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राज, राणा, राणे, रनौत... बीजेपी के नए-नए तीर, शिवसेना के लिए चुनौती गंभीर!

महाराष्ट्र में शिवसेना के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं. पहले तो सिर्फ बीजेपी से चुनौती मिल रही थी, लेकिन अब सियासी पिच पर कई नए किरदार खड़े हो गए हैं. ये नए किरदार ही पार्टी के लिए सिरदर्दी बन रहे हैं.

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शिवसेना के सामने नई चुनौतियां शिवसेना के सामने नई चुनौतियां

उस दिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने कह दिया कि किसी भी व्यक्ति के घर या घर के बाहर धार्मिक मंत्रों का बिना इजाजत पाठ करना, उस व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला है. अदालत की ये टिप्पणी महाराष्ट्र के ‘निर्दलीय’ जोड़े राणा दंपति के बारे में थी, जिन्होंने कसम खाई थी कि वो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के निजी निवास स्थान ‘मातोश्री’ के बाहर जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे. नवनीत राणा महाराष्ट्र के अमरावती से निर्दलीय सांसद हैं और उनके पति रवि राणा बडनेरा से निर्दलीय विधायक. लेकिन इसके बावजूद इस मामले में सवाल कम नहीं हो रहे. दो सवाल इनमें सबसे अहम हैं.

पहला सवालः क्या ये विवाद हनुमान चालीसा का विरोध है? इसके लिए हुआ है? 

एक वक्त शिवसेना की राजनीति ऐसे विवादों के इर्द-गिर्द घूमती थी. 1992 में मस्जिदों से दी जाने वाली अजान के खिलाफ बाला साहब ठाकरे के आदेश पर मुंबई के कई मंदिरों में महाआरती के आयोजन ने ऐसे ही विवाद को जन्म दिया था जो अंत में बाबरी गिराए जाने के बाद मुंबई दंगों में तब्दील हुआ. अब शिवसेना अपनी ही पुरानी राजनीति के घेरे में फंस रही है. विवाद हनुमान चालीसा का नहीं, हनुमान चालीसा के जरिये शिवसेना के हिंदुत्व को निशाना बनाने का है. शुरुआत गुढ़ी पड़वा के दिन एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे के भाषण से हुई, जिन्होंने अचानक मस्जिदों पर लगाए जाने वाले लाउडस्पीकर को मुद्दा बनाकर ऐलान किया कि अगर लाउडस्पीकर नहीं हटे तो उनके कार्यकर्ता मस्जिदों के सामने लाउडस्पीकर लगाकर हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे. बीजेपी ने लाउडस्पीकर का मुद्दा उठाया था लेकिन राज ठाकरे ने उसे कार्यक्रम का रूप दे दिया.

2005 में सुप्रीम कोर्ट ने गैर कानूनी और शोर मचाने वाले लाउडस्पीकर के खिलाफ आदेश पारित किए थे जिसपर आजतक कोई कार्रवाई नहीं हो पाई. इस बीच महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी से लेकर बीजेपी-शिवसेना तक सरकारें आई और गईं. वैसे मुद्दा शोर-शराबे से होने वाले ध्वनि प्रदूषण का है लेकिन इसमें अब धर्म की राजनीति का रंग मिल चुका है. सुप्रीम कोर्ट का आदेश उस हर लाउडस्पीकर के बारे में है जो शोर करता है. लेकिन अगर 90 के दशक की शिवसेना होती तो शायद वह भी इसे मस्जिदों पर लगाए जाने वाले लाउडस्पीकर तक ले जाती. महाराष्ट्र की विपक्षी पार्टी भी वही कर रही है क्योंकि उसे पता है कि अब शिवसेना इससे आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है.

