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गनी के भागने से दो महीने पहले ही मैंने काबुल के पतन का अनुमान लगा लिया था

मैंने 22 जून, 2021 को यह लिखा कि अफगान तालिबान तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. अशरफ गनी के कुछ करीबी लोगों के संपर्क में हैं और तालिबान कुछ लेन-देन के आधार पर उनके साथ डील करने की कोशि‍श कर रहे हैं.

हामिद मीर, पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर, पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार

जोखिम तो पत्रकारिता का गहना है. कई बार सच का खुलासा करने में हम अपने जीवन को दांव पर लगा देते हैं, तो कभी-कभी बड़ी स्टोरीज ब्रेक करने के लिए अपनी पेशेगत विश्वसनीयता को भी दांव पर लगा देते हैं. मैंने 22 जून, 2021 को यह जोखि‍म लिया, जब मैंने डोयचे वैले (DW) की उर्दू वेबसाइट के लिए एक कॉलम लिखा. मैंने यह लिखा कि अफगान तालिबान तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. अशरफ गनी के कुछ करीबी लोगों के संपर्क में हैं और तालिबान कुछ ‘लेन-देन’ के आधार पर उनके साथ डील करने की कोशि‍श कर रहे हैं.

मैंने यह अनुमान लगाया कि कुछ ही दिनों में तालिबान सबको चौंका सकते हैं. मैंने यह भी दावा किया था कि डॉ. अशरफ गनी अफगानिस्तान से भाग जाने के बाद मुख्य रूप से पाकिस्तान को ही निशाना बनाएंगे, न कि तालिबान को. जब DW उर्दू में मेरा कॉलम प्रकाशि‍त हुआ तो मेरे पाकिस्तान के कई साथी यह मानने को तैयार नहीं थे कि तालिबान काबुल पर कब्जा कर सकते हैं, लेकिन अफगानिस्तान के कई पत्रकार इससे सहमत थे. 

मुझे यहां यह स्वीकार करना होगा कि मैंने काबुल के पतन के बारे में  यह जोखि‍म भरी खबर अफगानिस्तान के अंदर के कई पत्रकार दोस्तों से बातचीत के आधार पर दी थी. हालांकि उनके लिए अफगानिस्तान की जमीनी सच्चाई को रिपोर्ट कर पाना मुश्किल था, क्योंकि अफगान मीडिया आजाद नहीं था. मुझ पर तो पाकिस्तान में बैन भी लगा दिया गया कि मैंने DW में यह कॉलम क्यों लिखा. काबुल के संभावित पतन के बारे में मेरा यह संभावित आकलन असल में अफगानिस्तान के लोगार प्रांत में स्थित अशरफ गनी के होमटाउन सुर्खाब के तालिबान के कब्जे में जाने पर आधारित था. सुर्खाब काबुल से केवल 30 किमी दूर है. कई टीवी चैनलों ने तो जून 2021 में ही सुर्खाब के तालिबान के हाथ में जाने की खबरें दे दी थीं, लेकिन गनी सरकार जमीनी सच्चाई से मुंह चुराती रही. लेकिन मीडिया (जो कि आजाद नहीं था) की सही जानकारी खुफिया एजेंसियों के गलत आकलन के नीचे दब गई.

फ्रीडम नेटवर्क रिपोर्ट 2021 की रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान एक आजाद देश नहीं है. यही नहीं, यह रिपोर्ट पाकिस्तान और भारत को भी ‘आंशि‍क रूप से आजाद’ देशों की श्रेणी में रखती है. पाकिस्तानी और भारतीय मीडिया भी अफगानिस्तान के बारे में सही तथ्य बयान नहीं कर रहा. ईरान से लेकर चीन तक अफगानिस्तान के आसपास के सभी देशों में मीडिया आजाद नहीं है. अफगानिस्तान में मौजूद कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठन भी वहां के बारे सही तथ्यों की रिपोर्टिंग नहीं करते, क्योंकि ऐसी तथ्यात्मक रिपोर्टिंग से तालिबान को फायदा होता है. यही वजह है कि सुर्खाब के पतन को दुनियाभर की मीडिया ने नजरअंदाज किया. 

