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मैं भारतीय बुनकरों के कपड़े क्यों पहनता हूं और आपको भी क्यों पहनना चाहिए

सप्ताह में कम से कम एक या दो दिन, आपको हाथों से बुने जैविक कपड़े पहनने चाहिए. यह आपके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में जबरदस्त अंतर लाएगा. आपको किसी की कही बात पर विश्वास करने की जरूरत नहीं है. आप खुद आजमाइए और देखिए कि कैसा महसूस होता है.

सद्गुरु, संस्थापक, ईशा फाउंडेशन सद्गुरु, संस्थापक, ईशा फाउंडेशन

कपड़ा उद्योग धरती पर सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले तीन प्रमुख उद्योगों में से एक है. इसके कई पहलू हैं, लेकिन पॉलीफाइबर से निकलने वाले माइक्रो-प्लास्टिक्स हमारे लिए अभी चिंता का विषय हैं. दुनिया में फाइबरों के उत्पादन में लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा पॉलीफाइबर का है. अगर सड़क पर प्लास्टिक बैग दिख रहा है तो आप जानते हैं कि आपको इसे उठा लेना है? लेकिन पॉलीफाइबर इतने सूक्ष्म स्तर पर फैल चुका है कि वह हर चीज में पहुंच गया है. ये मिट्टी, पानी, और आपके भोजन में है.

अमेरिका के कुछ अध्ययन बताते हैं कि 90 प्रतिशत लोगों के खून में भी कुछ मात्रा में प्लास्टिक है. कुछ मार्मिक तस्वीरें दिखाती हैं कि व्हेल मछलियों का पेट प्लास्टिक से भरा हुआ है, कछुए प्लास्टिक बैग में फंसे हुए हैं. लेकिन हम सब ऐसे कछुए हैं जो पॉलीफाइबर में फंसे हुए हैं. पॉलीफाइबर और सिंथेटिक कपड़ों से जुड़े अध्ययन विभिन्न स्वास्थ्य खतरों के बारे में बताते हैं जिसमें कैंसर भी शामिल है और यह निश्चित रूप से हमारे बच्चों की सेहत पर असर डाल रहा है. कुछ अध्ययन बताते हैं कि बच्चों में स्वलीनता (ऑटिज़्म) सिंथेटिक कपड़ों से जुड़ी हुई है. यह आपको अपंग बनाती है, मानव बुद्धिमत्ता कम होती जाती है. ऐसा अनुमान है कि दुनिया भर में, औसतन, हमारे पास अपने दादा-दादी की तुलना में पांच गुना ज्यादा कपड़े हैं. वे बता रहे हैं कि 2525 तक, ये दोगुना हो जाएगा और हमारे पास अपने दादा-दादी से दस गुना ज्यादा कपड़े होंगे. तो, एक सचेतन तरीके से फैशन करना बहुत महत्वपूर्ण है. 
  
पहली और सबसे अहम चीज है कि हम कपास, रेशम, लिनेन, पटसन, और जूट जैसे प्राकृतिक रेशों की ओर वापस जाएं. दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जिस भी किस्म का प्राकृतिक रेशा उपलब्ध है, यह महत्वपूर्ण है कि आप उसकी ओर वापस जाएं. सप्ताह में कम से कम एक या दो दिन, आपको हाथों से बुने जैविक कपड़े पहनने चाहिए. यह आपके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में जबरदस्त अंतर लाएगा. आपको किसी की कही बात पर विश्वास करने की जरूरत नहीं है. आप खुद आजमाइए और देखिए कि कैसा महसूस होता है. एक सप्ताह तक रॉ-सिल्क या सूती कपड़ा पहनिए- अपने अंतःवस्त्र भी- और देखिए कि आपका शरीर कैसा महसूस करता है. फिर कुछ कसा हुआ और सिंथेटिक पहनिए, और जांचिए. जिस तरह आपका शरीर कार्य करता है, उसके आराम और सुविधा के स्तर में आप एक बड़ा अंतर देखेंगे.
 
