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जर्मनी के ऑफिसों के ये नियम जान भारतीय बोले- काश, भारत में भी ऐसा होता

जर्मनी में काम कर रहे एक भारतीय इंजीनियर ने वहां के ऑफिस कल्चर से जुड़ी 5 ऐसी बातें साझा की हैं, जिन्होंने उसे सबसे ज्यादा हैरान किया. उसकी पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और इस पर लोगों के बीच चर्चा शुरू हो गई.

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जर्मनी में छुट्टियों को बेहद गंभीरता से लिया जाता है (Photo: Pexel)
जर्मनी में छुट्टियों को बेहद गंभीरता से लिया जाता है (Photo: Pexel)

जर्मनी में नौकरी करने वाले एक भारतीय इंजीनियर की सोशल मीडिया पोस्ट इन दिनों खूब चर्चा में है. इंजीनियर ने जर्मनी के ऑफिस कल्चर से जुड़ी 5 ऐसी बातें बताई हैं, जिन्होंने उसे सबसे ज्यादा हैरान किया. उसकी पोस्ट वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर भारत और यूरोप के कार्यस्थल माहौल को लेकर बहस शुरू हो गई है.

इंजीनियर सुशांत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी पोस्ट में लिखा कि जर्मनी में काम शुरू करने के बाद उन्हें कई ऐसी चीजें देखने को मिलीं, जो भारत के कई दफ्तरों से काफी अलग हैं. उन्होंने बताया कि वहां कर्मचारी अपने सीनियर या बॉस को 'सर' या 'मैडम' नहीं कहते. यहां तक कि कंपनी के सीईओ को भी लोग उनके पहले नाम से बुलाते हैं.

सुशांत ने बताया कि जर्मनी में मीटिंग्स भी काफी अलग तरीके से होती हैं. अगर मीटिंग का एजेंडा तय समय से पहले पूरा हो जाए तो बैठक तुरंत खत्म कर दी जाती है. इसके अलावा लंच ब्रेक को कर्मचारियों का निजी समय माना जाता है. इस दौरान किसी से काम करने या काम से जुड़े संदेशों का जवाब देने की उम्मीद नहीं की जाती.

देखें पोस्ट

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छुट्टी मतलब पूरी छुट्टी!

उन्होंने यह भी बताया कि जर्मनी में छुट्टियों को बेहद गंभीरता से लिया जाता है. अगर कोई कर्मचारी छुट्टी पर है तो उसे पूरी तरह काम से दूर माना जाता है. छुट्टी के दौरान न तो उससे ईमेल का जवाब देने की उम्मीद की जाती है और न ही किसी ऑफिस कॉल का. सुषांत के मुताबिक, यह बात उन्हें सबसे ज्यादा अलग लगी.

एक और चीज जिसने उन्हें प्रभावित किया, वह थी बीमार पड़ने पर मिलने वाली सुविधा. उन्होंने कहा कि अगर कोई कर्मचारी स्वास्थ्य कारणों से छुट्टी लेता है तो उससे बार-बार सवाल नहीं किए जाते और न ही उसे अपराधबोध महसूस कराया जाता है.

सर' कहने की आदत

पोस्ट के अंत में सुशांत ने मजाकिया अंदाज में लिखा, "पांच साल बाद भी मैं कभी-कभी गलती से सर कह देता हूं. पुरानी आदतें इतनी आसानी से नहीं जातीं."

सुशांत की पोस्ट वायरल होते ही सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई. एक यूजर ने लिखा कि भारत में बचपन से ही 'सर' और 'मैडम' कहने की संस्कृति रही है, इसलिए विदेश जाकर इस आदत को बदलना आसान नहीं होता. वहीं दूसरे यूजर ने कहा कि ये कोई विशेष सुविधाएं नहीं, बल्कि कर्मचारियों के बुनियादी अधिकार हैं.

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कई लोगों ने यूरोपीय देशों के बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस की भी तारीफ की. कुछ यूजर्स ने बताया कि कई यूरोपीय देशों में छुट्टी के दौरान कर्मचारियों को परेशान न करना श्रम कानूनों का हिस्सा है. यही वजह है कि सुशांत की यह पोस्ट अब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है.

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