ये सब जानते हैं कि किसी इंसान का बगैर सांस लिए ज़िंदा रहना मुश्किल है. लेकिन ये कहानी है एक ऐसी साध्वी की, जिसने तीन महीनों से ना तो सांस ली है और ना ही जिसका दिल धकड़ रहा है. अब सवाल ये है कि वो साध्वी जिंदा भी है या नहीं? इसका जवाब आपके मन में चाहे जो भी आता हो, लेकिन लखनऊ के आश्रम में उस साध्वी के शिष्य ये मानते हैं कि साध्वी ना सिर्फ जिंदा हैं बल्कि आध्यात्मिक चेतना की तरंगों से लगातार लोगों से बात भी कर रही हैं.
साध्वी आशुतोषांबरी के गुरु आशुतोष महाराज पिछले दस सालों से एक डीप फ्रिजर में कैद हैं. उनके शिष्य उनके इस हालत को समाधि का नाम देते हैं. जबकि मेडिकल साइंस के एक्सपर्ट इसे मौत मानते हैं. इधर, साध्वी आशुतोषांबरी की समाधि का मकसद अपने गुरु को समाधि से वापस लाना है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर ये कैसे मुमकिन होगा. मेडिकल साइंस और तर्क के पैमाने पर इन सारे सवालों के जवाब ना में हैं. ऐसा बिल्कुल संभव नहीं है.
डॉक्टरों के मुताबिक ऐसा किसी की मौत की हालत में ही हो सकता है. एक बार मरने के बाद इंसान कभी दोबारा ज़िंदा नहीं होता. लेकिन दुनिया भर में मौजूद आशुतोष महाराज के लाखों शिष्यों की तरह अब साध्वी आशुतोषांवरी के चाहने वालों का भी मानना है कि उन्होंने जीते-जी अपनी मर्जी से समाधि ली है और अपनी मर्जी से एक रोज़ वापस लौट आएंगी. साध्वी बिस्तर पर समाधि की हालत में ही अपनी आत्मा को जागृत कर अपना काम पूरा कर लेंगी.
समाधि में वापस लौट आएंगी. उनके शिष्य बाबा महादेव का कहना है कि आशुतोष महाराज ने अपनी शिष्या आशुतोषांबरी को आंतरिक संदेश भेजा था और कहा था कि वह उन्हें समाधि से वापस ले आएं, क्योंकि जालंधर के आश्रम में उनके शिष्यों ने उन्हें डीप फ्रीजर में कैद करके रखा हुआ है, इसीलिए वो वापस नहीं आ पा रहे हैं. ऐसे में अब आशुतोष महाराज की शिष्या ने उन्हें वापस लाने का बीड़ा उठाया है और इसीलिए वो समाधि में चली गई हैं.
फिलहाल, आश्रम में साध्वी आशुतोषांबरी अपनी बिस्तर पर पिछले 45 दिन से लगातार लेटी हैं. उनका उठना-बैठना, खाना-पीना, सबकुछ बंद है. बल्कि डॉक्टरों की मानें तो अब तो वो ना तो सांस ले रही हैं और ना ही उनकी धड़कन चल रही है. सारे ऑर्गन ठप पड़ गए हैं. इस हाल में उनके शरीर को सुरक्षित रखने के लिए पूरे शरीर पर तरह-तरह की जड़ी बूटियों के लेप लगा दिया गया है. उनका एक खास शिष्य लगातार 32 दिनों से उनका सिर गोद में लिए बैठा है.
अब सवाल ये भी है कि क्या यूं लेटे-लेटे किसी का समाधि में चले जाना मुमकिन है? वो भी ऐसी समाधि जिसमें इंसान के लिए सांस लेना भी जरूरी ना रह जाए? उसे सर्दी गर्मी का भी असर ना हो? ना भूख-प्यास का अहसास हो? और तो और उसके शरीर को डीप फ्रिजर में रख दिया जाए और फिर भी उसे कोई फर्क ना पड़े? क्या ऐसी समाधि भी मुमकिन है? ये अजीबोगरीब कहानी है लखनऊ के आनंद आश्रम की, जहां साध्वी आशुतोषांबरी समाधि में है.
वो पिछले 90 दिनों से एक ही जगह पर यूं ही बिना हिला-डुले और बिना कोई रोज़मर्रा का काम किए जस की तस लेटी हैं और उनके आश्रम के लोग हैं कि ये बता रहे हैं कि साध्वी समाधि में हैं. समाधि का मकसद विश्व कल्याण के साथ-साथ उनके अपने गुरु आशुतोष महाराज को समाधि से वापस लाना है. असल में खुद आशुतोष महाराज का शरीर भी इसी तरह पिछले दस सालों से उनके जालंधर के आश्रम में डीप फ्रिजर में कैद है.
साध्वी आशुतोषांबरी के शिष्यों का कहना है कि उनकी गुरु मां ही समाधि में जा कर आशुतोष महाराज को उनकी समाधि से जगा कर इस दुनिया में वापस ला सकती हैं. लेकिन विश्व कल्याण के महामिशन से लेकर आशुतोष महाराज को जगाने का ये काम साध्वी कब तक पूरा करेंगी, इसका साफ-साफ जवाब किसी के पास नहीं... साध्वी आशुतोषांबरी के परम शिष्य आशुतोषांबर महाराज समाधि के पूरा होने के सवाल पर कहते हैं कि बड़े कार्य के लिए धैर्य रखना पड़ता है.
