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साइंस न्यूज़

Hemkund Sahib Avalanche Prone: हेमकुंड साहिब के यात्रा मार्ग पर हिमस्खलन का बड़ा खतरा, वैज्ञानिकों की चेतावनी

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सिखों के आस्था का केंद्र हेमकुंड साहिब ऐसी जगह पर मौजूद है, जहां पर हिमस्खलन का खतरा सबसे ज्यादा बना रहता है. यहां के अटालाकोडी पैदल मार्ग पर एवलांच का रिस्क ज्यादा है. यह चेतावनी दी है देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने. संस्थान के साइंटिस्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि अटालाकोडी पैदल मार्ग पर किसी भी तरह का निर्माण कार्य न किया जाए. क्योंकि यह रास्ता और उसके नीचे की जमीन मजबूत नहीं है. अगर यहां किसी तरह का भवन, सड़क या कोई अन्य निर्माण कार्य होता है तो इससे खतरा और बढ़ जाएगा. (फोटोः गेटी)

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चमोली जिले में 58 जगहों पर हिमस्खलन का खतरा

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के निदेशक डॉ. कालाचंद साईं और डॉ. मनीष मेहता ने अटालाकोडी पैदल मार्ग की पूरी स्टडी की है. जिसमें कहा गया है कि उत्तराखंड का चमोली जिला प्राकृतिक आपदाओं की लिहाज से खतरनाक है. यहां पर 58 ऐसी जगहें हैं जो खतरनाक हिमस्खलन के लिए पहचाने गए हैं. उनमें से हेमकुंड साहिब का सात किलोमीटर लंबा अटालाकोडी पैदल मार्ग भी है. यह ट्रैक 3000 से 4800 मीटर की ऊंचाई के बीच स्थित है. रिस्क वाली बात ये है कि इस रूट के अंत में घाटी की तरफ घांघरिया इलाके और हेमकुंड साहिब के बीच पूरा का पूरा लक्ष्मणगंगा जलग्रहण क्षेत्र है, जो हिमस्खलन जोन में आता है. 

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हेमकुंड साहिब के हिमस्खलन रूट को समझिए...

हेमकुंड साहिब में हर साल पांच लाख से अधिक तीर्थ यात्री घांघरिया से हेमकुंड साहिब के बीच मौजूद सात किलोमीटर की ऊंची चढ़ाई चढ़ते हैं. घांघरिया में काफी ज्यादा इमारतें, सड़कें आदि हैं. स्थानीय लोग इस सात किलोमीटर के ट्रैक को 'अभिशाप वाला रास्ता' भी कहते हैं. वैज्ञानिकों ने इस तस्वीर में बताया है कि हेमकुंड साहिब का पूरा इलाका 2 किलोमीटर चौड़ा है. नीचे कुंड है. उसके बाद के इलाके में फॉर्मेशन जोन (Formation Zone) है, जहां पर बर्फ जमा होती है. इसके बाद नीचे आता है ट्रांजिशन जोन (Transition Zone) यानी यहां से बर्फ नीचे गिरती है. इसी जगह पर अटालाकोड़ी पैदल मार्ग है. फिर नीचे आता है रनआऊट जोना (Runout Zone) यानी जहां पर बर्फ गिरकर जमा होती है. 

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इस इलाके में क्यों होते हैं इतने हिमस्खलन?

घांघरिया से हेमकुंड साहिब तक के मार्ग पर तीखी ढलान है. लक्ष्मणगंगा कैचमेंट एरिया चार किलोमीटर लंबा और 150 मीटर चौड़ा है. इस पूरे रास्ते पर हिमस्खलन थर्मोडायनेमिक परिवर्तनों के वजह से होते हैं. यानी जैसे समुद्री हवाएं मौसम बदलती हैं. वैसे ही पहाड़ पर तापमान, तेज हवा और तीखी ढलान हिमस्खलन को बढ़ावा देती है. अगर बर्फ 30 से 45 डिग्री की ढलान पर जमा होती है, तो उसके गिरने की संभावना कम रहती है. लेकिन जैसे कोण में कमी आती या बढ़ोतरी होती है, हिमस्खलन की आशंका बढ़ जाती है. यहां पर तापमान 4 से 10 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है. अगर तापमान इससे ज्यादा होता है तो बर्फ के पिघलकर गिरने की आशंका भी बढ़ जाती है. गर्मियों के शुरुआत में ऐसी घटनाओं की संभावना अधिक रहती है. 

