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संजय लीला भंसाली की वेब सीरीज ‘हीरामंडी’ इस वक्त चर्चा में है और इससे भी अधिक चर्चे हैं 'बिब्बोजान' के. बिब्बोजान यानी कि अदिति राव हैदरी. सीरीज में केंद्रीय भूमिका से इतर किरदार निभाने के बावजूद उन्होंने 10 सेकेंड में ऐसा जादू किया है कि रील्स वाली दुनिया में बस 'बिब्बो ही बिब्बो' छाई हैं. पहले ही एपिसोड में एक ठुमरी है, 'सैंया... हटो जाओ.. तुम बड़े वो है...' इसी के डांस सीक्वेंस में एक पल ऐसा आता है, जब अदिति बड़ी नजाकत और कामुकता के साथ ताल से कदम ताल करते हुए चलती हैं. बस उनकी इसी चाल ने लोगों को दीवाना बना दिया है.
खुद महिलाएं भी इससे प्रभावित हैं और इस तरह एक बार फिर उनके बीच सुंदरता के पैमाने को लेकर बहस सी छिड़ गई है कि जीरो फिगर और भरे-पूरे शरीर में क्या बेहतर है? खैर, अदिति राव हैदरी ने जो स्पेशल डांस मूव्स किए हैं, ऐसा करने वाली वह पहली अदाकारा नहीं हैं, बल्कि मुगल-ए-आजम में मधुबाला, उमराव जान में रेखा, पाकीजा के चलते-चलते गीत में मीना कुमारी, ऐश्वर्या राय (उमराव जान), बाजीराव मस्तानी में दीपिका भी इस तरह की मादक-मस्तानी चाल से फैंस को दीवाना बना चुकी हैं.
अदिति के हिस्से ये वाहवाही इसलिए भी आ गई है क्योंकि इस जमाने में सोशल मीडिया अपने उरूज पर है और ऐसे में अगर समय के सौवें बारीक हिस्से में भी कोई खूबसूरती है तो वह नजर आ जाती है और उस पर खूब बात होती है. मादक चाल को लेकर बातों का सिलसिला निकल ही पड़ा है तो इस सिलसिले को इतिहास में लिए चलते हैं. वही से इसकी उत्पत्ति का पता चलेगा और यह भी जान सकेंगे कि भारतीय नृत्य शास्त्र परंपरा में चाल का क्या महत्व है.
असल में कोस-कोस पर पानी और चार कोस पर सिर्फ बानी ही नहीं बदल जाती, बदलने लग जाती है संस्कृति, कला-कारीगरी और बदल जाती हैं शैलियां. भारत में जितने राज्य हैं उतने प्रकार की नृत्य शैलियां हैं और उनमें भी कई का संबंध भरत मुनि के नाट्य शास्त्र से है. जब उन्होंने 400 ईसा पूर्व नाट्य विधा से संबंधित ग्रंथ की रचना की तो रसों के संपूर्ण प्रवाह के लिए नृत्य को प्रमुख स्थान दिया. नाटक के कथानक को आगे बढ़ाने, कहानी को विस्तार देने और उसमें रंजकता बनाए रखने के लिए नृत्य एक जरूरी अंग बनकर उभरा और समय के साथ साधकों ने इसे इतना तराशा कि नृत्य अलग ही विधा के तौर पर सामने आया. इसमें अब भरतनाट्यम, मोहिनी अट्टम, कथकली, कथक, कुचीपुड़ी और ऐसी कई अलग-अलग शास्त्रीय शैलियां शामिल हैं. नृत्य अब खुद ही गीत के भाव पर अभिनय के जरिए कहानी कहने की विधा बन गया है, जिसमें नाटक विधा के वह सभी नौ रस समाए हुए हैं, जो इस पूरक कला को संपूर्ण कला बना देते हैं. इन्हीं मे से एक है भाव-भंगिमा.
भाव-भंगिमा नृत्य में सबसे जरूरी अंग है और यही एक शब्द नृत्य को कामसूत्र व काव्य से जोड़ता है. कामसूत्र जहां यौन और कामुकता को बारीकी से परिभाषित करता है तो इसके मूल में शारीरिक सौंदर्य को भी जगह मिली है. यही शारीरिक सौंदर्य प्राचीन काल से लेकर आजतक प्रेमगीत लिखने वाले कवियों की कलम का भी आधार है. इन दोनों ही विधाओं में स्त्री के रूप, सौंदर्य और आकर्षण का बहुत खुलकर वर्णन किया गया है और पौराणिक कथाओं में इनका असर साफ-साफ दिख जाता है.