सुर्खाब के पतन की पुष्टि मैंने किस तरह की   

तालिबान ने गनी के पुश्तैनी शहर सुर्खाब में अपना सफेद झंडा फहरा दिया और काबुल में तालिबान के पहुंचने की आशंका के बारे में मेरा अनुमान गनी के कई करीबी लोगों को अच्छा नहीं लगा. इस्लामाबाद के अफगान दूतावास ने मुझसे संपर्क किया और यह दावा किया कि गनी के वफादार सुरक्षा बलों ने सुर्खाब को तालिबान के कब्जे से वापस ले लिया है. मैंने इस खबर की पुष्टि के लिए लोगार के अपने पत्रकार दोस्तों से संपर्क किया. उन्होंने बताया था कि सुर्खाब तब भी तालिबान के कब्जे में था. मैंने इस पर तालिबान के प्रवक्ता जैबिहुल्ला मुजाहिद की राय मांगी. उन्होंने मैसेज भेजा, ‘कुछ मिनट इंतजार करें.’ कुछ मिनट के बाद उन्होंने मुझे एक वीडियो क्लिप भेजा जिसमें सुर्खाब में अशरफ गनी के घर के सामने की रिकॉर्डिंग की गई थी और कैमरे के सामने उनके रिश्तेदार इस बात की पुष्टि‍ कर रहे थे कि सुर्खाब पर अब गनी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है.

मैंने यह वीडियो क्लिप अफगान दूतावास के अधि‍कारी को फॉरवर्ड कर दिया और उसके बाद उधर से कोई जवाब नहीं आया. इसके बाद यह मेरे और कई अफगान पत्रकारों के लिए कोई रहस्य की बात नहीं रह गई कि गनी सरकार न केवल पूरी दुनिया को मूर्ख बना रही है, बल्कि गनी के सिपहसालार भी उन्हें धोखे में रख रहे हैं. उनके झूठ और उनकी सरकार में जारी मतभेद तालिबान के लिए फायदे की बात साबित हुए और वे बिना किसी प्रतिरोध के आसानी से राष्ट्रपति के महल में पहुंच गए. कई पत्रकार तो दीवार पर लिखी इस इबारत को समझ गए थे कि काबुल का पतन होने वाला है, लेकिन दुनिया की सबसे ताकतवर खुफिया एजेंसियां इस इबारत को नहीं पढ़ पाईं. जासूसों और पत्रकारों के बीच यही मुख्य फर्क है और दुनिया भर में खुफिया एजेंसियों और पत्रकारों के बीच टकराव बढ़ते जाने की भी यही वजह है. 

पिछले 20 साल में हालात कैसे बदले   

आज से 20 साल पहले यह मानना कठिन था कि तालिबान काबुल में वापस आ सकते हैं. लेकिन 15 अगस्त, 2021 को (भारतीय स्वतंत्रता दिवस के दिन) इस असंभव को संभव कर दिया गया. तालिबान की विजय बहुत से आम भारतीय लोगों के लिए बुरी खबर थी. वे तालिबान की विजय को पाकिस्तान की विजय की तरह देखते हैं. कई भारतीय टीवी चैनल यह अनुमान लगा रहे थे कि अमेरिका जल्दी ही तालिबान के खिलाफ बमबारी शुरू कर देगा, लेकिन पिछले सोमवार को अप्रत्याशि‍त रूप से CIA प्रमुख विलियम बर्न्स काबुल पहुंचे और तालिबान नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर से मुलाकात की. इस मुलाकात से यह संकेत मिला कि राष्ट्रपति जो बाइडेन बिल्कुल यह कोशि‍श कर रहे हैं कि अफगानिस्तान में चीन, रूस और ईरान के बढ़ते प्रभाव पर अंकुश लगाने के लिए तालिबान से बातचीत की जाए.