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चमोली जिला प्राकृतिक आपदाओं के लिए संवेदनशील

हेमकुंड साहिब हमें लगभग हर साल हिमस्खलन की खबर आती है. चमोली जिला सिर्फ हिमस्खलन के लिए ही नहीं बल्कि यहां पर भूकंप, भूस्खलन और फ्लैश फ्लड के भी खतरों से जूझता है. पिछले साल 23 अप्रैल को गिर्थी गंगा में आए हिमस्खलन की वजह से भारत-तिब्बत सीमा के पास मौजूद बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन के अस्थाई शेल्टर कैंप बर्बाद हो गए थे. यहां 16 लोगों की मौत हुई थी. 384 लोगों को बचाया गया था. इसके अलावा 2 अक्टूबर 2021 को त्रिशूल पर्वत पर हुए हिमस्खलन से सात लोगों की मौत हो गई थी. 18 अप्रैल 2022 को अटालाकोडी ट्रैक पर भी हिमस्खलन से घांघरिया और हेमकुंड के बीच लक्ष्मणगंगा कैचमेंट के पास रास्ता बर्बाद हो गया था. (फोटोः गेटी) 

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हिमस्खलन से बचने का कोई रास्ता नहीं है

ऊंचे हिमालयी पहाड़ों पर एवलांच की घटना से बचा नहीं जा सकता. धरती के दोनों ध्रुवों के बाद हिमालय को तीसरा ध्रुव कहा जाता है. क्योंकि यहां पर हमेशा बर्फ जमा रहती है. हिमालय के पहाड़ों पर 10 फीसदी बर्फ हमेशा जमी रहती है. सर्दियों में बर्फ की मात्रा बढ़कर 30 फीसदी हो जाती है. ढलानों पर जमी बर्फ के गिरने की वजह से हिमस्खलन की घटनाएं और खतरा कई गुना बढ़ जाता है. दूसरी सबसे बड़ी बात ये है कि हिमालय पर इंसानी गतिविधियां लगातार बढ़ती जा रही हैं. तीर्थयात्रा, पर्यटक और हिमालय पर घनी बसावट और अनियोजित विकास की वजह से हिमालय पर खतरा बढ़ता जा रहा है. (फोटोः गेटी) 

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सरकार ने रोपवे बनाने की बात कही है

हाल ही में राज्य सरकार ने हेमकुंड साहिब के लिए 12.5 किलोमीटर लंबी रोपवे योजना की बात की है. इसमें फूलों की घाटी की 27.4 हेक्टेयर वनभूमि भी शामिल है. वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने रोपवे बनाने को सही ठहराया है. यह एक बेहतर विकल्प हो सकता है. रोपवे से फायदा ये होगा कि तीर्थयात्रियों को सीधे नीचे से ऊपर जाने के लिए खतरनाक रास्ते से नहीं जाना होगा. हिमस्खलन में फंसने का कोई डर नहीं होगा. लोगों को बर्फ के बीच काटे गए रास्तों के बीच से नहीं निकलना होगा. इसलिए उन्हें किसी तरह का खतरा भी नहीं होगा. (फोटोः गेटी)

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हेमकुंड साहिब का वैज्ञानिक नक्शा बनाया गया

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने हेमकुंड साहिब और उसके आसपास के इलाके का नक्शा बनाया. इस दौरान उन्होंने देखा कि हिमस्खलन की वजह से 747,910 वर्ग मीटर का इलाका प्रभावित हुआ है. दोनों वैज्ञानिकों की यह स्टडी जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया जर्नल में प्रकाशित हुई है. (फोटोः गेटी)