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साल था 2018... तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज एक मुस्लिम देश की यात्रा पर थीं. नाम है अजरबैजान, राजधानी बाकू. उस दौरान उनकी एक तस्वीर काफी चर्चा में रही थी. तस्वीर में सुषमा स्वराज हाथ जोड़े खड़ी थीं और उनके सामने ज्वाला धधक रही थी. तस्वीर इसलिए चर्चा में रही, क्योंकि अजरबैजान इस्लामिक देश है और सुषमा स्वराज राजधानी बाकू में ऐसी जगह खड़ी थीं, जहां की नीचे की जमीन खुद के हिंदू धर्म स्थल होने की गवाही दे रही थीं. हिंदू धर्मस्थल का प्रमाण ये था कि पास ही लगे एक शिलालेख पर संस्कृत श्लोक लिखे थे. जिसमें 'श्री गणेशाय नमः' और 'ऊं आग्नेय नमः', भी दर्ज था. अजरबैजान जैसे मुस्लिम देश में मंदिर होना और मंदिर में 'श्री गणेशाय नमः' लिखा होना चर्चा का विषय था और चर्चा इसलिए भी थी कि सनातन परंपरा में महादेव शिव के पुत्र माने जाने वाले, बुद्धि-ज्ञान के देवता के रूप में पूजे जाने वाले और विघ्नहर्ता कहलाने वाले श्रीगणेश किसी तय सीमित स्थान के ही देवता नहीं हैं.
बाकू के मंदिर में श्री गणेशाय नमः
बाकू के मंदिर की तस्वीर बताती है कि हिमालय के दक्षिणी और समुद्र से उत्तर के बीच बसे प्रायद्वीपीय भौगोलिक क्षेत्र भर में ही श्रीगणेश की मान्यता नहीं है, बल्कि वह नक्शे और ग्लोब की मानव निर्मित सीमाओं से परे आस्था का ऐसा विषय हैं, जिसे हर सभ्यता और संस्कृति किसी न किसी रूप में अपना आराध्य मानती है और उन्हें उस आले दर्जे पर बिठाती है, जो जगह उनके मन में ईश्वर के लिए है. सनातन में गणेश शब्द का अर्थ भी, गणों का देवता, गण का स्वामी और अगुआ के तौर पर प्रयोग किया जाता है. ऐसे में श्रीगणेश सहज ही किसी भी जनजाति, उपजाति, वर्ग या समुदाय के देवता-अधिष्ठाता बन जाते हैं. यह गुण उनके गणेश नाम को सार्थक भी करता है.
आदिवासी जनजातियों में हाथी के सिर वाले देवता की पूजा
भारत की पूजा पद्धति के धार्मिक इतिहास को उठाकर देखें तो ऐसे देवताओं की एक लंबी शृंखला मिलती है जो कि लोकदेवता और स्थान देवता के तौर पर पूजे जाते रहे हैं. जंगलों में रहने वाली आदिम जनजातियों के देवता इसी तरह के चिह्न वाले मिलते हैं. आदिवासी जनजातियां प्रकृति की पूजा में विश्वास रखती आई हैं, इसलिए उनके देवताओं के प्रतीकों में भी प्रकृति से जुड़े चिह्न नजर आते हैं. इन प्रतीकों को टोटेम कहा जाता था, और कई देव प्रतिमाएं और देवता इन्हीं टोटेम के संशोधित स्वरूप हैं. भारत की ही कई आदिवासी जनजातियां हाथी के सिर वाले देवता प्रतीक की पूजा करती आ रही हैं, जिन्हें शास्त्र के आधार पर श्रीगणेश से जोड़कर देखा जाता है.
