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पाकिस्तान नहीं, धारा 370 पर इसलिए उड़ी हुई है चीन की नींद

पाकिस्तान नहीं, धारा 370 पर इसलिए उड़ी हुई है चीन की नींद
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5 अगस्त को जब मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर के विशेषाधिकार खत्म करते हुए राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने की घोषणा की तो पाकिस्तान की आपत्ति साफ तौर पर नजर आई लेकिन चीन की भूमिका पर ज्यादातर लोगों का ध्यान नहीं गया.

(फोटो- चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग)
पाकिस्तान नहीं, धारा 370 पर इसलिए उड़ी हुई है चीन की नींद
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जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे से जुड़े अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को खत्म करने के साथ केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र पर अपनी पकड़ भी मजबूत कर ली. हमेशा की तरह पाकिस्तान ने कश्मीर को लेकर खूब शोर मचाया और भारत के साथ अपने राजनयिक संबंधों में भी कमी लाने का ऐलान कर दिया.

(चीन के दौरे पर भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर)

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मोदी सरकार के फैसले के बाद पाकिस्तान के साथ-साथ चीन के सामने भी भू-राजनीतिक चुनौतियां पेश हो गई हैं. दरअसल, चीन का कश्मीर के एक बड़े हिस्से अक्साई चिन पर कब्जा है जो लद्दाख के ठीक पूर्व में स्थित है. लेकिन अब लद्दाख पर सीधे तौर पर केंद्र सरकार का शासन होगा जो चीन के लिए परेशानी का सबब बन गया है.
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कश्मीर विवाद में चीन की पुरानी भूमिका रही है. 1962 में पाकिस्तान के साथ संधि करते हुए चीन ने कश्मीर से लगे हिस्से पर अपना कब्जा जमा लिया था. वर्तमान में चीन और पाकिस्तान का व्यापार नवनिर्मित कराकोरम हाईवे से होता है जो पश्चिमी कश्मीर क्षेत्र में दोनों देशों को जोड़ता है. अरबों डॉलर की लागत से बने चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर परियोजना के तहत इस सड़क को कई लेन वाले हाईवे में विकसित किया जा रहा है ताकि पूरे साल इस रास्ते से व्यापार हो सके.
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भारत और भूटान दो ऐसे देश हैं जिनके साथ चीन का सीमाई विवाद आज तक अनसुलझा है. विश्लेषकों का कहना है कि दिल्ली का कश्मीर पर उठाया गया कदम भारत-चीन के बीच भविष्य में होने वाली वार्ताओं को और जटिल बना सकता है.
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चीन की सेना नियमित तौर पर लद्दाख में घुसपैठ करती रहती है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर जब चीन के दौरे पर पहुंचे तो चीन की घबराहट साफ दिखी. चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने एस. जयशंकर से मुलाकात में कहा कि भारत के नए फैसले में 'चीनी क्षेत्र' शामिल है.
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लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के फैसले पर आपत्ति जताते हुए चीन के विदेश मंत्री ने कहा कि इस कदम से चीन की संप्रभुता के लिए चुनौती पैदा होती है और इससे दोनों देशों के बीच सीमाई इलाके में शांति व स्थिरता कायम रखने के समझौते का भी उल्लंघन हुआ है.

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जयशंकर ने चीन को आश्वस्त करते हुए कहा कि लद्दाख पर फैसले से भारत की बाहरी सीमा पर कोई असर नहीं पड़ेगा और वह किसी अतिरिक्त क्षेत्रीय दावे को पेश करने की कोशिश नहीं कर रहा है. लेकिन चीन के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, भारत का कदम ना तो चीन के लिए वैध है और ना ही इससे यथास्थिति में कोई बदलाव आएगा- यानी भारतीय फैसले में शामिल क्षेत्र पर चीन की संप्रभुता और प्रशासनिक व्यवस्था बनी रहेगी.
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भारत सरकार के फैसले के आने के एक दिन तक चुप्पी बरतने के बाद चीन के विदेश मंत्रालय की सख्त प्रतिक्रिया आई थी. चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हु चुयिंग ने कहा था, बीजिंग हमेशा से भारत-चीन सीमा के पश्चिम में स्थित चीनी क्षेत्र को भारत द्वारा अपने प्रशासनिक क्षेत्र में शामिल करने की कोशिशों का विरोध करता रहा है.

(पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग)
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अनुच्छेद-370 को हटाने के संदर्भ में उन्होंने कहा, भारत ने अपने घरेलू कानून में एकतरफा बदलाव लाकर चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की है.
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ऐसे वक्त में जब चीन विवादित दक्षिण चीन सागर में दावा पेश करने वाले देशों पर हावी होने के लिए अपने घरेलू कानून का इस्तेमाल कर रहा है, भारत पर चीन की संप्रभुता का उल्लंघन करने का उसका आरोप काफी दुस्साहस भरा लगता है.
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विश्लेषकों का कहना है कि लद्दाख से लेकर अक्साई चिन तक अब भारत की पकड़ मजबूत होगी लेकिन इससे भारत के लिए चीन से सीमाई विवाद सुलझाने में चुनौतियां पैदा हो सकती हैं. इसी साल, दोनों देशों के बीच सीमाई विवाद को लेकर 22वें दौर की वार्ता होनी है.

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कई सालों से चीन के साथ भारत का अस्थायी तौर पर सीमाई विवाद होता रहा है, लेकिन 2017 में डोकलाम टकराव को छोड़ दें तो दोनों देशों के बीच वार्ता हमेशा जारी रही है. सीमाई विवाद का कोई आखिरी हल नहीं निकलने के बावजूद दोनों देश पुरानी यथास्थिति को बनाए हुए थे. एक तरफ, भारत अक्साई चिन को लेकर उदासीनता बरत रहा था तो दूसरी तरफ अरुणाचल प्रदेश पर चीन अपने दावे पर आक्रामक नहीं हुआ.
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साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट में 'द डिप्लोमैट' के सीनियर एडिटर अंकित पंडा लिखते हैं, अनुच्छेद 370 को हटाने के मोदी सरकार के फैसले के बाद बीजिंग सीमा मुद्दे पर खुद को असहज स्थिति में खड़ा पा सकता है. चीन अरुणाचल प्रदेश में तवांग पर भी अपना दावा पेश करता रहा है और ये दावा लद्दाख के पुर्नगठन के फैसले के बाद और आक्रामक तौर पर सामने आ सकता है. इसके अलावा, दलाई लामा के बाद अगर बीजिंग द्वारा नियुक्त और तिब्बत के बाहर वैध उत्तराधिकारी की लड़ाई होती है तो सीमाई विवादों में तवांग प्रमुखता से जगह पा सकता है.
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फिलहाल, वास्तविक नियंत्रण रेखा (LoAC) पर चीन की गतिविधियां तेज हो सकती हैं. हालांकि, 2017 की तरह डोकलाम की तरह संघर्ष होने की आशंका कम ही है लेकिन भारत के सामने अनुच्छेद 370 पर अपने दो असंतुष्ट पड़ोसियों से निपटने की चुनौती जरूर होगी.