साध्वी आशुतोषांबरी अपने समाधि की अवधि एक महीने यानी 30 दिनों का तय करके गई थी. उन्होंने कहा था कि महीने भर में वो समाधि से लौट आएंगी. लेकिन वक्त गुजरता रहा और 90 दिन हो गए, लेकिन इस समाधि से वो वापस कब और कैसे लौटेंगी, ये कोई नहीं जानता. इन हालात में साध्वी का शरीर आश्रम के एक कमरे में पिछले 90 दिनों से एक जगह पर यूं ही जस का तस ऱखा है, जहां इस भीषण गर्मी में सुरक्षित रखना आसान नहीं है.
बताते लें कि 28 जनवरी 2014 को पंजाब के जालंधर के नूरमहल में दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के मुखिया आशुतोष महाराज ने जीते जी समाधि ले ली थी. समाधि में जाते हुए वो ऐसे लेटे कि फिर कभी नहीं उठे. एक वो दिन था और एक आज का दिन, महाराज के शिष्य आज भी उनके अपने शरीर में वापस लौट आने की उम्मीद लिए उनका इंतज़ार कर रहे हैं. इसके लिए उनके शरीर को पिछले दस सालों से एक डीप फ्रिजर में रखकर छोड़ा हुआ है.
आशुतोष महाराज की समाधि के ठीक 10 साल बाद 28 जनवरी 2024 को लखनऊ के आनंद आश्रम उनकी खास शिष्या साध्वी आशुतोषांवरी ने भी समाधि ले ली. उनके पूरे शरीर पर कई तरह के लेप लगाए जाते हैं. उनके शिष्य उनका दिन रात ख्याल रख रहे हैं. अब इसी के साथ सवाल ये उठता है कि क्या किसी आदमी के शरीर को जिसने खाना-पीना, सांस लेना, बात करना छोड़ दिया हो, इस तरह से जड़ी बूटियों के लेप से प्रिजर्व किया जा सकता है?
इसका जवाब तो ना है, लेकिन तर्क, साइंस, व्यवहारिकता और सिस्टम की तमाम कसौटियों से परे उनके शिष्य हैं कि ये मानने को तैयार ही नहीं कि वो अब इस दुनिया में नहीं हैं. बल्कि उनके शिष्यों और अनुयायियों का तो यहां तक कहना है कि वो ना सिर्फ जीवित हैं, पिछले 90 दिनों से इसी तरह समाधि में लेटे-लेटे वो अपने शिष्यों से आध्यात्मिक चेतना की तरंगों यानी वाइब्रेशन के जरिए लगातार बातचीत कर रही हैं. पूरे आश्रम को अपने तौर पर चला भी रही हैं.
डॉक्टर साध्वी आशुतोषांबरी के शरीर की एक बार नहीं, कई बार जांच कर चुके हैं. इनमें प्राइवेट से लेकर कई सरकारी डॉक्टर तक शामिल हैं.. लगभग सारे के सारे डॉक्टरों का यही कहना है कि साध्वी के शरीर में अब जीवन के कोई अंश मौजूद नहीं. खास कर उनका सांस न लेना, धड़कन और पल्स रेट का गायब होना, भोजन ना करना, ये सब इस बात का सबूत है. लेकिन विडंबना ये है कि इतने मेडिकल जांच और हर जांच में साध्वी के जीवित ना होने के संकेत मिलने के बावजूद ना तो शासन-प्रशासन ने इधर झांकने की जरूरत समझी है और ना ही आश्रम के लोग डॉक्टरों की इस राय को स्वीकार कर रहे हैं.
बल्कि साध्वी के जीवित होने लेकर जब उनके शिष्य आशुतोषांबर से सवाल पूछा गया तो उल्टा उन्होंने मेडिकल साइंस पर ही सवाल उठा दिए और चुनौती दे डाली कि जिंदगी और मौत के लेकर अगर कोई चाहे तो उसके साथ बहस करने के लिए तैयार हैं. मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसा मानने वाले और करने वाले मनोरोग के शिकार हो सकते हैं. लखनऊ यूनिवर्सिटी के साइकोलॉजी डिपार्टमेंट की हेड डॉक्टर अर्चना शुक्ला तो ऐसा ही कहती हैं.
आनंद आश्रम और साध्वी आशुतोषांबरी की समाधि को लेकर मनोविज्ञान की आशंकाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. भक्ति और समाधि अपनी जगह है, लेकिन आनंद आश्रम के हालात को देख कर मनोवैज्ञानिकों को लगता है कि ये किसी मानसिक बीमारी की भी निशानी हो सकती है. बहरहाल, ये सही है कि जब तर्क और विज्ञान की सीमाएं खत्म हो जाती हैं, आस्था और कई बार अंधविश्वास की शुरुआत भी वहीं से होती है. ऐसे में जरूरत विज्ञान और आध्यात्म के बीच एक तालमेल की है. जो फिलहाल इस केस में मिसिंग यानी गायब नजर आ रहा है. इसे एक तरह से अपराध भी माना जा सकता है.
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