15 अगस्त से पहले तो भारतीय अधि‍कारी भी तालिबान के संपर्क में थे, लेकिन उन्होंने कभी भी सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार नहीं किया. काबुल पर तालिबान के कब्जे के कुछ दिनों में पहले ऐसी कुछ खबरें आईं भी कि भारत सरकार पिछले दरवाजे से तालिबान से संपर्क करने की कोशि‍श कर रही है, लेकिन भारतीय अधि‍कारियों ने इन खबरों को निराधार बताया. हालांकि, तथ्य कुछ और ही कहानी कहते हैं. 

भारत सरकार इस बात से इंकार नहीं कर सकती कि उसने पहली बार साल 2013 में ही तालिबान से संपर्क किया था, जब उसने CIA के पूर्व अफसर रॉबर्ट ग्रेनिएर के साथ एक सम्मेलन में शामिल होने के लिए तालिबान के शीर्ष नेता मुल्ला अब्दुल सलाम जईफ को वीजा दिया था. मुल्ला जईफ पाकिस्तान में अफगानिस्तान के राजदूत थे, लेकिन 9/11 के बाद उन्हें अनर्गल तरीके से गिरफ्तार कर लिया गया और अमेरिका को सौंप दिया गया. उन्हें साल 2005 में गुआंतानामो जेल से रिहा किया गया. बाद में उनकी पुस्तक ‘माय लाइफ विद तालिबान’ साल 2010 में भारत में ही प्रकाशि‍त हुई. कोई अचरज की बात नहीं है कि उनका नाम संयुक्त राष्ट्र की आतंकी सूची से हटा दिया गया और कुछ समय बाद उन्हें भारतीयों की मेहमाननवाजी हासिल हो गई. यह भी तथ्य है कि अफगान तालिबान के साथ शुरुआती  संपर्क मनमोहन सिंह की सरकार ने किया था. मुल्ला जईफ का भारत दौरा किसी से छिपा नहीं है. भारत में कट्टरपंथि‍यों ने देश में उनकी मौजूदगी की आलोचना की और बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है: वे भारत जाने को क्यों राजी हुए और भारत सरकार ने उन्हें वीजा क्यों दिया? 

संपर्क के नए नियम 

इस नए मेल-मिलाप के पीछे सबसे बड़ी वजह यह थी कि अफगान तालिबान अपनी इस छवि से खुश नहीं थे कि वे पाकिस्तान के पिट्ठू हैं. तालिबान के संस्थापकों में से एक मुल्ला जईफ ने अपनी किताब में पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठानों के खि‍लाफ खुलकर नाराजगी जाहिर की है. उन्होंने इस बात की आलोचना की कि किस तरह से पाकिस्तान की जेलों में उनके साथियों को टॉर्चर किया गया. कई वरिष्ठ तालिबानी नेताओं का पाकिस्तान के जेलों में रहते हुए इंतकाल हो गया, जिनमें पूर्व रक्षा मंत्री मुल्ला उबैदुल्ला अखुंद भी शामिल थे. तालिबान के एक और वरिष्ठ नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर को साल 2010 में पाकिस्तान में गिरफ्तार कर लिया गया था. यह गिरफ्तारी एक महत्वपूर्ण मोड़ थी.

बरादर अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई के संपर्क में थे जो कि चुपके से रूस, ईरान और भारत पर यह दबाव बना रहे थे कि वे तालिबान से बातचीत करें. पाकिस्तान और अमेरिका के कई प्रभावशाली लोग बरादर द्वारा करजई से सीधा संपर्क बनाने को पसंद नहीं कर रहे थे और इसलिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. पाकिस्तान के हाथों अपमान ने तालिबान को इस बात के लिए मजबूर किया कि वह रूस, ईरान और भारत से बातचीत का रास्ता खोले. उन्होंने तत्काल रूस और ईरान से संपर्क किया और उन्हें यह भरोसा दिलाया कि सिर्फ तालिबान ही अफगानिस्तान में ISIS को रोक सकते हैं. हालांकि भारत से बातचीत को लेकर वे सतर्क थे. आखि‍रकार भारत ने ही चुपचाप कई देशों की राजधानियों में तालिबान नेताओं से मुलाकात करना शुरू किया. 