अमरकंटक की संथाली जाति अपने देवता 'मरांग बुरू' के अलावा हाथी पूजा भी करती है. हाथी पूजा के पीछे उनकी मान्यता है कि वह बहुत ताकतवार और विशालकाय हैं, इसलिए वह शांत रहें और उनकी बस्तियों में प्यार से आवाजाही करें. इसी तरह कोयंबटूर के भगवती अम्मन मंदिर के प्रांगण में एक हाथी प्रतिमा विराजित है. हर त्योहार के दिन खेतिहर किसान इस प्रतिमा की पूजा करते हैं और फसलों की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करते हैं. उत्तर भारत में भी हाथी बेहद सम्मानित जंगली जीव है और ग्रामीण अंचलों में बने कई मंदिरों में हाथी मुख्य द्वार के पास बना होता है. यह सिर्फ सजावट के लिए की गई नक्काशी नहीं है, बल्कि हाथी को द्वार पर बनाने की मंशा कुछ ऐसी है कि प्रकृति का ये विशालकाय जीव उनकी सीमा की सुरक्षा करे. मल्लाहों और बांस का काम करने वाली जातियों के बीच भी हाथी पूज्य है और वे खास मौकों पर मिट्टी से हाथी के सिर वाले देवता का प्रतीक चिह्न उकेरकर उसकी पूजा करते हैं.
ये सभी उदाहरण पारंपरिक त्योहार गणेश चतुर्थी या फिर सार्वजनिक रूप से की जाने वाली गणेश पूजा के नहीं है, हालांकि कालांतर में यही पूजा पद्धितयां नगरीय सभ्यता में आकर गणेश पूजा से मिल गई और हाथी के प्रतीक चिह्न वाली पूजा का जुड़ाव कहीं न कहीं गणेश पूजा से होता है जो आज व्यापक रूप से मनाया जाने वाला त्योहार है.
सनातन परंपरा में श्रीगणेश शिव-पार्वती के पुत्र हैं, जिन्हें उन्होंने अपनी संतान के रूप में अपनाया है, लेकिन यही परंपरा ईश्वर को अजन्मा भी बताती है. इससे ये संकेत मिलता है कि श्रीगणेश की मान्यताओं की मौजूदगी उनके प्राकट्य की प्रचलित कथा से पुरानी है. इसीलिए पौराणिक कथाओं में हर देवता के विराट स्वरूप की कल्पना की गई है. जैसे विष्णु का विराट स्वरूप महाविष्णु नारायण का है, दुर्गाजी का विराट स्वरूप अष्टभुजा देवी का है. शिवजी का विराट स्वरूप पंचानन सदाशिव का है, ठीक इसी तरह श्रीगणेश का विराट स्वरूप विनायक महागणेश कहलाता है. ये विराट स्वरूप इस बात का संकेत हैं कि देवता या देवतत्व एक एनर्जी के रूप में प्रकृति में हमेशा मौजूद होते हैं. उनके जिन स्वरूपों की हम पूजा करते हैं वह बस उनका एक फॉर्म है, जो व्यापक नहीं है. देवताओं का यही दिखने वाला रूप हर कवि का कल्पना में अलग-अलग है. कहीं वही बालक के रूप में है, कहीं संहारक, कहीं रक्षक, कहीं मार्गदर्शक और इसके अलावा साथी, सहयोगी भी उसके रूपों में से एक रूप है. इसलिए श्री गणेश की कल्पना भी पार्वतीपुत्र, बाल गणेश, मोदक प्रिय, बुद्धि दाता और विघ्नहर्ता के रूप में होती है.
उनके स्वरूप पूजा की पद्धतियां तो भारत ही नहीं बल्कि विश्व की अलग-अलग सभ्यताओं में मौजूद दिखाई देती हैं. आप उन्हें सीधे गणपति या गणेश नहीं कह सकते हैं, लेकिन उनके विषय में जो मान्यताएं प्रचलित हैं वह गणेशजी के लिए प्रचलित भारतीय मान्यताओं से जरूर मेल खाती हैं.
फ्रा फिकानेतः थाईलैंड के गणेश जी
थाइलैंड एक बौद्ध बहुल देश है और थेरवाद वहां का प्रमुख धर्म है, बावजूद इसके थाइलैंड में हाथी के मुख वाले एक देवता की बहुत मान्यता है, जिन्हें 'फ्रा फिकानेत' के नाम से जाना जाता है. मोटे-मोटे हाथ पैर, बढ़ा हुआ पेट और चेहरे के स्थान पर हाथी के सिर वाली संरचना, जिसमें दो सूप जैसे कान और लंबी सूंड़ प्रमुख है. देवता के सिर पर पांच कोनों वाला एक मुकुट भी रखा दिखता है, जिसके हर कोने पांच तत्वों का संकेत है. बौद्ध धर्म में भी सनातन की तरह ही पंचतत्व (धरती, जल, वायु, अग्नि, आकाश) का बहुत महत्व है. फ्रा पिकानेत (Phra Phikanet) थाईलैंड में भगवान गणेश का स्थानीय रूप है. थाई लोग देवता को कला, विद्या, और समृद्धि का प्रतीक मानते हैं और यह भी मानते हैं कि यह देवता उनके कौशल में आने वाली हर बाधा को दूर करेगा. फ्रा फिकानेत की मान्यता बिजनेस में तरक्की के लिए भी की जाती है और लोग इसे लकी चार्म की तरह मानते हैं.
