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अमेरिका, सऊदी अरब और चीन के इस ऐलान से बढ़ी भारत की मुश्किल

अमेरिका, ब्रिटेन, सऊदी अरब और चीन ने नेट जीरो के लक्ष्य को हासिल करने के लिए डेडलाइन तय कर दी है. सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने हाल ही में घोषणा की है कि साल 2060 तक उनका देश कार्बन उत्सर्जन को लेकर नेट जीरो के टारगेट को हासिल कर लेगा. दुनिया में तीसरे सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक भारत पर भी नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन को लेकर दबाव बढ़ गया है.

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पीएम मोदी फोटो क्रेडिट: रॉयटर्स
पीएम मोदी फोटो क्रेडिट: रॉयटर्स
स्टोरी हाइलाइट्स
  • ग्लासगो में क्लाइमेट चेंज को लेकर होगा सम्मेलन
  • पर्यावरण मंत्री के अलावा पीएम मोदी भी करेंगे शिरकत

चीन और अमेरिका के बाद दुनिया में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में भारत तीसरे नंबर पर है. अमेरिका, चीन, सऊदी अरब और ब्रिटेन समेत तमाम देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती कर नेट जीरो कार्बन एमिशन के लक्ष्य तक पहुंचने की समयसीमा का ऐलान कर चुके हैं. अब भारत पर भी ऐसा करने के लिए दबाव बढ़ रहा है.

नेट जीरो एमिशन का मतलब है कि सभी देश पर्यावरण में ग्रीन हाउस गैसों का उतना ही उत्सर्जन करें जितना वे जंगल बढ़ाकर या अन्य तरीकों से कम कर सकें. ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की वजह से धरती का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है जो पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बना हुआ है.

अमेरिका, चीन और सऊदी अरब कर चुके हैं नेट जीरो का ऐलान

अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन ने नेट जीरो के लक्ष्य को हासिल करने के लिए साल 2050 की डेडलाइन तय की है. वहीं, चीन और सऊदी अरब ने नेट जीरो कार्बन एमिशन के लिए साल 2060 की समयसीमा तय की है. 

हालांकि, जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर इसी हफ्ते से शुरू हो रहे COP26 सम्मेलन (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज ) से पहले भारत ने नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन के कदम को खारिज कर दिया है. 

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COP-26 सम्मेलन स्कॉटलैंड की राजधानी ग्लासगो में 31 अक्टूबर से शुरू हो रहा है और ये 13 दिनों तक चलेगा. इस सम्मेलन में अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन भी शामिल होंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसमें हिस्सा लेने वाले हैं.

नेट जीरो कार्बन एमिशन के टारगेट पर क्या बोले पर्यावरण मंत्री? 

भारत के पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने बुधवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा कि नेट जीरो टारगेट का ऐलान करने से जलवायु परिवर्तन की समस्या हल नहीं होने वाली है. उन्होंने कहा कि ये भी देखना जरूरी है कि नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य तक पहुंचने से पहले वातावरण में कार्बन में कितनी बढ़ोत्तरी हो चुकी होगी.

उन्होंने कहा, अब से लेकर इस सदी के मध्य तक, अमेरिका 92 गीगाटन कार्बन और यूरोपीय यूनियन 62 गीगाटन कार्बन वातावरण में उत्सर्जित कर चुका होगा. वहीं, चीन नेट जीरो टारगेट तक पहुंचने से पहले 450 गीगाटन्स कार्बन उत्सर्जन करेगा.

पर्यावरण मंत्री ने कहा कि ग्लासगो सम्मेलन की सफलता इस बात से तय होगी कि विकासशील देशों को उत्सर्जन में कटौती करने में मदद करने के लिए कितना फंड मिलता है.

पर्यावरण मंत्री ने कहा कि भारत पेरिस कॉन्फ्रेंस, 2015 में निर्धारित लक्ष्य के करीब है और इसमें बदलाव के लिए भी तैयार है. भारत ने साल 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में 33 से 35 फीसदी कटौती करने का संकल्प लिया था. साल 2016 तक भारत ने कार्बन उत्सर्जन में 24 फीसदी की कमी की है.

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भारत समेत कई विकासशील देशों का तर्क है कि नई तकनीक की मदद से ही कार्बन उत्सर्जन में कटौती लाई जा सकती है और इसके लिए वित्तीय मदद बहुत जरूरी है.

क्लाइमेट चेंज को लेकर छह साल पहले हुआ पेरिस समझौता

ग्लासगो का सबसे महत्वपूर्ण एजेंडा है- पेरिस समझौते के नियमों को लेकर रूपरेखा तैयार करना. गौरतलब है कि साल 2015 में क्लाइमेट चेंज को लेकर ये समझौता हुआ था. इस समझौते का मकसद कार्बन गैसों का उत्सर्जन कम कर धरती के बढ़ रहे तापमान को रोकना है. इसके बाद दुनिया के देशों ने अपने-अपने लक्ष्यों को निर्धारित किया था. हर देश को ये भी बताना है कि वह नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को कब तक हासिल कर लेगा.

हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक, ये नाकाफी है और इन देशों ने जो लक्ष्य निर्धारित किए हैं उससे दुनिया का तापमान इस सदी के अंत तक 2.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ सकता है और दुनिया के कई हिस्सों में जबरदस्त तबाही मच सकती है. यही कारण है कि इस सम्मेलन में इस बात पर फोकस किया जाएगा कि 2 डिग्री नहीं बल्कि दुनिया के सभी देशों को मिलकर इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा ना बढ़ने देने का संकल्प करना होगा.
 



 

 

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