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हमारे भीतर के मूर्ख की तलाश, चुनाव में गोत्र का जिन्न और इंसानों को नंबर से पहचानने की कल्पना: तीन ताल Ep 25

आज तक रेडियो पर तीन ताल के 25वें एपिसोड में कमलेश ‘ताऊ’, पाणिनि ‘बाबा’ और कुलदीप ‘सरदार’ से सुनिए-

 

-    बुलंदशहर के पास सड़क किनारे कांजी वड़ा क्यों नहीं खाना चाहिए, ताऊ की आपबीती.

-    मूर्ख दिवस की महत्ता. कौन किसे मूर्ख बना रहा है? क्या सब सबको मूर्ख बना रहे हैं? क्या हम सबके भीतर एक मूर्ख छिपा नहीं होता जिसे हम इस दिन दाना डालते हैं?

-    रजनीकांत को दादासाहब फाल्के पुरस्कार मिलने का ऐलान हुआ है. उनकी ‘लार्जर दैन लाइफ’ छवि पर बात. ये भी कि क्यों असल सिनेमा जिसे सुधीजन पॉलिटिक्स कहते हैं, वहां एंट्री से पहले ही  उनका एग्ज़िट हो गया.

-    ‘बिज़ारोत्तेजक’ ख़बरों में शिव पार्वती के भेस में शादी करने वाले कीर्तन मंडली के दो कलाकार और ऐसी अनूठी शादियां. साथ ही वो चोर जिसने उम्मीद से ज़्यादा चुरा लिया तो हार्ट अटैक आ गया और चुराया हुआ पैसा इलाज में लगाना पड़ा.

-    पश्चिम बंगाल के चुनावी मौसम से निकली है गोत्र और चोटी (शिखा) की बात जिसे हम दूर तलक ले गए हैं.

-    म्यांमार में जो हो रहा है, उस पर भारत सिर्फ निंदा करके हाथ कैसे झाड़ सकता है?

-    और बेबी पहिरै लागीं साटन
अब काहे मंगाए काटन, चना जोर गरम
चीनी और कॉटन के इम्पोर्ट पर पटीदार पाकिस्तान क्यों पलट गया? क्यों शांति के कबूतर फड़फड़ाते फड़फड़ाते शांत हो गए?

-    आधार और पैनकार्ड लिंक कराने की आख़िरी डेट फिर आगे बढ़ा दी गई, ये सुनकर हंसी क्यों आती है.

-    अपने नाम के आगे जाति का नाम लगाने से क्या आदमी खांचे में बंध जाता है? या न लगाने से क्या खांचे से बाहर निकल पाता है? क्या हो अगर हम लोग नाम से नहीं, नंबर से जाने जाएं. क्या तब चलेगी जाएगी कम्बख़्त जाति?

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