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अफगानिस्तान में तालिबान के लिए यह अंतिम मौका है 

Taliban in Afghanistan: आज अफगानिस्तान कमजोर है और तालिबान मजबूत दिख रहे हैं. लेकिन उन्हें अपने अस्तित्व के लिए ही अफगानिस्तान को एक बार फिर से मजबूत करना होगा.

हामिद मीर, पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर, पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार

Taliban in Afghanistan: तालिबान ने आखि‍रकार काबुल के पतन के 23 दिन बाद पूरी तरह से मर्दों वाली अपनी अंतरिम सरकार का ऐलान कर दिया है. कई लोगों ने यह अनुमान लगाया था कि 9/11 की बरसी पर तालिबान नई सरकार का गठन करेगा, लेकिन ये अनुमान गलत साबित हुए. तालिबान सुपरपावर को और अपमानित करने से बचा और उसने इसके चार दिन पहले ही सरकार का ऐलान कर दिया. वे केवल पंजशीर के ढहने का इंतजार कर रहे थे. 

अमेरिकी प्रशासन अफगान की नई अंतरिम सरकार से खुश नहीं दिख रहा है, क्योंकि इसमें अन्य राजनीतिक समूहों का कोई प्रतिनिधि‍त्व नहीं है. यह 100 फीसदी तालिबान सरकार है जिसके कई मंत्री एफबीआई की वांटेड लिस्ट में हैं और कुछ ने कई साल अमेरिकी जेलों में बिताए हैं. कैबिनेट के नए प्रमुख मुल्ला मुहम्मद हसन सहित ज्यादातर चेहरे तालिबान के संस्थापक मुल्ला मुहम्मद उमर के पुराने सहयोगी हैं. तालिबान की नई सरकार मुल्ला मुहम्मद उमर की ही विरासत दिख रही है, लेकिन कुछ नए तिकड़म और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ नए गठबंधनों के साथ. नए तालिबान कैबिनेट में 22 मंत्री हैं जिनमें 2 उप प्रधानमंत्री और पांच उप मंत्री हैं. आने वाले दिनों में कुछ और मंत्री भी नियुक्त किए जा सकते हैं. 

तालिबान के प्रमुख मुल्ला हैबतुल्ला अखुंजदा ने इस चरमपंथी संगठन के रहबरी शूरा के साथ काफी लंबे समय तक विचार-विमर्श के बाद नई सरकार का गठन किया है. अखुंजदा खुद मुल्ला मुहम्मद उमर के बहुत करीबी रहे हैं और उनके बेटे का साल 2017 में हेलमंड में एक आत्मघाती हमले में इंतकाल हो चुका है. पूरी सरकार उसी तरह उनकी निगरानी में चलेगी, जैसा कि पहले मुल्ला मुहम्मद उमर करते थे. नई सरकार में उनकी स्थि‍ति राष्ट्रपति जैसी होगी. वह ऐसी धार्मिक हस्ती हैं जिन्होंने कई शि‍या लड़ाकों को तालिबान में शामिल किया है और इसी वजह से उन्हें एक सुधारक की तरह देखा जाता है. वह कभी-कभी कैमरे के सामने आ सकते हैं, लेकिन ऐसा ज्यादा नहीं होगा. 

अंतरिम कैबिनेट के नए प्रमुख मुल्ला मुहम्मद हसन का नाम संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में शामिल है. वे 1996 से साल 2001 के बीच तालिबान सरकार में विदेश मंत्री और उप प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. मुल्ला मुहम्मद हसन उस छोटे से समूह का हिस्सा रहे हैं जिसने मुल्ला मुहम्मद उमर की अगुवाई में तालिबान का गठन किया है. वह साल 1994 में कंधार के पहले गवर्नर रहे हैं और बाद में मुल्ला रब्बानी की सरकार में उप प्रधानमंत्री बने. मुल्ला हसन अखुंद साल 1997 से 1999 के बीच कई बार पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मिले थे. नवाज शरीफ ने पूरी कोशि‍श की कि तालिबान ओसामा बिन लादेन का प्रत्यर्पण करवा दें, लेकिन तालिबान नेतृत्व ने इससे इंकार कर दिया. जनरल परवेज मुशर्रफ ने भी ऐसी कोशि‍श की थी, लेकिन तालिबान ने 9/11 के बाद ओसामा बिन लादेन को अमेरिका को सौंपने से इंकार कर दिया. 

