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आजतक रेडियो

सुनता है सारा जहाँ

एक दूरबीन ने अपनी उम्र में क्या क्या देखा?

एक बूढ़ा दूरबीन बेच रहा है? पर वह दूरबीन सिर्फ दूरबीन नहीं है, वो दरअसल बिम्ब है कई अनुभवों और संवेदनाओं का. सुनिए दिवंगत कवि विष्णु खरे की कविता 'दूरबीन', उन्हीं की आवाज़ में. और आख़िर में इस कविता पर कवि और रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल की टिप्पणी.

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