देवलोक में रहने वाली अप्सराओं जैसे मेनका, रंभा, तिलोत्तमा का वर्णन करते हुए इनके लंबे केश, सुराही सी गर्दन, गहरी आंखें, तिरछी भौंहें, पतली कमर, कसे नितंब और फिर आखिरी में मोहिनी चाल का जिक्र जरूर किया जाता है. ये मोहिनी चाल कोई एक प्रकार की नहीं है, बल्कि कई तरह की हैं और खास बात है कि ये सभी अलग-अलग जंतुओं की चाल पर आधारित हैं. इनमें प्रमुख हैं, हंस चाल, मयूर चाल, हिरणी चाल और गजगामिनी चाल. कामसूत्र और काव्य शास्त्र दोनों में ही इनका बहुत ज्यादा प्रयोग किया गया है.
कालिदास, भवभूति, भारवि और महाकवि भास जैसे सौंदर्य के कवियों ने अपने-अपने काव्य में नारी सुलभ सुंदरता का वर्णन करने के लिए वन्यजीवन के सुंदर-सरल जीवों का खूबसूरती से वर्णन किया है. स्त्री सुलभ चंचलता दिखाने के लिए तो कई बार उनकी चंचलता की उपमा हिरणी से की गई है. कालिदास ने जब अभिज्ञान शाकुंतलम् लिखा तो उन्होंने मेनका की कोमल त्वचा को चंदन की काया लिखा है, वहीं उसकी कमर का घुमाव ऐसा है कि मणिधरों की पत्नियां (नागिन) भी शरमा जाएं. जब दुष्यंत पहली बार वन में शकुंतला को देखते हैं तो हिरणों के संग उन्हीं की तरह कुलांचे भरती वह तरुणी उनके मन को भा जाती है.
इसी तरह ऋतुसंहार के प्रथम सर्ग में कालिदास ग्रीष्म ऋतु का वर्णन करते हैं. यहां वह स्त्री के सौंदर्य का बखान करते हुए आभूषणों से सजे उसके अंगों की शारीरिक बनावट का वर्णन करते हैं, फिर आखिरी पंक्ति में लिखते हैं कि इधर-उधर आवाज निकालते फिरते हुए हंस और उनकी चाल चलतीं रमणियों के पैरों में बजते नूपुर और भी व्याकुल कर रहे हैं.
नितम्बबिम्बैः सदुकूलमेखलैः स्तनैः सहाराभरणैः सचन्दनैः ।
शिरोरुहैः स्नानकषायवासितैः स्त्रियो निदाघं शमयन्ति कामिनां ।।
नितान्तलाक्षारसरागरञ्जितैर्नितम्बिनीनां चरणैः सनूपुरैः ।
पदे पदे हंसरुतानुकारिभिर्जनस्य चित्तं क्रियते समन्मथं । (ऋतुसंहार, कालिदास)
जो गजगामिनी चाल काफी सुर्खियों में है, उसका प्रयोग तो संत तुलसीदास ने भी रामचरित मानस में किया है. मानस में बालकांड का एक प्रसंग है. राम-सीता के विवाह का समय है. श्रीराम मंडप में बैठे हैं, इसी बीच पुरोहित आदेश देते हैं कि कन्या को बुलाइए. तब सीता जी को साथ लेकर उनकी सखियां मंडप में पहुंचती हैं. इस दौरान सीता जी तो बहुत शर्माती हुईं धीमी गति से चल रही हैं, लेकिन उनकी सखियां जिस मद मत्त चाल से चल रही हैं, उसे देखकर ऐसा लगता है कि जंगल में हथिनियों का समूह मतवाली चाल चलते हुए आ रहा है.
चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं।
नवसप्त साजें सुंदरी सब मत्त कुंजर गामिनीं॥
कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं।
मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं॥
भावः सुंदर मंगल का साज सजकर (रनिवास की) स्त्रियां और सखियां आदर सहित सीताजी को लेकर चलीं. सभी सुंदरियां सोलहों श्रृंगार किए हुए मतवाली हथिनियों की चाल से चलनेवाली हैं. उनके मनोहर गान को सुनकर मुनि ध्यान छोड़ देते हैं और कामदेव की कोयलें भी लजा जाती हैं. पायजेब, पैंजनी और सुंदर कंकण ताल की गति पर बड़े सुंदर बज रहे हैं.