पाकिस्तान ने साल 2018 में मुल्ला बरादर को रिहा कर दिया और तालिबान ने उन्हें अपनी बातचीत करने वाली टीम का प्रमुख बनाया. उसी साल कई वरिष्ठ तालिबानी नेताओं की मॉस्को में कई भारतीयों के साथ मुलाकात हुई. पहले वे भारत के खि‍लाफ थे क्योंकि पहले भारतीयों ने तालिबान विरोधी दलों का समर्थन किया था. सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि भारत अब तालिबान से बातचीत करना चाहता था क्योंकि 9/11 के बाद अफगानिस्तान में भारत अरबों डॉलर का निवेश कर चुका था. भारत ने काबुल में संसद की नई इमारत बनाई. भारत ने अफगानिस्तान के विभि‍न्न हिस्सों में बांध, सड़कें, यूनिवर्सिटी, अस्पताल और स्पोर्ट्स स्टेडियम बनाए. तो अगर तालिबान के साथ बातचीत नहीं किया जाता तो यह सब निवेश व्यर्थ हो सकता था. 

पिछले साल अमेरिका ने भी भारत से कहा कि वह तालिबान से बातचीत करे. ऐसी ही एक गोपनीय मुलाकात में भारत ने तालिबान से यह अनुरोध किया कि वह कश्मीरी आतंकियों से दूरी बनाकर रखें. इसकी वजह यह थी कि 1989 में अफगानिस्तान से रूसी सैनिकों की वापसी के बाद जम्मू- कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा मिला था. भारत यह नहीं चाहता था कि साल 2021 में अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से लौटें, तो वह इसे इस्लामी चरमपंथि‍यों के विजय के रूप में देखता है क्योंकि इससे कश्मीर में फिर से चरमपंथ को बढ़ावा मिल सकता है. तालिबान ने यह स्पष्ट करते हुए भारत को राहत दी कि वे कश्मीर में दखल नहीं देंगे. तालिबान यह जानता है कि भारत गनी सरकार को सैन्य सहयोग दे रहा था. इसलिए वे चाहते हैं कि भारत निष्पक्ष बना रहे. 

दोहा बैठक 

काबुल के तालिबान के कब्जे में जाने से कुछ हफ्तों पहले कतर के एक शीर्ष अफसर ने यह खुलासा किया कि दोहा में भारतीय अधि‍कारियों और तालिबान नेताओं के बीच बैठक हुई है. पाकिस्तान इन खबरों से खुश नहीं था. सच तो यह है कि पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया था कि अफगान शांति वार्ता में भारतीयों को शामिल किया जाए. वैसे तो, हाल में पाकिस्तान भी भारत से बातचीत करता रहा और दोनों ने इस साल फरवरी में सीजफायर के लिए समझौता किया, लेकिन पाकिस्तान ने कभी भी तालिबान और भारत के बीच संपर्क को पसंद नहीं किया.

काबुल में तालिबान के प्रवेश से कुछ दिनों पहले ही पाकिस्तानी सुरक्षा अधि‍कारियों ने दो अलग-अलग गुप्त बैठकों में सांसदों और पत्रकारों को बताया कि अफगान तालिबान अब सहयोग नहीं कर रहे और वे ताकत के बल पर काबुल पर कब्जा करना चाहते हैं. उनका कहना था कि यह आसान नहीं है क्योंकि अफगान सैनिकों की संख्या 3 लाख से ज्यादा है और उनकी वायु सेना भी मजबूत है, जबकि तालिबान के पास सिर्फ 75 हजार लड़ाके हैं. इन दोनों मुलाकातों में यह कहा गया कि अफगान तालिबान और पाकिस्तान तालिबान में कोई अंतर नहीं है. पाकिस्तानी तालिबान काफी लंबे समय से पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर हमला करते रहे हैं. पाकिस्तान हमेशा यह आरोप लगाता रहा है कि पाकिस्तानी तालिबान को भारत का सहयोग मिल रहा है. हालांकि, काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद पाकिस्तानी तालिबानी नेताओं को विभि‍न्न जेलों से भारत ने नहीं बल्कि उनके अफगान भाइयों ने रिहा किया है. 