जापान में प्रचलित बौद्ध धर्म का एक हिस्सा बौद्ध तंत्र का भी है. इस तंत्र में एक प्रमुख देवता हैं कंगितेन. कंगितेन देवता का सिर बड़ा है और उनकी लंबी नाक है जो गर्दन से नीचे तक आती है. उनके कई हाथ हैं. उनके चित्रण में कई बौद्ध और हिंदू प्रतीकों का संयोजन दिखाई देता है. उनका एक हाथ वरद मुद्रा में दिखता है, और माना जाता है कि कंगितेन इस हाथ से उन्हें समृद्ध बना देते हैं. बिल्कुल भारतीय मान्यताओं की तरह, जहां श्रीगणेश को रिद्धि-सिद्धि देने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है.
कंबोडिया में भी होती है गणेश पूजा
कंबोडिया एक ऐसा देश है, जिसने कई हिंदू परंपराओं को अपना रखा है. यहां शिव, विष्णु, कृष्ण के अलावा श्रीगणेश की पूजा भी बड़े पैमाने पर दिखाई देती है. यहां उन्हें गणपति नाम से ही जाना जाता है और कई बड़े-बड़े गणेश मंदिर इस देश में बनाए गए हैं. कंबोडिया में हिंदू धर्म की पुरानी परंपराएं विशेष रूप से अंगकोर साम्राज्य के समय की विरासत हैं. यहां भी श्रीगणेश प्रथम पूज्य ई्ष्ट हैं और उनकी पूजा पद्धति भारतीय मंत्र-जाप, आरती और हवन से जुड़ी है. गणेश की पूजा कंबोडिया की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी है.
श्रीलंका में विराजते हैं भगवान पिल्लयार
भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका में बड़े पैमाने पर भगवान पिल्लयार की पूजा की जाती है. भगवान पिल्लयार, श्रीलंका में श्रीगणेश का ही एक स्थानीय नाम है. यह नाम तमिल भाषा से निकला है. यह मूल शब्द पिल्लयी अय्यर से बना है. तमिल में पिल्लयी का अर्थ बच्चा होता है और पिल्लयी अय्यर का अर्थ हुआ, वो महान बच्चा जो सबका स्वामी है. भारत की ही तरह श्रीलंका में भी भगवान पिल्लयार की पूजा गणेश चतुर्थी जैसे त्योहारों पर होती है. इसके अलावा, कई मंदिरों में, विशेष रूप से तमिल बहुल क्षेत्रों में, भगवान पिल्लयार की मूर्तियां और मंदिर देखने को मिलते हैं. श्रीलंका के कोलंबो, जाफना, और माना में प्रमुख गणेश मंदिर हैं. भगवान पिल्लयार की पूजा विघ्नहर्ता और समृद्धि के देवता के तौर पर की जाती है.
इंडोनेशिया में भी गणेश पूजा की मान्यता
गणेश जी की पूजा के चिह्न इंडोनेशिया में भी मिलते हैं. यहां बाली में कई मंदिर हैं जहां गणेशजी की पूजा की जाती है. इनमें उलुवातू मंदिर (Uluwatu Temple) और स्नागग मंदिर (Sangeh Temple) प्रसिद्ध हैं. इसके अलावा जावा का प्रसिद्ध प्रंबानन मंदिर भी (Prambanan Temple) अपनी गणपति प्रतिमा के लिए पहचाना जाता है, जहां हिंदू सांस्कृतिक प्रभाव देखने को मिलता है. साल 1998 में इंडोनेशिया ने एक करेंसी भी जारी की थी, जिसमें गणेश जी की तस्वीर बनी थी. यह करेंसी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए जारी की गई थी, क्योंकि माना जाता है कि श्रीगणेश विद्या के देवता हैं. हालांकि ये करेंसी साल 2008 के बाद से चलन में नहीं है.