खैर,ये हाथी वाली मस्त चाल की उपमा का प्रयोग श्रीराम के लिए भी हुआ है. जब धनुष भंग के लिए श्रीराम उठकर धनुष की तरफ चलते हैं, तब वह बहुत ही सहज हैं, जैसे कि वन में हाथी अकेला ही ध्यान मग्न होकर विचरण करता है.
सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी॥
चलत राम सब पुर नर नारी। पुलक पूरि तन भए सुखारी॥
समस्त जगत के स्वामी राम सुंदर मतवाले श्रेष्ठ हाथी की-सी चाल से स्वाभाविक ही चले. राम के चलते ही नगर भर के सब स्त्री-पुरुष सुखी हो गए और उनके शरीर रोमांच से भर गए.
इसके पहले तुलसीदास ने श्रीराम के उठने-खड़े होने के तरीके की तुलना सिंह से की है.
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा॥
ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएं। ठवनि जुबा मृगराजु लजाएं॥
भाव: गुरु के वचन सुनकर श्री रामजी ने चरणों में सिर नवाया. उनके मन में न हर्ष हुआ, न विषाद और वे अपने खड़े होने की शान से जवान सिंह को भी लजाते हुए सहज स्वभाव से ही उठ खड़े हुए.
एक बार फिर लौटते हैं गजगामिनी पर. आचार्य वात्स्यायन के कामसूत्र में स्त्रियों के चार प्रकार हैं. पद्मिनी, शंखिनी, चित्रणी और हस्तिनी. ये प्रकार स्त्रियों की शरीर की बनावट, अंगों के आकार, उनकी सुडौलता और लंबाई और शरीर के भार के आधार पर तय किए गिए हैं. हस्तिनी स्त्री का शरीर भारी, लेकिन किनारों पर गोल और सुडौल होता है. अपने भार को व्यवस्थित करते हुए वह मंथर गति से चलती है और उसकी यही सामान्य चाल हस्तिनी कहलाती है. यही गजगामिनी है. हस्तिनी वात्स्यायन के ग्रंथ की एक नायिका भी है.
गजगामिनी को रीतिकाल के महाकवि केशवदास ने करेणुका कहा है. साहित्य में जब भी स्त्री का कामुकता के साथ वर्णन किया गया है तब हंसिनी, मयूरी इनके गमन का वर्णन कम मिलेगा, इनका महत्व 'गजगामिनी' से कम दिखाई देता है. रीतिकाल के एक और प्रसिद्ध कवि हुए हैं, रसलीन. उन्होंने तो नायिका भेद बताते हुए गजगामिनी स्त्री की विशेषता पर पूरा काव्य रच डाला है.
कवि रसलीन कहते हैं , 'थूल अंग लोमन छयो गोरी भूरे केस, गजगौनी उरगंधिनी यहे हस्तिनी भेस.'
भाव है कि, स्थूलता लिए अंग, तेजयुक्त लावण्य, गौरवर्ण, श्यामल केश और विशाल जांघें और गजगामिनी, यही हस्तिनी नायिका के गुण हैं. दरअसल अपनी देह के भार को याद रखते हुए, स्त्री अपनी लज्जा शीलता के कारण, कम से कम दैहिक प्रदर्शन हो, इस कोशिश में धीमी गति से चलती है.
जायसी की पद्मावत में, एक जगह पद्मावती भी खुद को गजगामिनी बताती हैं, और कहती हैं कि मेरा सिंदूर ही मेरा अंकुश है.
यह गजगवन गरब जो मोरा । तुम राखा, बादल औ गोरा ॥
सेंदुर-तिलक जो आँकुस अहा । तुम राखा, माथे तौ रहा ॥ (बंधन-मोक्ष खंड, पद्मावत (जायसी)
कविताओं में तो नदियां भी गजगामिनी हैं, जिन्हें पाने के लिए समंदर उतावले हो जाते हैं. कुल मिलाकर यह कि भारतीय इतिहास, पुराण और काव्य की धारा में सौंदर्य वर्णन का जो जखीरा प्राचीन काल से भरा पड़ा है, 'हीरामंडी' में 'बिब्बोजान' की मोहिनी चाल से उसकी बस पलभर की झलक ही सामने आई है, अदिति की मेहनत की भी दाद देनी होगी, जो उन्होंने इसे बेहद खूबसूरती से निभाया है.