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श्रीलंका की तरह इराक में भी अराजकता, भीड़ ने संसद को कब्जे में लिया, जानें क्यों बनी स्थिति

इराक में पिछले साल अक्टूबर में चुनाव करवाए गए थे. इसमें शिया धर्मगुरु मौलाना मुक्त-दा अल-सद्र की पार्टी ने 329 सीटों वाली संसद में 73 सीटें जीतीं और संसद में सबसे बड़ी पार्टी बन गई. लेकिन मौलाना सद्र ने अन्य दलों के साथ मिलकर काम करने से इनकार कर दिया था. इसलिए गठबंधन की सरकार का गठन नहीं हो पाया है.

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इराक के काबुल में भीड़ संसद में घुस गई और हंगामा किया. इराक के काबुल में भीड़ संसद में घुस गई और हंगामा किया.
स्टोरी हाइलाइट्स
  • इराक में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से लोग नाराज
  • संसद में सेल्फी लेते दिखी भीड़, सिगरेट के कश लगाए

श्रीलंका जैसे हालात गुरुवार को इराक में भी देखने को मिले. इराक की राजधानी बगदाद में बुधवार को हजारों प्रदर्शनकारी संसद के भीतर घुस गए और नारेबाजी करने लगे. कई प्रदर्शनकारियों ने संसद के अंदर इराकी झंडा लहराते हुए नारेबाजी की. कई प्रदर्शनकारी तो टेबल और कुर्सियों पर चढ़ गए. सेल्फी लेने लगे, गाना गाने लगे और डांस करने लगे. सोफे पर बैठकर सिगरेट के कश लगाते हुए भी दिखाई दिए.

इराकी संसद की ये तस्वीरें देखकर आपको श्रीलंका की पुरानी तस्वीरें याद आ गई होंगी, जब इसी तरह वहां की संसद पर कब्जा कर लिया गया था. बताते चलें कि इराकी संसद बगदाद शहर के उस ग्रीन जोन में स्थित है, जिसे देश का सबसे सुरक्षित इलाका माना जाता है. यहां पर सभी महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालय हैं और अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों के दूतावास भी इसी इलाके में हैं.

दीवार पर चढ़कर अंदर घुस गए प्रदर्शनकारी

संसद में घुसने से पहले इराकी सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े. सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने के लिए टीयर गैस गन का इस्तेमाल किया. इस दौरान सुरक्षाबलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प भी हुईं. कई प्रदर्शनकारी घायल भी हो गये. लेकिन बाद में कई लोग संसद भवन की दीवारों पर चढ़ गए, तब उन्हें रोकने के लिए सुरक्षाबलों ने वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया.

इराक में हंगामे का कारण राजनीतिक संकट प्रमुख

इराक में प्रदर्शनकारियों के संसद में घुसे के पीछे की कई वजह सामने आई हैं. लेकिन सबसे बड़ी वजह ये है कि इराक में पिछले 9 महीने से ना तो कोई स्थाई प्रधानमंत्री है. ना कोई मंत्रिमंडल है और ना ही कोई सरकार है. इस वजह से वहां राजनीतिक अराजकता की स्थिति बन गई है. यानी जिस तरह श्रीलंका में राजनीतिक संकट के बाद भीड़ ने संसद को बंधक बना लिया था. अब वैसे ही हालात इराक में बन चुके हैं.

तरीका भी वही है... जगह भी संसद ही है

श्रीलंका के बाद अब इराक में राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ विरोध का गुस्सा फूटा है. हालांकि श्रीलंका के लोग राष्ट्रपति गोटबाया और सरकार को बर्खास्त करके दोबारा चुनाव करवाने के लिए प्रदर्शन कर रहे थे. लेकिन इराक के लोग 9 महीने पहले हुए चुनाव के बावजूद राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सरकार ना बन पाने से परेशान होकर प्रदर्शन कर रहे हैं. दरअसल, ये प्रदर्शनकारी शिया मुस्लिम धार्मिक नेता मौलाना मुक़्तदा अल-सद्र के समर्थक हैं. सद्र की पार्टी इस समय इराकी संसद में सबसे बड़ी पार्टी है, इसके बावजूद बहुमत नही होने से सरकार नहीं बन पाई. फिलहाल, वहां निवर्तमान प्रधानमंत्री मुस्तफ़ा अल-कदीमी देश चला रहे हैं.

मुक्तदा को पीएम बनाने की मांग कर रहे लोग

ये प्रदर्शनकारी पूर्व प्रांतीय गवर्नर और मंत्री मोहम्मद अल-सुदानी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नामांकित किये जाने से खफा हैं. सुदानी को ईरान समर्थक माना जाता है. इसलिए ये लोग सुदानी का विरोध और अपने नेता मुक्तदा अल सद्र को प्रधानमंत्री बनाने की मांग कर रहे हैं.

