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पंडित जवाहर लाल नेहरू ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया में वेद और वैदिक युग का जिक्र करते हुए लिखा है कि, वेद इंसानी दिमाग के अंदर फूटे सबसे पहले विचार हैं. वह शुद्ध हैं, प्राकृतिक हैं और तब के आदमी ने (वह चाहे जो भी रहे हों, ऋषि-मुनि, ज्ञानी) अपनी प्रकृति को जैसा देखा, महसूस किया, वह दूसरों से कहा. तब वेद ने ईश्वर की पूजा नहीं की बल्कि खुद ही यह सवाल उठाए कि वह किसकी और क्यों पूजा करें. कैसे करें, किसलिए करें और पूजा का सही और सरल मार्ग क्या है? जीवन क्या है? जीवन जीने का मार्ग क्या है? प्राण क्या है? कौन है? मैं कौन हूं? कहां हूं, क्यों हूं....सवालों का यह सिलसिला जितना लंबा चला उससे कहीं अधिक लंबा जवाबों का सिलसिला चला. बल्कि यह कहना अधिक सही रहेगा कि जवाब का सिलसिला तो अब तक चला ही आ रहा है. इन्हीं सवालों और उनके जवाबों को समझना जब और कठिन होता गया तो पुराणों की कहानियां सामने आईं. पुराण बताते हैं कि वह एक शक्ति है, जिससे यह सबकुछ चल रहा है.
वह शक्ति क्या है, कैसी है और कहां रहती है, उसका स्वरूप क्या है? राजा सुरथ और समाधि वैश्य ने जब महर्षि मेधा से ये प्रश्न किया तो महर्षि ने उन्हें शक्ति की देवी मां दुर्गा के प्रकट होने की कथा सुनाई. उन्होंने यह भी बताया कि देवी कैसे पहले सभी देवताओं की आत्म शक्तियों में वास करती थीं और जब संसार के कल्याण के लिए जरूरत पड़ी तब उन्होंने ही प्रकट स्वरूप में अलग-अलग रूप लेकर संत जनों का कल्याण और उद्धार किया. दुष्टों का संहार किया और जीवन में संतुलन स्थापित किया. देवी की यह कथा मार्कंडेय पुराण, देवी भागवत पुराण का अहम हिस्सा तो है साथ ही यही कथा दुर्गा सप्तशती का आधार है.
महर्षि मेधा ने देवी के प्राकट्य के साथ महिषासुर मर्दिनी की कथा सुनाई. तब राजा सुरथ ने देवी के अन्य अवतारों की कथा के बारे में पूछा तो महर्षि मेधा ने बताते हुए कहा कि, महिषासुर के वध के बाद देवताओं को अपना लोक वापस मिल गया, लेकिन संकट अभी टला नहीं था. मृत्यु लोक में शुंभ और निशुंभ नाम के दो असुर भाई हुए. वह बाल्यकाल से ही बड़े उत्पाती थे और बड़े होते-होते उन्होंने ऋषियों को तंग करना शुरू कर दिया. इधर, असुर गुरु शुक्राचार्य ने राक्षसी शक्तियों को फिर से एकत्रित किया और शुंभ-निशुंभ को असुरों का राजा बना दिया. अब असुर राज बनने के बाद तो इन दोनों के उत्पात और बढ़ गए.
इसी बीच दोनों ने ब्रह्माजी की तपस्या की और किसी देव-दानव, गंधर्व, यक्ष आदि से अभय का वरदान पाकर निरंकुश हो गए. धरती को जीत लेने के बाद शुंभ-निशुंभ का अगला अभियान स्वर्ग ही था. भयंकर देवासुर संग्राम हुआ, जिसमें देवताओ के हाथ एक बार पुनः हार लगी. स्वर्ग छिन गया और धरती से आकाश तक चीत्कार की आवाज उठने लगी. अपनी यह स्थिति देखकर देवता ब्रह्मदेव के पास गए. ब्रह्मदेव जानते थे कि यह उनके वरदान का परिणाम है. इसलिए वह देव सहायता करने में सक्षम नहीं थे, लेकिन योगमाया की कृपा से उन्हें महिषासुर वध का प्रसंग स्मरण हो आया. जब देवी स्वरूपा शक्तिपुंज ने आश्वासन दिया था कि संकट की घड़ी में वह पुकारने पर जरूर आएंगी.