पाकिस्तानी अधि‍कारियों ने 9/11 के बाद पाकिस्तान में तालिबान के राजदूत मुल्ला अब्दुल सलाम जईफ के माध्यम से मुल्ला मुहम्मद हसन अखुंद और मुल्ला उबैदुल्ला को जाल में फंसाकर पकड़ने की कोशि‍श भी की. उन्होंने जईफ को इस बात के लिए मजबूर किया कि वे तालिबान की पहली सरकार के उप प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री को बातचीत के लिए पाकिस्तान बुलाएं. लेकिन जईफ ने हसन और उबैदुल्ला दोनों को यह चेतावनी दे दी कि पाकिस्तान में उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है. जईफ को दिसंबर 2001 में तालिबान सरकार गिरने के बाद अमेरिका को सौंप दिया गया. उबैदुल्ला और उनके डिप्टी मुल्ला अब्दुल गनी बरादर को पाकिस्तान में गिरफ्तार कर लिया गया. उबैदुल्ला की पाकिस्तान के जेल में ही मौत हो गई, लेकिन बरादर को साल 2018 में रिहा कर दिया गया. बरादर उन लोगों में शामिल रहे जिन्होंने आखि‍रकार अमेरिका के साथ कतर में एक शांति समझौते पर दस्तखत किए. 

मुल्ला बरादर असल में मुल्ला मुहम्मद हसन अखुंद से जूनियर हैं. वह हसन के डिप्टी के रूप में काम करेंगे. बरादर को भी संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में शामिल किया गया है, लेकिन साल 2018 में रिहाई के बाद उन्हें अंतरराष्ट्रीय यात्रा की इजाजत दे दी गई. कई लोग मुल्ला बरादर को ‘डील मेकर’ कहते हैं क्योंकि उन्होंने दोहा करार पर दस्तखत किए थे, लेकिन वास्तव में वह मुल्ला मुहम्मद हसन के नेतृत्व वाले रहबरी शूरा के निर्देश पर काम कर रहे थे. एक और उप प्रधानमंत्री मुल्ला अब्दुल सलाम हनफी उजबेकिस्तान के फरयाब प्रांत के मूल निवासी हैं. वह शुरुआती दौर से तालिबान का हिस्सा रहे हैं. इसी तरह इकोनॉमी मंत्री कारी दीन मुहम्मद दीन मुहम्मद हनीफ भी ताजिकिस्तान के बदाखशान से आते हैं. वह पहली तालिबान सरकार में भी कई भूमिकाओं में काम कर चुके हैं. नई कैबिनेट में कई गैर-पख्तून भी हैं जिनमें नए आर्मी चीफ कारी फैसुद्दीन भी हैं जो पंजशीर के कब्जे वाले वाले इलाके के ताजिक हैं. 

गृह मंत्री सिराज हक्कानी को अमेरिकी एफबीआई की मोस्ट वांटेड लिस्ट में शामिल किया गया है. सिराज हक्कानी अमेरिकी नागरिक मार्क फ्रेरिक्स को बचाकर या रिहाकर अमेरिका के साथ बड़ी डील कर सकते हैं. फ्रेरिक का दोहा करार से कुछ दिनों पहले ही जनवरी 2020 में खोस्त से अपहरण कर लिया गया था. अमेरिकी अधि‍कारियों को यह भी संदेह है कि अमेरिकी नौसेना के एक बुजुर्ग पूर्व नौसैनिक और सिविल इंजीनियर का हक्कानियों ने अपहरण कर लिया है. अमेरिकी अधि‍कारियों ने दोहा करार से पहले उन्हें रिहा कराने की कोशि‍श की थी, लेकिन बाद में ट्रंप प्रशासन उन्हें भूल गया. अब बाइडेन प्रशासन उन्हें रिहा कराने की कोशिश कर रहा है. हक्कानी इसके बदले अमेरिका की जेलों में वर्षों से बंद कुछ अफगानी कैदियों की रिहाई की मांग कर सकते हैं. 

हक्कानी के सामने कई और चुनौतियां भी हैं. उन पर अब आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी है. उन्हें IS-KP और कई अन्य चरमपंथी संगठनों से निपटना होगा. हाल की यूएन की एक रिपोर्ट के अनुसार, अलकायदा अफगानिस्तान के 15 प्रांतों में मौजूद है. तालिबान इस यूएन रिपोर्ट को स्वीकार नहीं करता, लेकिन वे इस तथ्य से इंकार नहीं कर सकते कि अलकायदा नेताओं ने हाल में ही अफगानिस्तान से ही सीएनएन को एक इंटरव्यू दिया है. दूसरी तरफ, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर हमलों के लिए अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल कर रहा है. क्या सिराज हक्कानी अफगानिस्तान में अलकायदा और टीटीपी की गतिविधि‍यों को रोकने में सक्षम होंगे या वह IS-KP से निपटने में इनका सहयोग लेना चाहेंगे? नए रक्षा मंत्री मुल्ला याकूब अफगानिस्तान में शांति और सुरक्षा लाने के लिए उनका पूरा सहयोग कर सकते हैं. पहली तालिबान सरकार ने अपने नियंत्रण वाले इलाकों में सभी आम नागरिकों से हथि‍यार जमा करा लिए थे. क्या सिराज हक्कानी और मुल्ला याकूब भी इस बार ऐसा ही करेंगे? यदि वे अफगानिस्तान के सभी आम आदमियों से हथि‍यार जमा कराने की कोशि‍श करते हैं तो उन्हें इस पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिल सकता है, लेकिन निश्चित रूप से इसका अफगानिस्तान के ही कई इलाकों में विरोध होगा. 

