयोजित होने वाली सिविल सर्विसेज परीक्षा के प्रश्नपत्रों में ऐसी ही हिंदी का इस्तेमाल कर रहा है. जिसे गूगल ट्रांसलेशन वाली हिंदी कहते हैं. कहा जा रहा है कि मूल प्रश्नपत्र अंग्रेजी में तैयार करने के बाद पेपर सेटर गूगल ट्रांसलेशन में डालते हैं. जो आता है उसे तोड़-मरोड़कर हिंदी अनुवाद वाला सवाल अंग्रेजी के नीचे लिख देते हैं.
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की ओर से शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाले ट्रस्ट शिक्षा संस्कृत उत्थान न्यास ने इस मामले को उठाते हुए सही अनुवाद की मांग की है. 18 अगस्त को इसका प्रस्ताव तैयार किया गया, जिसे केंद्र सरकार को भेजने की तैयारी है. मांग है कि सिविल सर्विसेज की परीक्षाओं के मूल प्रश्न पत्र हिंदी में तैयार हों. ताकि अंग्रेजी से गलत अनुवाद की समस्या नहीं आएगी.
वर्ष 2010 के बाद से सिविल सर्विसेज परीक्षा के प्रश्न पत्रों में गूगल ट्रांसलेशन वाली हिंदी के प्रयोग से उम्मीदवार ही नहीं, जाने-माने हिंदी प्रोफेसरों का भी सिर चकरा जाता है. उम्मीदवारों का कहना है कि एक तो हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में कम पाठ्यसामग्री की उपलब्धता से उनके लिए मुश्किलें खड़ी होती हैं. दूसरी तरफ यूपीएससी की खराब हिंदी कोढ़ में खाज का काम कर रही है. इस हालात पर हिंदी मीडियम के छात्रों के लिए सिविल सर्विसेज की कोचिंग देने वाले विकास दिव्यकीर्ति तंज कसते हुए कहते हैं," लगता है मंगल ग्रह से हिंदी का ट्रांसलेशन होता है."
यूं तो हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के छात्रों के देश की सर्वोच्च परीक्षा में पिछड़ जाने के पीछे और कई ठोस वजहें हैं. मगर खराब हिंदी अनुवाद का मसला अहम है. आंकड़े बताते हैं कि भारतीय भाषाओं में छात्रों की सफलता का प्रतिशत महज नौ से दस प्रतिशत रह गया है. 2008 तक टॉप 20 रैंक में हिंदी छात्र जगह बनाने में सफल हो जाते थे. 2002 में तो पांचवीं, आठवीं और दसवीं रैंक पर हिंदी मीडियम छात्रों का कब्जा था. मगर 2010 के बाद से हिंदी भाषी छात्रों की सफलता का प्रतिशत गिरता गया. 2017-18 की परीक्षा में टॉप 25 में हिंदी या अन्य किसी क्षेत्रीय भाषा का एक भी अभ्यर्थी जगह नहीं बना पाया.
मोहन भागवत के सामने उठा मुद्दा
नई दिल्ली में संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की मौजूदगी में बीते 18 अगस्त को भारत में प्रतियोगी परीक्षाएं-राष्ट्रीय विषय नामक सेमिनार में भी हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के खराब अनुवाद का मुद्दा उठा. यह आयोजन संघ से जुड़े शिक्षा संस्कृत उत्थान न्यास ने किया था. ट्रस्ट की ओर से गठित प्रतियोगी परीक्षा प्रकल्प के राष्ट्रीय संयोजक देवेंद्र सिंह की ओर से लिखी पुस्तक- भारत में प्रशासनिक सेवा परीक्षाएंः मिथक एवं यथार्थ का संघ प्रमुख भागवत ने विमोचन भी किया. इस दौरान खराब हिंदी अनुवाद को लेकर कार्मिक मंत्रालय और संघ लोक सेवा आयोग को प्रस्ताव भेजने का फैसला हुआ.
ऐसी हिंदी कि कोई समझ न पाए
सिविल सर्विसेज की परीक्षाओं में हिंदी के सवालों में ऐसे-ऐसे शब्द- सब्सिडी की जगह साहाय्य, दीमक की जगह बरुथी, अर्थ ऑवर प्रचलित शब्द है, मगर उसकी जगह पृथ्वीकाल का प्रयोग किया गया. इसी तरह वाक् पहचान या शिनाख्त की वाक अभिज्ञान, वैश्वीकरण की जगह विश्व व्यापीकरण, आधारभूत की जगह अधःशायी, संकल्पना की जगह संप्रत्यीकरण जैसे न समझ में आने वाले शब्दों का प्रयोग किया गया.
हिंदी ही नहीं समूचे भारतीय भाषाओं के साथ अन्याय
राष्ट्रीय संयोजक देवेंद्र सिंह ने AajTak.in से कहा कि जब भी खराब हिंदी अनुवाद का मसला उठता है तो कुछ अंग्रेजी मानसिकता वाले बुद्धिजीवी कहते हैं," अरे इसमें क्या है, यदि हिंदी समझ नहीं आ रही है तो अंग्रेजी का सवाल देख लो. इतनी भी अंग्रेजी नहीं जानते तो क्या आईएएस बनोगे. " देवेंद्र सिंह कहते हैं कि सवाल हिंदी-अंग्रेजी जानने का नहीं, बल्कि यूपीएससी के अक्षम अनुवादकों द्वारा किए गए गलत अनुवाद को सुधारने और हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिंदी करने में ही परीक्षा का अमूल्य समय नष्ट करने का है. क्या संघ लोक सेवा आयोग इतना अक्षम है कि वह दस पंक्तियों का भी ठीक से अनुवाद नहीं कर सकता.
