मोहन भागवत ने कहा कि मेरी बात है कि पचहत्तर वर्ष पूरे होने के बाद मैंने कार्यकर्ताओं को कहा कि अब काम पूरा हो गया है. मैं यहां अपनी इच्छा से नहीं रहता हूँ, बल्कि यह संघ का निर्णय होता है.