तब सभी देवताओं ने आर्त स्वर में उनकी आरती की और पुकार लगाई, हे आदिशक्ति, परमशक्ति, महाशक्ति, देवी भगवती, प्रकट हों. हे भवतारिणी, हे जगतजननी मां प्रकट हों. अपनी संतति की रक्षा करो देवी. देवताओं का यह स्वर सुन शक्ति स्वरूपा पार्वती की आद्याशक्ति द्रवित हो उठी. जगतजननी मां संबोधन सुनकर उनका हृदय विह्वल हो गया. पार्वती ने उनकी यह पुकार सुनी तो उनके अंदर समाया हुआ देवताओं का एकत्रित तेजपुंज बाहर निकला और एक कन्या के रूप में प्रकट हुआ. देवी का यही स्वरूप कौशिकी कहलाया. देवी कौशिकी देवताओं के सामने प्रकट हुईं. उन्होंने देवताओं का सारा हाल सुना और उनके ममतास्वरूप को देखकर ही देवताओं का भय जाता रहा.
तब देवी ने पूरी दृढ़ता से कहा कि, हे देवताओं, अब शोक न करो, विधि के वरदान के अनुसार शुंभ-निशुंभ का वध किसी स्त्री शक्ति से ही हो सकता है, इसलिए मैं पुत्री स्वरूप में जन्म लूंगी और ऋषि कात्यायन का वात्सल्य प्राप्त कर कात्यायनी कहलाऊंगी. देवता यह आश्वासन सुनकर हर्षित हो उठे. देवी का छठा स्वरूप देवी कात्यायनी का ही है, इसी रूप में उन्होंने कई असुरों का संहार किया था.
इसके बाद देवी, देवताओं को दिए वचन के अनुसार ऋषि कात्यायन की पुत्री के रूप में प्रकट हुईं और 16 वर्ष की होने पर एक दिन वह सुरम्य पहाड़ियों पर साधना के लिए पहुंच गईं. यहां देवी गुफा में बैठकर मधुर बांसुरी बजाते हुए ईशवंदना करने लगीं. उनकी बांसुरी की सुरम्य तान से सारी सृष्टि रस और राग से भर गई. इसकी आवाज असुर राज शुंभ तक भी पहुंची. उसने अपने दो सेवकों को आदेश दिया कि वे जाकर पता करें कि इतनी सुंदर मुरली कौन बजा रहा है? तब शुंभ-निशुंभ के दो सेवक पहुंचे और देखकर आए. उन्होंने बहुत चकित स्वर में शुंभ से उस दृष्य और स्थिति का वर्णन किया और फिर मां अंबा की सुंदरता का वर्णन करके कहने लगे कि, मुरली बजा रही वह स्त्री हर तरीके से असुर महारानी बनने के योग्य है.
अपने सेवकों से ऐसा वर्णन सुनकर शुंभ-निशुंभ ने अपने सेवकों चंड-मुंड के जरिए देवी तक अपने विवाह का प्रस्ताव भिजवाया. तब देवी ने कहा कि, मैं तो ऐसा संकल्प कर चुकी हूं कि जो मुझे युद्ध में पराजित कर देगा, उसे ही अपना वर चुन लूंगी. इसलिए अगर तुम्हारे महाराज मुझसे विवाह करना ही चाहते हैं तो पहले मुझे युद्ध में हराएं. चंड-मुंड के मुख से देवी का ऐसा उत्तर सुनकर शुंभ-निशुंभ क्रोध में भर गए. उन्होंने धूम्रलोचन को आदेश दिया कि उस अभिमानी स्त्री को पकड़कर हमारे सामने उपस्थित करो. धूम्रलोचन सेना सहित वहां गया, जहां देवी पर्वत पर साधना कर रही थीं. धूम्रलोचन ने जैसे ही मां के केश पकड़कर उन्हें घसीटना चाहा, देवी ने आग जलते खप्पर को सामने कर फूंक मारी तो धूम्र लोचन सेना सहित वहीं भस्म हो गया. धूम्रलोचन के वध की यह कथा सप्तशती के सातवें अध्याय में है.