मौलवी आमिर खान मुत्ताकी अफगानिस्तान के नए विदेश मंत्री हैं. वह पहली तालिबान सरकार में सूचना मंत्री रह चुके थे. वह आसानी से विदेश यात्रा कर सकते हैं. उनका नाम किसी वांटेड लिस्ट में शामिल नहीं हैं. मुल्ला हिदायतुल्ला बदरी नए वित्त मंत्री हैं. उनके सामने बड़ी चुनौती सरकारी कर्मचारियों के लिए अगले महीने तनख्वाह की व्यवस्था करना है. देश को चलाने के लिए भी उन्हें पैसे की जरूरत है. वह इस कोशि‍श में लगे हैं कि 15 अगस्त को अशरफ गनी के भागने के बाद अमेरिका में फ्रीज कर दिए गए 9 अरब डॉलर के अफगानिस्तान के एसेट को अनफ्रीज करा सकें. लेकिन यह अमेरिका और तालिबान के बीच नए संबंधों पर निर्भर करेगा. इस बात के संकेत हैं कि अमेरिका तालिबान के साथ मिलकर काम करने को तैयार है. काबुल पर तालिबान के कब्जे के तत्काल बाद सीआईए चीफ ने काबुल का दौरा किया और पेंटागन ने भी यह कहा कि वे तालिबान के साथ काम कर सकते हैं. लेकिन तालिबान ने जिस नई सरकार के गठन का ऐलान किया है, उसने अमेरिका को सचेत कर दिया है. अमेरिका यह नहीं चाहता कि तालिबान चीन और ईरान के साथ गठजोड़ बनाए. दूसरी तरफ, तालिबान भी कुछ समायोजन चाहता है और लचीलापन दिखाना चाहता है. 

पाकिस्तान के इंटेलीजेंस चीफ लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद ने पिछले हफ्ते काबुल का दौरा किया और तालिबान से कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ सकारात्मक तरीके से पेश आए. अफगानिस्तान के नए खुफिया प्रमुख अब्दुल हक वासिक और नई सरकार के कुछ मंत्रियों ने अमेरिका के गुआंतानामो बे की जेल में कुछ समय बिताए हैं. तालिबान को गुआंतानामो जैसी जेल बनाने से बचना होगा. 

तालिबान को अपने विरोधि‍यों को कम करके नहीं आकना चाहिए. अशरफ गनी, अमरुल्ला सालेह और अहमद मसूद अफगानिस्तान से भाग चुके हैं, लेकिन तालिबान यदि शांति और सुरक्षा लाने में असफल रहते हैं तो कई इलाकों में उन्हें जनता के असंतोष का सामना करना पड़ सकता है. अहमद मसूद एक निर्वासित अफगान सरकार के ऐलान की तैयारी कर रहे हैं. तालिबान यदि विफल रहते हैं तो यह निर्वासित सरकार उनके लिए समस्या खड़ी कर सकते हैं. 

यह तालिबान के लिए अंतिम मौका है. अब वे किसी सुपर पावर से नहीं लड़ रहे. वे कुछ बड़ी चुनौतियों से लड़ रहे हैं. ज्यादातर चुनौतियां आंतरिक हैं, बाहरी नहीं. सबसे बड़ी चुनौती गृह युद्ध से अफगानिस्तान को बचाना है. तालिबान का गठन साल 1990 से 1994 के बीच गृह युद्ध के दौरान ही हुआ था. इस बार अगर वे विफल हुए तो अफगानिस्तान एक बार फिर गृह युद्ध के दौर में जा सकता है और इस बार का गृह युद्ध अफगानिस्तान में तालिबान के सामने कई नए खि‍लाड़ि‍यों को पैदा कर सकता है. 

आज अफगानिस्तान कमजोर है और तालिबान मजबूत दिख रहे हैं. लेकिन उन्हें अपने अस्तितत्व के लिए ही अफगानिस्तान को एक बार फिर से मजबूत करना होगा. वे 9/11 के बाद बच गए क्योंकि तब वे कब्जा करने वाली विदेशी ताकतों के खि‍लाफ लड़ रहे थे. अब वहां से विदेशी ताकतें बाहर हो चुकी हैं. खुद लिबान को अब एक कब्जा करने वाली ताकत की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए. मैं एक बार फिर कहना चाहूंगा कि यह उनके लिए अंतिम मौका है. 

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