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धर्म

नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर जाने से क्यों रोका था?

नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर जाने से क्यों रोका था?
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कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के सोमनाथ मंदिर के दौरे ने इतिहास के कुछ पन्ने पलट दिए हैं और उन पर सियासी बहस भी शुरू हो गई है. राहुल गांधी ने सोमनाथ मंदिर में जलाभिषेक कर दर्शन-पूजन करने के बाद गुजरात में अपनी चुनावी यात्रा शुरु की. राहुल गांधी के सोमनाथ मंदिर के दौरे पर सवाल खड़े करते हुए बीजेपी ने कहा कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का विरोध किया था.
नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर जाने से क्यों रोका था?
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राहुल के सोमनाथ दौरे के बाद कई ट्वीट किए. उन्होंने कहा कि जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद को यहां सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन करने के लिए आना था, तो इस पर पंडित नेहरू ने आपत्ति जताई थी. क्या देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर जाने से मना किया था? अगर ऐसा था तो इसके पीछे क्या वजह थी? आइए जानते हैं...
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सौराष्ट्र के पूर्व राजा दिग्विजय सिंह ने 8 मई 1940 को सोमनाथ के नवनिर्मित मंदिर की आधारशिला रखी तथा 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में ज्योतिर्लिग स्थापित किया था. सोमनाथ मंदिर 1962 में पूर्ण निर्मित हो गया था.
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बात 1947 की है. जब आजादी के बाद सभी रियासतों के विलय का दौर चल रहा था तो जूनागढ़ रियासत के राजा ने भौगोलिक स्थिति को दरकिनार करते हुए फैसला लिया था कि रियासत का विलय पाकिस्तान में ही होगा. लेकिन भारत के तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल जानते थे कि इसकी इजाजत देना देश की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने की तरह होगा.
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सरदार पटेल ने सेना की मदद से जूनागढ़ रियासत का विलय भारत में कर लिया. जब सरदार पटेल जूनागढ़ आए तो उन्हें लगा कि सोमनाथ मंदिर का पुनरुद्धार किया जाना चाहिए. इससे पहले भी मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए कुछ कोशिशें की गई थीं लेकिन सफल नहीं हो पाईं.
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सोमनाथ मंदिर निर्माण में तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल का बड़ा योगदान रहा था. सोमनाथ मंदिर को लेकर देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के बीच गतिरोध भी उत्पन्न हुआ था. सोमनाथ मंदिर को लेकर दोनों नेताओं का दृष्टिकोण अलग-अलग था. सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के प्रस्ताव को लेकर सरदार पटेल, केएम मुंशी और कांग्रेस के दूसरे नेता महात्मा गांधी के पास गए.
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कहा जाता है कि महात्मा गांधी ने इस फैसले का स्वागत किया था लेकिन उन्होंने इसके लिए सरकारी खजाने का इस्तेमाल नहीं करने की सलाह भी दी. लेकिन महात्मा गांधी और सरदार पटेल की मृत्यु के बाद मंदिर के पुनरुद्धार की जिम्मेदारी नेहरू सरकार में खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री केएम मुंशी पर आ गई.
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सोमनाथ मंदिर के एक कार्यक्रम में भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को आमंत्रित किया गया था लेकिन नेहरू नहीं चाहते थे कि देश के राष्ट्रपति किसी धार्मिक कार्यक्रम में शरीक हों. नेहरू का दृष्टिकोण था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है और राष्ट्रपति के इस तरह के कार्यक्रमों में शामिल होने से लोगों के बीच गलत संकेत जाएगा.
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लेकिन डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने उनकी राय नहीं मानी और 1951 में सोमनाथ मंदिर पहुंचे.
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वहीं, नेहरू ने खुद को सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार से पूरी तरह अलग रखा था. नेहरू ने सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखकर सोमनाथ मंदिर परियोजना के लिए सरकारी फंड का इस्तेमाल नहीं करने का निर्देश दिया था.
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वर्तमान भवन के पुनर्निर्माण का आरंभ भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने करवाया और 1 दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया.
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1970 में जामनगर की राजमाता ने अपने पति की स्मृति में उनके नाम से 'दिग्विजय द्वार' बनवाया. इस द्वार के पास राजमार्ग है और पूर्व गृहमन्त्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा भी है.