कौन है छोटी उम्र में बड़ा नाम कमा रही ये घड़ी वाली लड़की, पढ़ाई में भी अव्वल

संथाल परिवार मे जन्मी यह लड़की एक किसान परिवार से आती है. अपनी स्कूलिंग कस्तूरबा स्कूल से करने के दौरान ही सातवीं कक्षा से ही इसको क्राफ्ट में इतनी रुचि हो गई कि आज एक अलग ही मुकाम हासिल कर लिया है. इसके जज्बे से हम सबको एक सीख मिलती है.

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श‍िला मुर्मू (Photo: aajtak.in) श‍िला मुर्मू (Photo: aajtak.in)

अनूप सिन्हा

  • जमशेदपुर ,
  • 14 दिसंबर 2022,
  • अपडेटेड 11:05 AM IST

धीरोल, एक ऐसा गांव जिसको अब तक कोई जानता तक नहीं था. आज घड़ी वाली लड़की के कारण ये गांव घड़ी वाला गांव के नाम से लोगों की जुबान पर चढ़ रहा है. यहां की आदिवासी समुदाय की लड़की श‍ीला मुर्मू के हाथों बनी लकड़ी की दीवार घड़ी लोगों को बहुत पसंद आ रही हैं. संथाल परिवार मे जन्मी यह लड़की एक किसान परिवार से आती है.

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7वीं क्लास से अपने काम में जुटी ये लड़की आज न सिर्फ खुद घड़ी बनाकर बेच रही है, बल्क‍ि गांव के बच्चों और महिलाओं को भी लकड़ी वाली घड़ी बनाना सि‍खा रही है. इसके हुनर को देखकर हर कोई बस यही कहता है कि अगर इसे संसाधन और ट्रेनिंग मिले तो ये भविष्य की बड़ी कारोबारी बन सकती है. आइए जानते हैं शीला मुर्मू की पूरी कहानी. 

जमशेदपुर से करीबन 60 किलोमीटर दूर है धीरोल गांव, जहां एक टोला है, जिसका नाम है नावाडीह. इस गांव मे तकरीबन 70 संथाल परिवार रहते हैं. इसी गांव के मुर्मू परिवार में शीला मुर्मू आज सबकी उम्मीद बनकर सामने आई है. शीला ने गांव के ही कस्तूरबा गांधी स्कूल मे पढ़कर क्राफ्ट का काम सीखा था. फिलहाल वो कॉलेज की पढ़ाई में भी बेहतर कर रही है. बचपन में वो काम सीखने के बाद अच्छी गुणवत्ता का काम जानने के लिए असम गई. वहां से आने के बाद यह गांव मे ही बच्चों और महिलाओं को क्राफ्ट का काम करना सिखाने लगी. शीला के हाथों से बनी घड़ी काफ़ी खूबसूरत होती है जिसकी मांग शहरों मे काफ़ी हो रही है. 

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शीला जब स्कूल में थी तो वहीं कुछ लोग आकर बच्चों को क्राफ्ट का काम सिखाते थे. शीला को क्राफ्ट इतना पसंद आया कि वो इसी में रम गई. क्राफ्ट मेंकिंग में उसने काफ़ी मेहनत की. अच्छे काम को सीखने के लिए असम गई और वहां से निपुण होने के बाद गांव में ही घड़ी बनाना शुरू किया, इसके लिए वो जूडी से लकड़ी लाती है. उसको सुखाकर उस पर पेपर चिपकाती है. इस पर चिपकाने वाला खास पेपर वो कम्प्यूटर से निकालकर लाती है. 

लकड़ी पर कागज चिपकाकर देसी जुगाड़ से आकृति को काटकर निकालती है. फिर उस पर रंग करके बाजार से घड़ी का कांटा और बैटरी लाती है. फिर कटे हुए ढांचे में  लगाती है. इस प्रकार वो लकड़ी से खूब‍सूरत आकृतियों की घड़ी तैयार करती है. फिर उन्हें बाजार मे जाकर 500 रूपया प्रति घड़ी बेच देती है.  शीला ने बताया कि अभी उसके बैंक अकाउंट मे 30 से 40 हजार जमा हो चुका है. 

शीला कहती हैं कि स्कूली पढ़ाई पूरी करके अभी कॉलेज में पढ़ रही हूं. अभी मैं एक दिन में 5 से 7 घड़ी बना लेती हूं. जिसकी बाजार मे कीमत हमको 500 रूपया प्रति घड़ी मिलता है, हमारे बैंक मे अभी 30 से 40 हजार रूपया जमा हो गया है, हम घड़ी के साथ साथ अशोक स्तम्भ और कई महापुरुषों की आकृति बना चुके है. शीला की बहन रिया मुर्मू कहती हैं कि हम अपनी दीदी से काम सीख रहे हैं. थोड़ा-थोड़ा सीख भी गए हैं. 

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शीला के पिता काली राम मुर्मू कहते हैं कि हम धीरोल पंचायत के नावाडीह गांव मे रहते हैं. शीला ने कम से कम संसाधनों में घर पर ही रहकर लकड़ी से घड़ी बनाकर बाजार मे बेची. वो महीने मे गांववालों के साथ मिलकर 30 हजार रुपये से अधिक का कारोबार करती है. अगर उसे मौका मिला तो वो आने वाले दिनों मे अच्छी कारोबारी बनेगी. मेरी बेटी को मैं एक मशहूर कारोबारी बनते हुए देखना चाहता हूं.

 

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