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बच्चा है, पिज़्ज़ा नहीं, ये ऑर्डर पर नहीं बनता... आलिया, दीपिका-कटरीना को बख्श दीजिए!

सोशल मीडिया पर मीम का आनंद जरूर लीजिए, लेकिन ये समझ लीजिए कि बच्चा करना है, नहीं करना है या कब करना है, ये तय करने का अधिकार केवल दो ही लोगों के पास होना चाहिए.

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आलिया और रणबीर ने आने वाले बच्चे का एनाउंसमेंट क्या किया, मज़ाक और मीम की झड़ी लग गई. ये दो तरह के लोग हैं, एक तो यह कह रहे हैं कि इतनी जल्दी तो पिज़्ज़ा भी डिलीवर नहीं होता, जितनी जल्दी ये बच्चा आ गया. वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस नए कपल के फैसले के चलते विक्की-कैटरीना और दीपिका-रणवीर को गरिया रहे हैं.

पर ये समझते क्यों नहीं, कि बच्चा वाकई कोई पिज़्ज़ा नहीं होता कि भूख लगे तो ऑर्डर कर लो, खाओ और हाथ झाड़कर चलते बनो. ये बच्चा है, एक ज़िंदगी है, जिसकी परवरिश करनी होती है. ये ऑर्डर पर नहीं बनता, खुद को भुलाकर इसे बनाना पड़ता है. खून और पसीना लगाना पड़ता है.

सोशल मीडिया पर मीम का आनंद जरूर लीजिए, लेकिन ये समझ लीजिए कि बच्चा करना है, नहीं करना है या कब करना है, ये तय करने का अधिकार केवल दो ही लोगों के पास होना चाहिए- बच्चे के होने वाले माता और पिता.

जब आप मां और बाप बनने की ज़िम्मेदारी उठा सकें, वही सही समय होता है परिवार बढ़ाने का. इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि शादी को कितने साल हो गए. कोई तो शादी के 5 साल में भी परिवार आगे बढ़ाने के लिए कंफर्टेबल नहीं होता, तो कोई शादी की पहली सालगिरह से पहले ही मां-बाप बन जाना चाहता है. 

उनका बच्चा, वो जब चाहें पैदा करें...आप कौन?

आप अगर बच्चे के दादा-दादी या नाना-नानी हैं, तो भी सुन लीजिए. बच्चा खिलौना नहीं होता कि आपको घर में दिल लगाने के लिए कोई चाहिए और कह दें कि जल्दी से 'बच्चा कर लो'. आपको अपनी बहू और बेटी को भी ये ज्ञान नहीं देना चाहिए कि जब तक बच्चा पैदा नहीं करेगी, तब तक वो 'पूर्ण' नहीं कहलाएंगी.  या फिर समाज में इज़्ज़त और मान-सम्मान नहीं मिलेगा. माना कि औरत ही बच्चा पैदा कर सकती है, लेकिन सारे मान-सम्मान का ठेका औरत के कंधों पर ही नहीं होता.  

कई कपल तो ऐसे भी हैं जो मां-बाप बनना ही नहीं चाहते. दो लोग ज़िंदगी साथ बिताते हैं, लेकिन बच्चा पैदा करना जरूरी नहीं समझते. या वे बच्चे की ज़िम्मेदारी उठाने के लिए खुद को सक्षम नहीं मानते. जीवन अपने हिसाब से जीने का उन्हें पूरा अधिकार है. लोगों के निर्णय का सम्मान कीजिए.  

बच्चा पैदा करने या अबॉर्शन पर हो मां-बाप का हक

असल में हम घर के लिविंग रूम में बैठकर ये तय करते है कि फलां को ये करना चाहिए, ये नहीं. घर में बैठकर हम तय करते हैं कि कोहली को ये शॉट मारना चाहिए था, ये नहीं. हम घर में बैठकर ये तय करते हैं कि इस नेता को पार्टी इस तरह से चलानी चाहिए, इस तरह नहीं. उसी तरह जज भी कोर्टरूम में बैठकर ये तय कर रहे हैं कि महिलाओं को अबॉर्शन नहीं कराना चाहिए. हाल ही में अमेरिका ने गर्भपात पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है.

इतने बड़े और जीवन बदल देने वाले फैसले के लिए, जजों को भी तो कभी उस दर्द को महसूस करना चाहिए जो एक महिला को सहना पड़ता है. लेकिन महिलाओं से जुड़ा इतना बड़ा फैसला लेने वाले ये जज ज्यादातर मर्द हैं. ये वे लोग हैं जो न बलात्कार का शिकार होते हैं और न धोखे से प्रेगनेंट. अगर सोच-विचार करके ही ये फैसला लिया गया है, तो फिर ऐसी अनचाही प्रेगनेंसी से हुए बच्चे के लालन-पालन की ज़िम्मेदारी भी फैसला करने वाला पक्ष ही उठाए.  

बैन करने से अबॉर्शन रुकने वाले नहीं

ऐसे तमाम मामले हैं जहां बच्चियों के साथ रेप हुआ और वे गर्भपात नहीं करा सकीं. या फिर प्रेग्नेंसी में कॉम्पिल्केशन के चलते गर्भपात ही विकल्प था, लेकिन नहीं करने दिया गया और मां की जान चली गई. 2012 में भारतीय मूल की डेंटिस्ट सविता हलप्पनवार की मौत पर हुआ बवाल तो दुनिया भर ने देखा था. वे डबलिन में थीं, 17 हफ्ते की गर्भवती थीं. प्रेगनेंसी में कॉम्प्लिकेशन थी. लेकिन उन्हें गर्भपात की इजाज़त नहीं दी गई, जिसके बाद खून में जहर फैलने से उनकी जान चली गई. एक गलत फैसला अपने पीछे कई जिंदगियों पर अपना असर छोड़ जाता है.  

अगर दुनिया के सबसे विकसित देश को ये लगता है कि महिलाओं से अबॉर्शन का हक छीन लेने से, देश में अबॉर्शन रुक जाएंगे तो वे गलत सोचते हैं. अबॉर्शन होंगे, खूब होंगे, लेकिन गैरकानूनी तरीके से. यहां ये जानना भी जरूरी है कि यूएन रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में हर साल साढ़े चार करोड़ महिलाएं असुरक्षित तरीके से गर्भपात कराती हैं और जान का जोखिम उठाती हैं, इनमें से कुछ 30 हजार बदकिस्मत महिलाओं की मौत तक हो जाती है.

बच्चा पैदा करने का हक अगर महिलाओं का है तो उसे दुनिया में लाने या नहीं लाने का हक भी महिलाओं का ही होना चाहिए. मुझे खुशी है कि भारत इस मामले में तो अमेरिका से ज्यादा परिपक्वता से सोचता है. बाकी बच्चे को कब पैदा करना चाहिए, इसपर भी अगर भारत थोड़ा परिपक्व हो जाए... तो मज़ा ही आ जाए.

 

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