देवेंद्र सिंह कहते हैं कि 120 मिनट की समय सीमा में अभ्यर्थी पहले गलत हिंदी पढ़ें और न समझ में आने पर फिर अंग्रेजी में सवाल पढ़ें तो फिर आयोग की गलतियां सुधारें और फिर सवाल का उचित जवाब सोचें. जिस परीक्षा में एक-एक मिनट का महत्व हो व दशमलव में जहां अंक निर्धारित हों वहां प्रतियोगियों के सिर पर खराब अनुवाद का बोझ लादकर उन्हें भटका देना क्या भेदभाव नहीं है?
देवेंद्र सिंह कहते हैं कि अगर यह कहा जा रहा है कि हिंदी न समझ में आए तो अंग्रेजी देख लें तो इसका मतलब है कि सिस्टम हिंदी अनुवाद की खामी को खुद स्वीकार कर रहा है. अगर हिंदी छात्रों की अंग्रेजी इतनी ही अच्छी हो तो वे सीधे अंग्रेजी माध्यम न चुन लें. देवेंद्र सिंह कहते हैं कि चंद पंक्तियों का सही अनुवाद न होने से छात्रों का एक पूरा वर्ग ही प्रतियोगी परीक्षा से बाहर हो जाता है.
जेएनयू और डीयू के प्रोफेसर लिख चुके हैं पत्र
भारत में प्रशासनिक सेवा परीक्षाएंः मिथक एवं यथार्थ पुस्तक में यूपीएससी की परीक्षा में खराब हिंदी अनुवाद को लेकर दो हिंदी प्राध्यापकों के पत्र का भी जिक्र है. भारतीय भाषा केंद्र, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष मैनेजर पांडेय ने संघ लोक सेवा आयोग और कार्मिक राज्य मंत्री को लिखे पत्र कहा है," मैं जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में 30 वर्षों से अधिक समय तक हिंदी का अध्यापक रहा हूं. आपके प्रश्न पत्र -1 और 2 में जो हिंदी अनुवाद हैं, उनको समझना मेरे लिए भी मुश्किल ही नहीं असंभव है. ऐसी स्थिति में परीक्षार्थी उन हिंदी अनुवादों को कैसे समझ सकते हैं. प्रश्न पत्र 1 और 2 के हिंदी अनुवादों से परीक्षार्थियों को तो नुकसान हो ही रहा है और हिंदी भाषा का भी नाश हो रहा है. इसके ठीक विपरीत आपके यहां की परीक्षा के प्रश्न पत्र में जो हिंदी अनुवाद है, उन्हें संस्कृत का कोई पंडित शायद ही समझे, लेकिन सामान्य व्यक्ति, अध्यापक और छात्र नहीं समझ सकते."
वहीं 2014 के प्रश्नपत्र को लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अपूर्वानंद ने यूपीएससी अध्यक्ष को लिखे पत्र में कहा था- मैं उच्च स्तर पर हिंदी का अध्यापन करता हूं और शोध तथा लेखन कार्य में संलग्न हूं, जो हिंदी लोक सेवा आयोग अपने प्रश्न-पत्रों में प्रयोग कर रहा है, उसे समझना मेरे लिए टेढ़ी खीर है, मैं समझ सकता हूं कि परीक्षा देते हुए हिंदी माध्यम के उम्मीदवारों को इनका अर्थ समझने में ही छक्के छूट जाएंगे, उत्तर देना तो दूर की बात है. इस प्रकार की भाषा का प्रयोग निश्चय ही हिंदी माध्यम के प्रत्याशियों के साथ अन्याय है, इसके आधार पर होने वाले चयन में वे अंग्रेजी माध्यम के प्रत्याशियों की अपेक्षा घाटे में रहेंगे."
पुरुषोत्तम अग्रवाल कमेटी की सिफारिशों पर अमल नहीं
मूल प्रश्नपत्र अंग्रेजी में तैयार कर उसका हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में गलत ट्रांसलेशन के मुद्दे पर संघ लोक सेवा आयोग की ओर से पुरुषोत्तम अग्रवाल कमेटी गठित कर चुका है. इस कमेटी ने कई बिंदुओं पर अपनी राय दी थी. पहला बिंदु काफी अहम था. जिसमें कहा गया था कि कमेटी का मानना है कि प्रश्न पत्रों की जांच ऐसे वरिष्ठ शिक्षाविदों से कराई जाए, जिन्हें हिंदी की विशेषज्ञता हासिल हो, वह अपने करियर में अध्यापन और अनुवाद का अनुभव रखते हों. कमेटी की सिफारिशों को पढ़ने से यह लगता है कि अनुवादों को वरिष्ठ शिक्षाविदों से जांच नहीं कराया जाता.
नवनीत मिश्रा