पाकिस्तान की  चिंता 

अफगान तालिबान द्वारा पाकिस्तानी तालिबान नेताओं को रिहा करने पर पाकिस्तान द्वारा चिंता जताई गई, लेकिन कई भारतीय टीवी चैनल कुछ अलग ही परिस्थिति दिखाने की कोशि‍श कर रहे हैं. उनको यह आशंका है कि पाकिस्तानियों की मदद से अफगान तालिबान जम्मू-कश्मीर को निशाना बनाने की कोशि‍श कर सकते हैं. यह एक पुराना डर है. यही वजह है कि भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान काफी पहले से तालिबान के संपर्क में हैं, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से कभी भी इस बातचीत को कबूल नहीं किया है. इसकी वजह समझी जा सकती है. बीजेपी का हमेशा यह मानना रहा है कि तालिबान असल में पाकिस्तान के ही पिट्ठू हैं और वे ‘आतंकियों के साथ वार्ता नहीं’ कर सकते, लेकिन अफगानिस्तान में बदलते माहौल ने आतंकियों से बातचीत को मजबूर किया है.

कई भारतीय एक्सपर्ट को लगता है कि काबुल की सत्ता पर काबिज  तालिबान अफगानिस्तान में भारत के हितों को सुरक्षित नहीं रख सकते. काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद भारत अपने राजनयिकों और नागरिकों को वहां से वापस ले गया. तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने मुझे बताया कि वे भारत के संपर्क में हैं और उन्होंने अफगानिस्तान में एक भी भारतीय को नुकसान नहीं पहुंचाया है. उन्हें स्पिन बोल्डक में एक भारतीय पत्रकार की मौत पर खेद है, लेकिन उनका कहना है कि उनके लड़ाकों को यह पता नहीं था कि दुश्मन की सेनाओं के साथ पत्रकार भी है. 

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान बार-बार यह कहते रहे हैं कि अफगानिस्तान में सबसे ज्यादा अगर कोई नुकसान में रहा है तो वह भारत ही है. हालांकि उनके इस दावे पर दो राय हो सकती है. मुझे लगता कि अफगानिस्तान में सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को हुआ है. अगर वहां गृहयुद्ध के हालात बने तो पाकिस्तान को भी नुकसान हो सकता है, क्योंकि पिछले 40 साल से पाकिस्तान में करीब 30 लाख अफगान शरणार्थी रह रहे हैं. क्या तालिबान लोकतंत्र को अपनाएगा और भारत द्वारा तैयार संसद में बैठेगा? अगर वे सऊदी और ईरान की प्रणाली के किसी मिले-जुले रूप को अपनाते हैं तो क्या होगा? यदि अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों और अभि‍व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा नहीं की जाती, तो इसके लिए जवाबदेह उन अंतरराष्ट्रीय खि‍लाड़ि‍यों को ठहराया जा सकता है जिन्होंने पिछले साल दोहा में तालिबान के साथ शांति समझौता किया था. इस इलाके में बड़े खि‍लाड़ि‍यों की चिंताओं के समाधान के लिए तालिबान अपने स्तर से बेहतरीन कोशि‍श कर रहे हैं, लेकिन उन्हें यह बात समझनी होगी कि काबुल उनके हाथ में इस वजह से आया क्योंकि काफी कुछ गलत सूचनाओं की वजह से अनिश्चितता का माहौल बन गया था.