बाला साहब ठाकरे की वो तमाम रैलियां याद हैं जिनमें सड़क पर पढ़ी जाने वाली नमाज और लाउडस्पीकर से दी जाने वाली अजान को कई बार मुद्दा बनाया गया था. आज शिवसेना सत्ता में है और ऐसे मुद्दों के बजाय वो विकास या उस तरह के मुद्दों पर अपनी छवि बनाना चाहती है. ऐसे में उन्हें उनके ही उठाए मुद्दों पर घसीटना विपक्ष की राजनीति है और राज ठाकरे वो स्पेस लेना चाहते हैं जिसपर शिवसेना अब खुलकर दावा नहीं कर सकती. हनुमान चालीसा के बोल उन्हें बीजेपी से रिश्ते जोड़ने में मददगार साबित हो सकते हैं, उनकी उत्तर भारतीय विरोधी छवि जिससे बीजेपी के मन में हिचकिचाहट हो रही थी उसे मिटाने का हिंदुत्व ही सहारा है. साथ ही कांग्रेस-एनसीपी शिवसेना के ‘सेक्युलर’ फ्रंट के खिलाफ हिंदुत्ववादी पार्टियों का गठबंधन दोनों पार्टियों के लिए फायदे का सौदा होगा. इसलिये ये विवाद उठ रहा है. वहीं सरकार के सामने दोहरा संकट है. कानून तो है लेकिन उसका सख्ती से पालन नए सवाल खड़े कर सकता है और ना करे तो तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लग सकता है. खासकर शिवसेना के लिए ये बड़ी चुनौती रहेगी. अगर मुख्यमंत्री ठाकरे के सामने हिंदुत्ववादी ठाकरे खड़े होते हैं तो हिंदुत्ववादी छवि पर वोट पाने वाली शिवसेना के लिए मुसीबत पैदा होगी. 


दूसरा सवालः अचानक ऐसा क्या हुआ कि राणा दंपति ने हनुमान चालीसा पढ़ने की कसम खा ली है?

2019 के महा विकास अघाड़ी के प्रयोग ने कई राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं. कुछ ऐसा ही राणा दंपती के साथ हुआ. शिवसेना के खिलाफ लड़कर कांग्रेस-एनसीपी के समर्थन से जीतने वाली नवनीत राणा ने 2019 शिवसेना के आनंद राव अडसुल को मात दी थी. विधानसभा चुनाव होने तक उनका सेक्युलर होने का नारा बुलंद था. यहां तक की संसद में जय श्रीराम के लगे नारों पर भी नवनीत राणा ने आपत्ति जताई थी. लेकिन शिवसेना को कांग्रेस एनसीपी ने साथ क्या लिया राणा दंपति के सुर बदल गए. अमरावती की स्थानीय राजनीति ने उन्हें मजबूर किया कि वो बीजेपी के साथ जाएं. ना सिर्फ उन्होंने मोदी सरकार के समर्थन की घोषणा की बल्कि संसद में ठाकरे सरकार के खिलाफ भाषण देना भी शुरू कर दिया. खुद बीजेपी को भी ऐसे लोगों की जरूरत थी जो ‘ठाकरे ब्रैंड’ को चुनौती दे सकें. ऐसा नहीं है कि ये काम बीजेपी नहीं कर रही है लेकिन जिस तरह की भाषा का प्रयोग शिवसेना ब्रैंड की राजनीति में होता है कम से कम महाराष्ट्र में बीजेपी उस भाषा या स्तर पर खुलकर नहीं जाना चाहती इसलिए कभी कंगना, कभी राणे और अब राणा परिवार उन्हें वो मदद पहुंचा रहे हैं. तीनों की भाषा या मुद्दों का बीजेपी ने कभी पहले समर्थन नहीं किया लेकिन जब बौखलाई शिवसेना से जवाबी हमला हुआ तब बीजेपी उनके समर्थन में उतर आई. फिर वो कंगना के मुंबई को पीओके कहना हो, नारायण राणे का मुख्यमंत्री को झापड़ देने वाला बयान हो या राणा दंपति का हनुमान चालीसा पढ़ने की कसम हो. शिवसेना को अपनी ‘आक्रामक’ छवि बचाने के लिए ऐसा जवाब देना पड़ा जिसपर कई सवाल खड़े हुए. बीजेपी ने उसी वक्त अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की.

शिवसेना ने सत्ता तो पाई, मुख्यमंत्री बनने का सपना तो पूरा किया लेकिन सत्ता चलाते समय अपनी ताकत को बरकरार रखना ये उसके सामने बड़ी चुनौती है. बाला साहब ठाकरे से आदित्य ठाकरे तक परिवर्तन इतनी आसानी से सफल होना मुश्किल है. बीजेपी के तरकश में राणा, राणे और रानौत जैसे कई बाण हैं जो उसे झेलने पड़ेंगे.

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