NEET मामला: 'आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं', जानिए क्या लिखा है संविधान में

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए आरक्षण को लेकर बड़ी टिप्पणी की. तमिलनाडु में NEET पोस्ट ग्रेजुएशन रिजर्वेशन मामले में अदालत ने कहा कि आरक्षण कोई बुनियादी अधिकार नहीं है. आइए जानें- संविधान में क्या है आरक्षण.

सुप्रीम कोर्ट
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 11 जून 2020,
  • अपडेटेड 8:31 PM IST

तमिलनाडु में NEET पोस्ट ग्रेजुएशन रिजर्वेशन मामले में अदालत ने कहा कि आरक्षण कोई बुनियादी अधिकार नहीं है. इसी के साथ अदालत ने तमिलनाडु के कई राजनीतिक दलों द्वारा दाखिल की गई एक याचिका को स्वीकार करने से इनकार कर दिया. आइए जानें संविधान में इसके बारे में क्या लिखा है.

बता दें कि 26 जनवरी,1950 को भारत का संविधान लागू हुआ था. संविधान में सभी नागरिकों के लिए समान अवसर दिए गए. सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछले वर्गों या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की उन्नति के लिए संविधान में विशेष धाराएं रखी गई हैं. साल 1953 में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए कालेलकर आयोग का गठन किया गया था. आयोग द्वारा सौंपी गई अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों से संबंधित रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया गया, लेकिन तब OBC के लिए की गई सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया गया.

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साल 1979 में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए बिंदेश्वरी प्रसाद मण्डल की अध्यक्षता में मंडल आयोग की स्थापना की गई थी. इस आयोग के पास अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) के बारे में कोई सटीक आंकड़ा नहीं था और इस आयोग ने ओबीसी की 52फीसदी आबादी का मूल्यांकन करने के लिए 1931 की जनगणना के आंकड़े का इस्तेमाल करते हुए पिछड़े वर्ग के रूप में 1,257 समुदायों का वर्गीकरण किया था.

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1980 में मंडल आयोग ने एक रिपोर्ट पेश की और तत्कालीन कोटा में बदलाव करते हुए इसे 22फीसदी से बढ़ाकर 49.5फीसदी करने की सिफारिश की. 2006 तक पिछड़ी जातियों की सूची में जातियों की संख्या 2297 तक पहुंच गयी, जो मंडल आयोग द्वारा तैयार समुदाय सूची में 60फीसदी की वृद्धि है.

1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा सरकारी नौकरियों में लागू किया गया. छात्र संगठनों ने इसके विरोध में राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन शुरू किया और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह की कोशिश की थी.

1991 में नरसिम्हा राव सरकार ने अलग से अगड़ी जातियों में गरीबों के लिए 10फीसदी आरक्षण की शुरूआत की.

16 नवम्बर,1992 में इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की पूर्णपीठ ने अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को सही ठहराया.

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1995 में संसद ने 77वें सांविधानिक संशोधन द्वारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की तरक्की के लिए आरक्षण का समर्थन करते हुए अनुच्छेद 16(4)(ए) का गठन किया. बाद में आगे भी 85वें संशोधन द्वारा इसमें पदोन्नति में वरिष्ठता को शामिल किया गया था.

12 अगस्त,2005 को उच्चतम न्यायालय ने पी. ए. इनामदार और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य के मामले में 7 जजों द्वारा सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए घोषित किया कि राज्य पेशेवर कॉलेजों समेत सहायता प्राप्त कॉलेजों में अपनी आरक्षण नीति को अल्पसंख्यक और गैर-अल्पसंख्यक पर नहीं थोप सकता है. लेकिन इसी साल निजी शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए आरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए 93वां सांविधानिक संशोधन लाया गया. इसने अगस्त 2005 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को प्रभावी रूप से उलट दिया.

2006 से केंद्रीय सरकार ने शैक्षिक संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण शुरू हुआ. 10 अप्रैल, 2008 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी धन से पोषित संस्थानों में 27फीसदी ओबीसी (OBC) कोटा शुरू करने के लिए सरकारी कदम को सही ठहराया.

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