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साहित्योत्सव 2020: पुरस्कृत लेखकों ने साझा किए रचनात्मक अनुभव, नाट्य लेखन पर चर्चा

साहित्य अकादमी के साहित्योत्सव में अकादमी पुरस्कार 2019 के विजेताओं ने जहां अपने लेखकीय अनुभव साझा किए, वहीं नाट्य लेखन का वर्तमान परिदृश्य पर परिचर्चा भी आयोजित हुई.

साहित्योत्सव 2020 के दौरान नाट्य लेखन परिचर्चा का चित्र साहित्योत्सव 2020 के दौरान नाट्य लेखन परिचर्चा का चित्र

नई दिल्ली: साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित साहित्योत्सव के लेखक-सम्मिलन कार्यक्रम में साहित्य अकादमी पुरस्कार 2019 के विजेताओं ने पाठकों से अपने रचनात्मक अनुभवों को साझा किया. इस कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने की. अपने आरंभिक वक्तव्य में उन्होंने कहा कि लेखक का व्यक्तित्व उस आइसवर्ग की तरह है, जिसका 25 प्रतिशत हिस्सा ऊपर होता है और बाकी हिस्सा पानी के अंदर रहता है. आज हम सम्मानित लेखकों के उसी छिपे हुए 75 प्रतिशत व्यक्तित्व से रू-ब-रू हो सकेंगे.

असमिया लेखिका जयश्री गोस्वामी महंत ने अपने पुरस्कृत उपन्यास 'चाणक्य' की रचना प्रक्रिया पर विस्तार से बताते हुए कहा कि पंचतंत्र एवं नीति-शास्त्र जैसी पुस्तकें पढ़ते समय उन्हें चाणक्य सबसे प्रिय पात्र लगा था, और तभी से मैंने उन पर एक उपन्यास लिखने योजना बनाई. इसीलिए मैं फिर भी पाठकों से कहना चाहूंगी कि वे इसे उपन्यास के रूप में ही पढ़े न किसी इतिहास की पुस्तक की तरह.

हिंदी में अपने काव्य संग्रह 'छीलते हुए अपने को' के लिए पुरस्कृत नंदकिशोर आचार्य ने कहा कि नए और बदलते आयामों का उद्घाटन ही कविता का धर्म है और यह अन्वेषण ही हमारी शब्द-चेतना के नए आयामों का सृजन संभव करता है- जो प्रकारांतर से मानव-चेतना के नए आयामों का सृजन है.

गुजराती के पुरस्कृत लेखक रतिलाल बोरीसागर ने अपने वक्तव्य में कहा कि सर्जक की आंतरिक शुद्धि उसकी चेतना को विशेष रूप से सचेत करती है. आंतरिक शुद्धि हरेक मनुष्य का कर्तव्य है, लेकिन सर्जक का तो कर्तव्य के अलावा उत्तरदायित्व भी है.

मैथिली में पुरस्कृत कुमार मनीष अरविंद ने कहा, एक वनाधिकारी के रूप में प्राप्त हुए ज्ञान और अनुभव ने मेरे इस विश्वास को लगातार दृढ़ किया कि प्रकृति-संरक्षण का मुद्दा मानवता के वास्ते अहम है. सो यह विषय मेरी रचनाओं में प्रमुखता से स्थान पाता रहा है. कार्यक्रम में अन्य सभी भाषाओं के पुरस्कृत लेखकों ने अपनी रचना प्रक्रिया को पाठकों के साथ साझा किया.

इस महोत्सव में नाट्य लेखक वर्तमान परिदृश्य पर आयोजित परिचर्चा का उद्घाटन प्रख्यात राजस्थानी लेखक और वर्तमान में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कार्यकारी अध्यक्ष अर्जुनदेव चारण ने किया. उन्होंने भारतीय नाट्य परंपरा का जिक्र करते हुए कहा कि किसी भी परंपरा का अनुकरण करना किसी बोझ को ढोना नहीं है बल्कि कोई परंपरा अपने आपको वर्तमान में ढालने के लिए हमेशा सजग रहती है. आगे उन्होंने कहा कि यह परिवर्तन बेहद सूक्ष्म होता है लेकिन यह परंपरा को हमेशा आधुनिक बनाए रखता है.

अर्जुनदेव चारण ने नए निर्देशकों नाट्य आलेखों में मनमाने बदलावे पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया भारतीय नाट्य परंपरा को अवरुद्ध करने वाली है. उन्होंने नाट्य निर्देशकों से अपील की कि शब्द नाटक का शरीर होते हैं अतः उनका सम्मान करना जरूरी है.

साहित्य अकादमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि विभिन्न विधाओं के रंगकर्म उनके हृदय के अत्यंत निकट हैं. कोई भी रचना जब नए परिवेश के साथ दर्शकों के सामने प्रस्तुति होती है तो वह भी नई होकर वर्तमान का हिस्सा हो जाती है. उन्होंने अपने कई नाटकों में किए गए इस तरह के परिवर्तनों की जानकारी भी दी.

परिचर्चा के अगले सत्र में कृष्णा मनवल्ली की अध्यक्षता में मणिपुरी के अथोकपम खोलचंद्र सिंह, असमिया के सपनज्योति ठाकुर, मराठी के शफ़ाअत खान और सुमन कुमार ने हिंदी नाट्य लेखन के वर्तमान परिदृश्य पर अपने विचार रखे.

शफ़ाअत खान ने कहा कि मराठी में नाट्य लेखकों की एक स्वस्थ परंपरा है, जो आज तक चली आ रही है. सपनज्योति ठाकुर ने असमिया के व्यावसायिक थियेटर का जिक्र करते हुए कहा कि हालांकि यह केवल मनोरंजन के लिए होता है लेकिन फिर भी इस कारण हमेशा नए नाटक उपलब्ध रहते हैं.

सुमन कुमार ने कहा कि वे एक नाटक निर्देशक के रूप में नाट्य लेख में बदलाव को गलत नहीं मानते बल्कि नाट्य लेखकों को अगर यह बदलाव ठीक लगे तो उन्हें इसके लिए निर्देशकों को छूट देनी चाहिए. वैसे भी नाटक मुक्ति का यज्ञ होता है तो उसके लिए किसी भी तरह का कोई अवरोध नहीं होना चाहिए.

कार्यक्रम के अंत में सभी का धन्यवाद देते हुए साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने कहा कि साहित्य अकादमी नाटकों के अनुवाद एवं उनकी प्रस्तुति के लिए कई योजनाएं लागू कर रही है. कार्यक्रम का संचालन संपादक हिंदी अनुपम तिवारी ने किया.

साहित्योत्सव में प्रतिष्ठित संवत्सर व्याख्यान पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा दिया जाना था, पर अज्ञात कारणों से प्रणव मुखर्जी कार्यक्रम में नहीं पहुंच पाए. डॉ प्रणव मुखर्जी द्वारा उपलब्ध कराए गए लिखित व्याख्यान का पाठ साहित्य अकादमी के अंग्रेज़ी परामर्श मंडल की संयोजक संयुक्ता दासगुप्ता ने किया. संवत्सर व्याख्यान का विषय था 'अर्थशास्त्र की चिरस्थायी विरासत'.

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