प्रदर्शनकारी हसन सत्तार ने कहा कि अगर अबू हाशेम (इराकी मौलवी मुक्तदा अल-सद्र) नहीं माने तो उन्हें अच्छी नींद नहीं आएगी. साथ ही कोई भी सत्र जो शेयरों के आधार पर होगा, हम नहीं चाहते कि हम सरकार की नीति को बदल दें. क्योंकि हमने आपको 20 साल तक आजमाया. सत्र होगा तो हम फिर आएंगे, हम आकर आपको आपके स्थान से भगा देंगे। तुम्हें नहीं सोना है.

2016 में भी संसद में घुसी थी भीड़

मौलाना सद्र के समर्थक एक बार पहले 2016 में भी संसद में घुस चुके हैं. साल 2019 में भी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति को लेकर बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए थे. उस समय सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कई लोग मारे गए थे और अब एक बार फिर इराक में वैसे ही हालात बन रहे हैं.

एक अन्य प्रदर्शनकारी ने कहा कि हम इस भ्रष्ट संसद से त्रस्त आ गए हैं. क्योंकि हम सूडानी नहीं चाहते. वह भ्रष्ट है. उसने इराक को तबाह कर दिया. उसने हमारी सभ्यता को नष्ट कर दिया. इससे पहले 2010 में भी इराक में ऐसी ही स्थिति बनी थी, जब 289 दिनों तक इराक में कोई सरकार नहीं थी. और अब एक बार फिर इराक में वैसे ही हालात हैं.

2010 के दूसरी बार लंबे समय तक सरकार नहीं बनी

इतिहास से अगर सबक लें तो कहा जा सकता है कि अमेरिका का काटा पानी भी नहीं मांगता. इराक इसका उदाहरण है, जिसे अमेरिका ने बर्बाद करके छोड़ा है. तेल से समृद्ध देश होने के बावजूद इराक ना तो आर्थिक संकट से उबर पाया है और ना राजनीतिक उथलपुथल से. 2010 के बाद ये दूसरा मौका है जब इतने लंबे समय तक इराक में सरकार ही नहीं है. ऐसा क्यों है ये अब हम आपको आसान भाषा में समझाते हैं.

इसलिए नहीं बन पाई गठबंधन सरकार

दरअसल, पिछले साल अक्टूबर में इराक में चुनाव करवाए गए थे. इसमें शिया धर्मगुरु मौलाना मुक्त-दा अल-सद्र की पार्टी ने 329 सीटों वाली संसद में 73 सीटें जीतीं और संसद में सबसे बड़ी पार्टी बन गई. लेकिन मौलाना सद्र ने अन्य दलों के साथ मिलकर काम करने से इनकार कर दिया था. इसलिए गठबंधन की सरकार का गठन नहीं हो पाया है.

यही वजह है कि इराक में पिछले 9 महीनों से राजनीतिक गतिरोध की स्थिति बनी हुई है और अबतक ना राष्ट्रपति चुना जा सका है और ना सरकार बन सकी है. दरअसल, इराक के संविधान के मुताबिक, चुनाव जीतने के बाद इराक के सभी सांसदों को दो-तिहाई बहुमत से किसी एक सदस्य को नए राष्ट्रपति के तौर पर चुनना होता है. फिर नए राष्ट्रपति. सबसे बड़े राजनीतिक दल को 30 दिन के अंदर सरकार बनाने और प्रधानमंत्री चुनने के लिए आमंत्रित करते हैं.

अभी कार्यवाहक पीएम के अधिकार सीमित

लेकिन इराक के राजनीतिक दलों में सहमति नहीं बन पाने की वजह से अब तक राष्ट्रपति पद खाली है और इराक में कोई स्थाई प्रधानमंत्री नहीं है. फिलहाल मुस्तफा अल-कदीमी कार्यकारी प्रधानमंत्री हैं. लेकिन उनके अधिकार भी सीमित हैं,.इसकी वजह से इराक के लिए 2022 का कोई बजट नहीं है जिससे वहां बुनियादी जरूरत की परियोजनाओं और आर्थिक गतिविधियों के लिए खर्च रुक गया है.

इराक आज जिस हालत में है, उसका सबसे बड़ा जिम्मेदार अमेरिका है. जिसने अपने मुनाफे के लिए इराक का जमकर शोषण किया और जब उसका मतलब पूरा हो गया तो उसने इराक को उसकी भयानक मुसीबतों के साथ छोड़ दिया.

लोकतंत्र शब्द का इस्तेमाल करके अमेरिका जैसी महाशक्तियों ने दुनिया के कई देशों को बर्बाद किया है. लोकतंत्र सशक्त हो. मज़बूत हो तो मिसाल बन जाता है. लेकिन अगर लोकतंत्र में कमज़ोरियां आ जाएं.. दरारें पड़ जाएं तो देश में अराजकता फैलते देर नहीं लगतीं. कहने के लिए तो इराक भी एक लोकतंत्र है. श्रीलंका भी एक लोकतंत्र है. अफगानिस्तान भी 2021 तक लोकतंत्र ही था. लेकिन इसी लोकतंत्र शब्द की आड़ में इन देशों की हालत खराब कर दी गई. ये Flawed Democracy यानी दोषों से भरे हुए बीमार लोकतंत्र का प्रतीक है.

(आजतक ब्यूरो)

 

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