scorecardresearch
 

मेरा बुनियादी लक्ष्य: धर्म से जिम्मेदारी की ओर

हमें यह समझने की जरूरत है कि हमारी सारी समस्याओं का स्रोत हमारे भीतर ही है और अगर हम समाधान चाहते हैं तो वो भी हमारे अंदर ही हैं, कहीं बाहर नहीं हैं. यह बहुत महत्वपूर्ण है- आप कौन हैं, आप क्या हैं, और आप क्या नहीं हैं, इसकी जिम्मेदारी आपके पास आनी चाहिए.

सद्गुरु, ईशा फाउंडेशन सद्गुरु, ईशा फाउंडेशन

समस्या यह है कि आपके जीवन में अगर कोई छोटी सी चीज गड़बड़ हो जाती है तो आप सोचते हैं कि कोई दूसरा आपकी तकलीफ का जिम्मेदार है. अगर आपके जीवन में कोई बड़ी चीज गड़बड़ हो जाती है तो आप सोचते हैं कि भगवान उसके लिए जिम्मेदार है. आप खुद को किसी चीज के लिए जिम्मेदार नहीं मानते. इसे बदलने का यही समय है. हमें यह समझने की जरूरत है कि हमारी सारी समस्याओं का स्रोत हमारे भीतर ही है और अगर हम समाधान चाहते हैं तो वो भी हमारे अंदर ही हैं, कहीं बाहर नहीं हैं. यह बहुत महत्वपूर्ण है - आप कौन हैं, आप क्या हैं, और आप क्या नहीं हैं, इसकी जिम्मेदारी आपके पास आनी चाहिए. मेरा यह बुनियादी लक्ष्य है: आपको धर्म से जिम्मेदारी की ओर ले जाना.

जब दुनिया धर्म से जिम्मेदारी की ओर बढ़ेगी, सिर्फ तभी मानव क्षमता पूरी तरह से उजागर होगी; वरना हर किसी के पास अपनी की हुई बकवास के लिए बहाना होता है, और आम तौर पर, उनके पास उनकी की हुई हर बेवकूफी की चीज के लिए ईश्वरीय मंजूरी होती है. मानव बुद्धिमत्ता की प्रकृति ऐसी है कि अगर आप आज कोई बेवकूफी का काम करते हैं तो आज रात आपकी बुद्धिमत्ता आपको परेशान करेगी - ‘मैंने ऐसा क्यों किया?’ लेकिन आप, किसी धर्मग्रंथ से या स्वर्ग से इस पर अनुमोदन पाकर, इससे बड़ी आसानी से पार हो सकते हैं. आप बड़े आत्मविश्वास के साथ मूर्खतापूर्ण चीजें कर सकते हैं - आपको पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं होती. ऐसा हमेशा से होता रहा है.

लेकिन अब, मानव बुद्धि पहले से कही ज्यादा प्रखर हो गई है. मानवता के इतिहास में, पहले से कहीं अधिक लोग खुद के लिए सोच रहे हैं. अभी हम जिस तरह से हैं, अगर भगवान खुद आकर आपसे बात करता है, अगर वह तर्कसंगत नहीं है, तो आप उसे स्वीकार नहीं करेंगे. तो, कई तरह से, स्वर्ग ढह रहे हैं. अभी हो सकता है कि ऐसा व्यक्तिगत स्तर पर हो रहा हो, लेकिन धीरे-धीरे यह एक विस्तृत चीज हो जाएगी.

मेरा अनुमान है कि अगले 80-100 साल में, संगठित धर्म का वर्तमान रूप हल्का पड़ जाएगा. अतीत में, जब लोग दयनीय दशा में रह रहे थे, तब स्वर्ग के मायने थे. आज हम स्वर्ग से बेहतर तरीके से रह रहे हैं, तो लोग आपसे कहेंगे, ‘मैं स्वर्ग नहीं जाना चाहता. यहीं बहुत अच्छा है.’ लेकिन कुछ अधिक अनुभव करने की मनुष्य की आकांक्षा खत्म नहीं होगी.

लोग, इस बुनियादी आकांक्षा को स्वर्ग की ओर, या बाहर की ओर देखकर तृप्त करना चाह रहे हैं, लेकिन भीतर की ओर नहीं. बस 150 साल पहले ही, दुनिया में मानवता का एक बड़ा हिस्सा ऊपर की ओर देखता था, जबकि एक छोटा हिस्सा बाहर की ओर देखता था. यह वो छोटा हिस्सा था जिसने दौलत इकट्ठी की, महल खड़े किए और दुनिया में कई चीजें कीं. लेकिन आज, मानवता का एक बड़ा हिस्सा, ऊपर की ओर देखने के बजाय बाहर की ओर देख रहा है. अगर आप मानव खुशहाली के लिए बाहर की ओर देखते हैं, तो हम धरती को छिन्न-भिन्न कर देंगे और अपने अस्तित्व के आधार को ही नष्ट कर देंगे - आज हम यही कर रहे हैं. हम इसे अलग-अलग नामों से बुलाना चाहते हैं, जैसे पर्यावरण की समस्याएं, ग्लोबल वार्मिंग या जलवायु परिवर्तन. पूरा बस यही हो रहा है कि इंसान मानव खुशहाली की खोज में बाहर की ओर देख रहा है.

खुशहाली की हमारी सोच को भीतर की ओर मुड़ना होगा. इंसानी खुशहाली तब तक नहीं आएगी जब तक इंसान भीतर की ओर न मुड़े, क्योंकि मानव अनुभव भीतर से ही पैदा होता है. एक बार जब आपको इसका एहसास होता है, तो योग बहुत प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि यह आत्म-रूपांतरण के लिए आंतरिक खुशहाली की तकनीकों और साधनों का इस्तेमाल करता है. जैसे-जैसे मानव बुद्धिमत्ता और अधिक प्रखर होती है, आप देखेंगे कि अगले 25-30 सालों में, योग धरती पर सामान्य तरीका बन जाएगा, न कि एक अपवाद.

(एक योगी और दिव्यदर्शी सद्गुरु, एक आधुनिक गुरु हैं. विश्व शांति और खुशहाली की दिशा में निरंतर काम कर रहे सद्गुरु के रूपांतरणकारी कार्यक्रमों से दुनिया के करोड़ों लोगों को एक नई दिशा मिली है. 2017 में भारत सरकार ने सद्गुरु को उनके अनूठे और विशिष्ट कार्यों के लिए पद्मविभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है.) 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें