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जो उचित हो, कृष्ण वही करने की सीख देते हैं

कृष्ण शांति, प्रेम और करुणा के प्रतीक थे. उन्होंने शांति कायम करने की पूरी कोशिश की, लेकिन लड़ाई के मैदान में वे एक शूरवीर योद्धा थे. राजाओं के दरबार में जाते, तो वहां वे एक कुशल राजनेता होते थे. जब अपनी प्रेमिका के साथ होते, तो एक शानदार प्रेमी होते थे.

ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु

कृष्ण किसी हालात के लिए जो उचित हो, वही करने पर जोर देते थे. लोगों के साथ उनका बर्ताव करुणा से भरा था, लेकिन कुछ लोगों के साथ बड़ी सख्ती से पेश आते थे. जहां उन्हें किसी को जान से मारना जरूरी लगा, वहां उन्होंने मारा भी, और जहां किसी की देखभाल करने की जरूरत थी, वहां उन्होंने देखभाल भी की. 

दरअसल, उनकी कोई एक नीति नहीं थी. वह बस एक जीवन थे. जब जिस तरह से जीवन को संभालने की जरूरत पड़ी, उन्होंने उसे उसी तरह से संभाला. वे शांति, प्रेम और करुणा के प्रतीक थे. उन्होंने शांति कायम करने की पूरी कोशिश की, लेकिन लड़ाई के मैदान में वे एक शूरवीर योद्धा थे. जब राजाओं के दरबार में जाते, तो वहां वे एक कुशल राजनेता होते थे. जब अपनी प्रेमिका के साथ होते, तो एक शानदार प्रेमी होते थे. ग्वाल-बालों के साथ होते, तो पूरी तरह से बच्चा बन जाते थे. चाहे जैसी परिस्थिति हो, चाहे जैसे लोग हों, वे हमेशा उनके साथ सहज थे, क्योंकि जीवन का एक भी पहलू उनसे अछूता नहीं था. उनकी यही बात उन्हें खास, बेहद खास बनाती है. ऐसा इसलिए था, क्योंकि उन्होंने स्वयं बहुआयामी होना चुना था. 

कृष्ण की इस बात पर हर किसी ने गौर कियाः जब वे लड़ाई के मैदान में भी उतरे, तो भी आखिरी पल तक उनकी यही कोशिश होती कि युद्ध  को कैसे टाला जाए, लेकिन जब टालना मुमकिन नहीं होता था, तो वे मुस्कुराते हुए लड़ाई के मैदान में लोगों को मौत के घाट उतारते थे. उनके आसपास के लोग अक्सर उनसे पूछते थे कि वे इतनी निर्दयता का काम मुस्कुराते हुए क्यों करते हैं, जब लोग उन्हें हर तरह की गालियां देते या उन्हें कठिनाइयों में डाल देते थे, तो भी वे मुस्कुराते रहते थे. 

एक बार जरासंध अपनी बड़ी भारी सेना लेकर मथुरा आया. वह कृष्ण और बलराम को मार डालना चाहता था, क्योंकि उन्होंने उसके दामाद कंस की हत्या कर दी थी. कृष्ण और बलराम जानते थे कि उन्हें मारने की खातिर जरासंध मथुरा नगरी की घेराबंदी करके सारे लोगों को यातनाएं देगा, तो लोगों की जान बचाने के लिए उन्होंने अपने परिवार और महल को छोड़ने का फैसला किया और जंगल में भाग गए. इसके लिए उनको रणछोड़ यानी भगोड़ा भी कहा गया, लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की, क्योंकि उस समय मथुरा वासियों की जान बचाना ज्यादा जरूरी था. इस दौरान उन्हें तरह-तरह के शारीरिक कष्ट झेलने पड़े. कृष्ण ने इस सब को बड़ी सहजता से लिया. 

उन्होंने सभी हालातों का मुस्कुराते हुए सामना किया. यहां तक कि जब कृष्ण एक सम्मानित राजा और राजनीतिज्ञ बन गए, तब भी लोग उन्हें भला-बुरा बोल देते थे. लोगों की गालियों की परवाह न करते हुए और मुस्कुराते हुए वे आगे बढ़ते रहे. उनके प्रशंसक और साथी इन बातों पर तलवार खींचने को तैयार हो जाते थे, लेकिन कृष्ण उनसे कहते, ‘चिंता मत कीजिए, कोई बात नहीं. अगर वे ये सब बातें नहीं कहेंगे तो जीवन बड़ा नीरस हो जाएगा.’ उन्होंने किसी की परवाह नहीं की और मुस्कुराते हुए अपना काम करते गए. 

(एक योगी और दिव्यदर्शी सद्गुरु, एक आधुनिक गुरु हैं. विश्व शांति और खुशहाली की दिशा में निरंतर काम कर रहे सद्गुरु के रूपांतरणकारी कार्यक्रमों से दुनिया के करोड़ों लोगों को एक नई दिशा मिली है. 2017 में भारत सरकार ने सद्गुरु को उनके अनूठे और विशिष्ट कार्यों के लिए पद्मविभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है.) 

 

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