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राजकमल प्रकाशन के 70वें साल का जलसाः नामवर के बिना 'भविष्य के स्वर' पर बात

राजकमल प्रकाशन ने 70 साल होने के अवसर पर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 'भविष्य के स्वर' नाम से एक जलसा किया. इस परिचर्चा में सात वक्ताओं ने हिस्सा लिया.

राजकमल प्रकाशन के 70 साल का जलसा राजकमल प्रकाशन के 70 साल का जलसा

नई दिल्लीः राजकमल प्रकाशन ने 70 साल होने के अवसर पर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 'भविष्य के स्वर' नाम से एक जलसा किया तो साहित्य जगत की तमाम हस्तियां जुटीं. अशोक वाजपेयी, असगर वजाहत, मृदुला गर्ग, प्रयाग शुक्ल, रामशरण जोशी, शाजी जमा, अपूर्वानंद, कवयित्री अनामिका, गीतांजलि श्री, ओम थानवी, रविकांत, ओड़िया लेखिका यशोधारा मिश्र, भगवानदास मोरवाल, आशुतोष कुमार आदि की मौजूदगी के बावजूद इस प्रकाशन के शुभेच्छु नामवर सिंह की कमी साफसाफ झलकी.

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार ने कहा कि यह सिर्फ़ एक प्रकाशन की व्यवसायिक वर्षगांठ भर नहीं है, बल्कि यह पाठक और लेखक के प्रति अपनी जिम्मेदारी को साथ लेकर चलने की वर्षगांठ भी है. विनीत का कहना था कि जैसे आजकल दिल्ली का मौसम अशांत है; धूप, बारिश, ठंड बहुत ही विचलित तरीके से आ जा रहे हैं, वैसे ही सत्ता के गलियारे में होने वाली हर छोटी बड़ी बात पर पूरे देश की धड़कनों को विचलित कर रही है. इस माहौल में यह शाम सुकून और उम्मीद से भरी है.

राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने भी दूधनाथ सिंह, केदारनाथ सिंह, कृष्णा सोबती, नामवर सिंह आदि का जिक्र करते हुए ही अपने बात की शुरुआत की. उन्होंने याद दिलाया कि पिछले साल स्थापना दिवस पर हमने जो बातें की, जो वादे किये गए थे उन्हें पूरा किया गया. उन्होंने बताया कि राजकमल से उर्दू और मैथिली किताबों का प्रकाशन शुरू हो चुका है. जल्द ही इसमें बृज एवं अवधी की किताबें भी शामिल हो जाएंगीं.

अपनी बात को विस्तार देते हुए उन्होंने कहा कि 70 साल पूरा होने के बाद हम पुस्तक लेखक और पाठकों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का गहराई से अनुभव कर रहे हैं. हिंदी भाषा और समाज के प्रति हमारी निष्ठा पूर्णता अक्षुण्य रहेगी. वर्तमान के साथ चलते हुए भविष्य के लिए हम तैयार हैं.

कार्यक्रम में 'भविष्य का स्वर' विषय अभी क्यों पर अपनी बात रखते हुए राजकमल प्रकाशन समूह के सम्पादकीय निदेशक सत्यानंद निरूपम ने कहा कि हिन्दी में बहुत सारे सवालों को मंच नहीं मिलता. वो हमारे बीच मौजूद हैं लेकिन किसी अदृश्य आशंका से या मठों के ढह जाने के डर से उन्हें दबा दिया जाता है. लेकिन, अब वो समय है कि इन सवालों को मंच मिले. इसी जरूरत को भविष्य के स्वर में व्याख्यायित करने की कोशिश है.

उनका कहना था कि, 'राजकमल की 70 वर्षों की यह यात्रा, एक प्रकाशक के साथ लेखकों और पाठकों के भरोसे की सहयात्रा का इतिहास है. निरन्तर गुणवत्ता और पारदर्शिता को लेकर सचेत भाव से ही यह सम्भव हुआ है. आगे यह और बेहतर ढंग से हो, इसका प्रयास रहेगा. आने वाले वर्ष में हम हिन्दीपट्टी की मातृभाषाओं के साहित्य को भी उचित स्थान, उचित सम्मान देंगे. उनको साथ लिए बिना हिंदी बहुत दूर नहीं जा सकेगी.

'भविष्य के स्वर' कार्यक्रम में सात वक्ताओं अनुज लुगुन, आरजे सायमा, अनिल आहूजा, अंकिता आंनद, गौरव सोलंकी, विनीत कुमार और अनिल यादव ने अपनी बात रखी. पहले वक्ता अनिल यादव ने अपनी बात रखते हुए कहा कि 'जिस हिन्दी में हम इन दिनों सोचते हैं क्या उसी में सोच भी पाते हैं. हिन्दी के टूटे सपने को पूरा करने के लिये भगीरथी उद्यम चाहिए.

अनुज लुगुन ने आदिवासी साहित्य की चुनौतियों और संभावनाओं पर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा, सामाजिक धरातल पर जो आदिवासी अलग दिखता है, रचनात्मकता के स्तर पर वह एक समान है. परिस्थितियां सभी मातृभाषाओं के साथ आदिवासी साहित्य को वैचारिक स्तर पर साथ लाई हैं.

रेडियो की चर्चित उद्घोषिका सायमा ने अपनी चिरपरिचित आवाज़ में बोलते हुए सबका दिल जीत लिया. उन्होंने कहा, ‘हिन्दी उनकी पहली मोहब्बत है, उर्दू इश्क़ की भाषा है. पर वह यह दावा नहीं करती कि उन्हें ये भाषाएं आती हैं. उनका कहना था कि भाषाओं को दोस्त बनकर सीखा जा सकता है, भय व दबाव उनसे दूर कर दिया जाता है.

अंकिता ने अपनी बात रखते हुए कुछ ऐसे सवाल किए, जिसने सभी को झकझोर दिया. उन्होंने वक्तव्य के आख़िरी हिस्से में सभी से सवाल किया कि, 'हम अपने घरों में औरतों के पैर मजबूत करें या उन्हें लंगड़ी मारकर गिराएँ. यह हमें तय करना है. और यही हमारी नियत को भी दर्शाएगा.'

गौरव सोलंकी ने बहुत साफ शब्दों मेँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को परिभाषित किया. उन्होंने कहा, 'रास्ता पूछने के लिये जिस तरह इंसानों की जरूरत ख़त्म हो रहा है, उसी तरह कहानियाँ लिखने के लिये लेखकों की जरूरत ख़त्म न हो जाए.'

दृश्य विस्फोट के खतरे और भविष्य के डिजाइन पर बात रखते हुए अनिल आहुजा ने कहा कि प्रकाशन जगत का जो नया दौर है वह तकनीकी रूप से शानदार है. भारतीय प्रकाशन जगत को आने वाले समय में विकसित होना है, तो समय के साथ प्रकाशन जगत के नए आयामों को भी विकसित करना होगा.

इस विमर्श से पहले राजकमल प्रकाशन ने अपने वार्षिक आयोजन में पाठकों के प्रति गहन लगन एव निष्ठा के लिये दो सहकर्मियों सतीश कुमार तथा अशोक त्यागी को शॉल एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया.

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