अफगान मीडिया को तथ्यों की सही रिपोर्टिंग की आजादी नहीं थी. कई अफगान पत्रकार दोस्त मेरे साथ अपनी एक्सक्लूसिव स्टोरीज साझा करते थे. मुझ पर भी पाकिस्तान में बैन लगा दिया गया और मैं जर्मनी, यूके तथा अमेरिका के अखबारों के लिए लिखता था. काबुल के तालिबान के हाथों में जाने से दो हफ्ते पहले गनी सरकार ने अफगानिस्तान में चार पत्रकारों को गिरफ्तार कर लिया. ह्यूमन राइट्स वाच (HRW) और कई पत्रकार संगठनों ने इस गिरफ्तारी की आलोचना की. गनी सरकार साफतौर पर देशहित के नाम पर चुपचाप अफगान मीडिया की स्वतंत्र आवाज को कुचल रही थी. दुर्भाग्य से डॉ. अशरफ गनी की अलोकतांत्रिक नीतियों पर अंकुश लगाने वाला कोई नहीं था और आखि‍रकार उनके अंतरराष्ट्रीय खैरख्वाहों को ऐतिहासिक अपमान के रूप में इसकी कीमत चुकानी पड़ी. 

आजाद मीडिया का सवाल   

अफगानिस्तान में मीडिया आजाद न रहने से आम जनता का सोशल मीडिया पर भरोसा बढ़ता गया, जिसमें कि गलत-सलत सूचनाओं की भरमार थी. ऐसी अनाप-शनाप सूचनाओं की बेस्ट वैक्सीन स्वतंत्र मीडिया ही हो सकती है. लेकिन यह वैक्सीन अफगानिस्तान में मौजूद नहीं था और इस वजह से गनी को घबरा कर अफगानिस्तान से भागना पड़ा. यह वैक्सीन अब भी अफगानिस्तान में उपलब्ध नहीं है. तालिबान बार-बार यह दावा करता रहा है कि अफगानिस्तान में मीडिया आजाद है. उनके दावे खुद उनके लिए बड़ी चुनौतियां बनते जा रहे हैं. मीडिया यदि आजाद है तो उन्हें मीडिया को अफगानिस्तान से सही तथ्यों की रिपोर्टिंग की छूट देनी चाहिए. गढ़ी गई कहानियों से कई तथ्य बिल्कुल अलग हैं.

अफगानिस्तान में डर और अनिश्चितता का माहौल है. हम यह जानते हैं कि अफगान सेना के हजारों सैनिक अपने हथि‍यारों के साथ गायब हो गए हैं. वे अब कहां हैं? क्या वे तालिबान से लड़ाई के लिए ISIS जॉइन कर लेंगे, या वे लंबी गुरिल्ला लड़ाई के लिए पंजशीर के लड़ाकों के साथ हाथ मिला लेंगे? अगर विभि‍न्न अफगान समूहों में कोई राजनीतिक समझौता नहीं होता, तो क्या होगा? क्या तालिबान चीन और रूस के साथ कोई नया गठजोड़ बनाएगा? अगर चीन और रूस तालिबान की सरकार को मान्यता देते हैं, तो क्या भारत, अमेरिका जैसे दूसरे देशों को भी ऐसा करना पड़ेगा? ये कई अहम सवाल हैं और केवल आजाद मीडिया ही तथ्यों की रिपोर्टिंग कर इन सवालों का जवाब दे सकती है. अफगान मीडिया को आजादी के साथ काम करने की इजाजत देनी चाहिए. नहीं तो तालिबान अपने जासूसी नेटवर्क पर ही भरोसा करेंगे और इसे लेकर आश्वस्त हूं कि उनका यह नेटवर्क उन्हें सही तथ्यों की जानकारी नहीं देगा. 

मीडिया को आजादी देकर गलत सूचनाओं के खिलाफ तालिबान एक अच्छा वैक्सीन तैयार कर सकता है. वे यदि मीडिया को तथ्यों की रिपोर्टिंग की इजाजत नहीं देते हैं, तो अफगानिस्तान इस अनिश्चितता से बाहर नहीं आएगा. और अंतत: पूरा अफगानिस्तान अनिश्चितता के दौर में प्रवेश कर सकता है.

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