किसानों के लिए वरदान

किसानों की बेहतर आय के संदर्भ में, प्राकृतिक रेशों की ओर जाना हमारी आर्थिक स्थिति के लिए भी अच्छा होगा. हम किसान-आत्महत्या और किसानों की दुर्गति को पूरी तरह रोक सकते हैं, अगर खेती का कुछ हिस्सा प्राकृतिक रेशों को उगाने में लगाया जाए. खाद्य पदार्थों की फसल के साथ समस्या यह है कि खाद्य पदार्थ जल्दी खराब हो जाने वाली चीजें हैं तो किसान को उसे तुरंत बेचना होता है. लेकिन अगर उनके खेत का 30 प्रतिशत हिस्सा प्राकृतिक रेशों के पेड़ों से बदल दिया जाता है, तो यह उनके लिए एक बड़ा वरदान होगा. एक समय पर अपना देश यही कर रहा था.
 
बुनकर उद्योग को पुनर्जीवित करना

भारत बाकी दुनिया को सबसे अधिक कपड़े निर्यात करने वाला देश हुआ करता था. लगभग तीन सौ साल पहले, दुनिया के निर्यात का साठ प्रतिशत, भारतीय कपड़े थे. ब्रिटिश दौर में, इसे सिलसिलेवार ढंग से खत्म कर दिया गया. पचास सालों में, तीस से चालीस लाख लोग सिर्फ इसलिए मर गए, क्योंकि हैंडलूम उद्योग को इस हद तक खत्म कर दिया गया कि एक मौके पर एक गवर्नर जनरल ने कहा, ‘भारत के खेत हस्त बुनकरों की हड्डियों से सफेद हो गए हैं. लेकिन हमारे पास अभी भी हुनर है. अगर प्राकृतिक रेशे वापस आ जाते हैं - जरूरी नहीं कि हैंडलूम की तरह बुनाई हो, अगर मशीन की बुनाई भी होती है- तो धरती पर कोई दूसरा देश ऐसा नहीं है जिसके पास ऐसा हुनर हो. इस देश में हमारे पास 120 से अधिक अलग-अलग तरह की बुनाइयां है अगर हम उन्हें पुनर्जीवित नहीं करते हैं तो उनमें से लगभग आधी अगले दस से पंद्रह सालों में मर जाएंगी, क्योंकि सिर्फ वृद्ध जोड़े इसे कर रहे हैं, और उनके बच्चे सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन गए हैं. 

यही समय है कि हम प्राकृतिक रेशों और बुनकर उद्योग को पुनर्जीवित करें. हालांकि भारत एक समय में अपने कपड़ों के लिए प्रसिद्ध था, पिछली लगभग एक सदी में, दुनिया ने भारतीय कपड़ों को वाकई नहीं देखा है. भारत में और वैश्विक रूप से, इसे लोगों की जागरूकता में वापस लाने के लिए हम विभिन्न पहल पैदा कर रहे हैं. भारत में बेरोजगारी की काफी बात की जाती है. लेकिन अगर हम हैंडलूम को वापस ला सकें, तो इसे करने वाले लोग काफी नहीं पड़ेंगे, क्योंकि जबरदस्त मांग पैदा होगी. अगर हम सही चीजें करते हैं, तो भारत एक बार फिर, एक समझदारीपूर्ण और प्राकृतिक तरीके से, दुनिया को कपड़े पहना पाने के लिए तैयार होगा. 

निजी तौर पर, मैं इस तरह कपड़े पहनता हूं कि मैं इन सब बेहतरीन बुनकरों का प्रतिनिधि होता हूं. और मैं हर किसी से विनती करता हूं, कम से कम वे लोग जो भारत में समृद्ध हैं, कि आपकी कपड़े की अलमारी का कम से कम बीस प्रतिशत हस्त-निर्मित हो, लोगों द्वारा बुना गया हो, मशीनों से नहीं. कम से कम सप्ताह में एक बार, कृपया कुछ ऐसा पहनें जो भारतीय हो. यह आपके स्वास्थ्य के लिए है, निजी भलाई और पर्यावरण की भलाई के लिए है. साथ ही, आप बुनाई के हस्तकौशल में आने वाली भावी पीढ़ियों को सहारा भी दे रहे होंगे. 

(एक योगी और दिव्यदर्शी सद्गुरु आधुनिक गुरु हैं. विश्व शांति और खुशहाली की दिशा में निरंतर काम कर रहे सद्गुरु के रूपांतरणकारी कार्यक्रमों से दुनिया के करोड़ों लोगों को एक नई दिशा मिली है. साल 2017 में भारत सरकार ने सद्गुरु को उनके अनूठे और विशिष्ट कार्यों के लिए पद्मविभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है)

 

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