इसके बाद महर्षि ने सप्तशती के आठवें अध्याय की शुरुआत की और राजा सुरथ से आगे की कथा कहने लगे. उन्होंने कहा कि, अपने घायल सैनिकों से धूम्र लोचन की हार सुनकर शुंभ-निशुंभ गुस्से में जल उठे. अब उन्होंने चंड-मुंड को ही आदेश दिया और कहा कि उस स्त्री के सिंह को मारकर, उसे पूरी तरह निहत्था कर दरबार में ले आओ. चंड-मुंड सेना सहित पर्वत पर पहुंचे. तब देवी ने अपना विराट स्वरूप धारण किया और अपनी माया से योगिनियों को प्रकट कर उन्हें लड़ने का आदेश दिया. हर योगिनी शक्ति देवी का ही आत्म स्वरूप थी, इसलिए चंड-मुंड को हर तरफ एक ही स्त्री नजर आ रही थी.
असुरों को उत्पात मचाते देख, देवी की आंखों से क्रोधाग्नि निकली और उससे कालिका देवी प्रकट हुईं. उन्होंने रण में ऐसा संहार मचाया कि चारों ओर हाहाकार मच गया. पलभर में सारी आसुरी सेना समाप्त हो गई. यह देख चंड देवी की ओर लपका तो देवी ने एक हाथ से उसका वार रोका और दूसरे हाथ से उसकी गर्दन पर खड्ग का वार कर दिया. चंड भरभराकर वहीं धरती पर गिर पड़ा. भाई को गिरता देख मुंड ने देवी पर बाणों की वर्षा कर दी. तब देवी ने उसकी ओर अपना भाला फेंका और उसे भी यमलोक पहुंचा दिया. इस तरह देवी ने चंड-मुंड का संहार कर दिया. देवी कालिका चंड-मुंड के सिरों को लेकर जगत्माता अंबा के पास पहुंची और कहा कि, इन दो दुष्टों का भी मैंने अंत कर दिया है, अब आपको ही शुंभ-निशुंभ का वध करना है. देवी ने कहा, हे कालिका, तुमने चंड-मुंड का संहार किया है, इसलिए आज से संसार तुम्हारी चामुंडा के नाम से पूजा करेगा. इसके बाद देवी कालिका जाने लगीं.
तब देवी ने कहा कि, रुको कालिका! अभी आपको एक और भयानक असुर का अंत करना है, उसका नाम रक्तबीज है. इस असुर को न मैं अकेले मार सकती हूं और न ही आप. बल्कि इसके लिए हमें सभी देवताओं की स्त्री शक्ति को पुकारना होगा. महर्षि मेधा से यह प्रसंग सुनकर राजा सुरथ और समाधि वैश्य की जिज्ञासा और बढ़ गई. उन्होंने पूछा कि, रक्तबीज कौन था, क्या वह इतना शक्तिशाली था कि उसके लिए सभी देवताओं की शक्तियों को बुलाना पड़ा. तब महर्षि ने कहा कि, राजन- जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, कि जिसका रक्त ही उसके जन्म के लिए बीज हो वह रक्तबीज है. इस असुर को वरदान प्राप्त था, उसके शरीर से जो भी रक्त की बूंदे जमीन पर गिरेंगी तो वहां उसी शक्ति का दूसरा असुर उत्पन्न हो जाएगा. कहने का अर्थ है, रक्तबीज एक व्यक्ति नही, बल्कि पूरी सेना था. इसी वरदान के कारण ही रक्तबीज खुद को अमर समझता था, और उसे उसका घमंड भी था.
महर्षि मेधा ने राजा सुरथ से कहा कि, हे राजन. जन्म-मृत्यु के इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए संसार में देवी का आविर्भाव हुआ था. जब-जब अपनी उपलब्धियों और शक्तियों के कारण कोई दुस्साहसी होकर निरंकुश हो जाता है तो उसका घमंड दूर करने, उसे उसकी तुच्छता का एहसास कराने के लिए ही परमसत्ता या परमशक्ति संसार में अवतार लेते हैं. यह परम सत्ता कभी राम बनकर रावण के अभिमान का अंत करती है, कृष्ण बनकर कंस का घमंड तोड़ती है और कभी शेर पर सवार होकर महिषासुर का मान मर्दन करती है. वास्तव में इन सभी की सकारात्मक ऊर्जा में उसी शक्ति का वास है, जिस सकारात्मक ऊर्जा को हम अंबा या भगवती कहते हैं. वही भगवती संसार को चलाने वाली-जीवंत रखने वाली ऊर्जा शक्ति है. सृजन और ह्रास उसके दो नेत्र हैं और उसकी पलकों के गिरने-उठने से दिन-रात होते हैं. वह सर्वव्यापिनी माया शक्ति, जगत्माता भगवती ही हैं.