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साहित्योत्सव 2020: भारतीय परंपरा व प्रकृति पर परिचर्चा, एलजीबीटीक्यू कवि सम्मेलन

प्रख्यात कन्नड लेखक एवं साहित्य अकादमी के महत्तर सदस्य एसएल भैरप्पा का कहना है कि भारतीयों के लिए प्रकृति ईश्वर की एक रचना या अभिव्यक्ति है और इसलिए वह पवित्र और पूजा के योग्य है.

प्रादेशिकता, पर्यावरण और साहित्य पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का चित्र प्रादेशिकता, पर्यावरण और साहित्य पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का चित्र

नई दिल्ली: साहित्योत्सव 2020 के चौथे दिन का खास आकर्षण 'प्रादेशिकता, पर्यावरण और साहित्य' पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के अलावा अखिल भारतीय एलजीबीटीक्यू कवि सम्मिलन और साहित्य अकादमी सम्मान 2019 से पुरस्कृत लेखकों की बातचीत का कार्यक्रम आमने-सामने था. शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत भारतीय वाद्य यंत्रों की समेकित प्रस्तुति ताल वाद्य कचेरी प्रस्तुत की गई.

इस अवसर पर 'प्रादेशिकता, पर्यावरण और साहित्य' विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए प्रख्यात कन्नड लेखक एवं साहित्य अकादमी के महत्तर सदस्य एसएल भैरप्पा ने कहा कि समस्त भारतीय भाषाओं में प्रकृति शब्द का प्रयोग शरीर या शारीरिक स्वास्थ के लिए किया जाता है. पश्चिमी और भारतीय मान्यताओं के अनुसार मनुष्य और प्रकृति के बीच संकटों में एक बुनियादी अंतर है. भारतीयों के लिए प्रकृति ईश्वर की एक रचना या अभिव्यक्ति है और इसलिए वह पवित्र और पूजा के योग्य है.

भैरप्पा का कहना था कि पश्चिम के लोग मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए पेड़ों और जंगलों को बनाए रखने की वकालत करते हैं, जबकि भारतीय परंपरा प्रकृति के साथ अपने आध्यात्मिक संबंध को बनाए रखने के लिए यही काम करती है.

इस उद्घाटन सत्र का बीज वक्तव्य अमित चौधुरी ने दिया और अध्यक्षीय भाषण चंद्रशेखर कंबार ने दिया. संगोष्ठी का अगला सत्र 'महाकाव्यों, उपाख्यानों एवं मिथकों में प्रकृति' विषय पर केंद्रित था. इस सत्र में अपना अध्यक्षीय भाषण प्रस्तुत करते हुए साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि प्रकृति के प्रति किसी भी बातचीत से पहले यह बात महत्त्वपूर्ण है कि हम उसके प्रति किस तरह का नजरिया रखते हैं. यदि हमारी दृष्टि उपयोगितावादी है तो हम उसको शोषण की दृष्टि से देखेंगे और अगर हमारी दृष्टि पारंपरिक है तो हम उसे पूजनीय मानेंगे.

तिवारी ने बाङ्ला साहित्य में विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय, ओड़िआ साहित्य में गोपीनाथ महांति का जिक्र करते हुए कहा कि कोई भी सृजनात्मक रचना पाठकों में तभी महत्त्वपूर्ण स्थान पाती है, जब वह प्रकृति के प्रति निर्मल भावनाओं के साथ व्यक्त की जाती है. उन्होंने कालीदास की संस्कृत रचनाओं में हिमालय के सौंदर्य के कुछ रोचक प्रसंगों पर बात करते हुए कहा कि हमें प्रकृति को मनुष्य का दर्जा देना होगा तभी हम उसे बचा पाएंगे. उन्होंने महात्मा गाँधी जी का जिक्र करते हुए कहा कि शायद वे विश्व के अंतिम बड़े व्यक्ति थे, जिन्होंने पर्यावरण सुरक्षा को अपना मुख्य विषय बनाया था.

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साहित्य अकादमी द्वारा अपनी तरह के विशिष्ट आयोजन एलजीबीटीक्यू कवि सम्मिलन में स्वागत भाषण देते हुए साहित्य अकादमी के सचिव के श्रीनिवासराव ने कहा कि हम लोग भारत के सभी कवियों का बिना भेदभाव के सम्मान करते हैं और उन्हें मंच प्रदान करते हैं. सम्मिलन के मुख्य अतिथि एवं अंग्रेज़ी के प्रख्यात कवि होशांग मर्चेंट थे. मर्चेंट ने अपनी तीन कविताओं का पाठ किया.

होशांग मर्चेंट की एक कविता प्रख्यात गणितज्ञ रामानुजम की मृत्यु पर केंद्रित थी और उसका शीर्षक ‘रोशनी’ था. उनकी एक कविता एलजीबीटीक्यू लोगों को होने वाली परेशानियों पर केंद्रित थी. इस कविता में उन्होंने मंजनू को पत्थर मारने का प्रतीक प्रयुक्त किया. अपने बीज भाषण में आर. राज राव ने कहा कि आज से 17 महीने पहले स्थितियां दूसरी थीं और यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि हमारे प्रतिनिधि इस तरह किसी सार्वजनिक मंच पर अपनी अभिव्यक्तियों को प्रस्तुत कर सकेंगे.

आर. राज राव ने इसके लिए स्वयं एवं साथियों द्वारा लंबी कानूनी लड़ाई का जिक्र करते हुए बताया कि आज भी हम कानूनन कुछ अधिकार पा चुके हैं लेकिन अभी भी हमारी लड़ाई सामाजिक पहचान बनाने की है. उन्होंने कई विदेशी कानूनों की जानकारी देते हुए कहा कि हमारी लड़ाई अभी भी जारी है.

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए साहित्य अकादमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार ने कहा कि एलजीबीटीक्यू लोगों के साथ किए जाने वाला अमानवीय व्यवहार उन्हें व्यथित करता है. हमें सामाजिक तौर पर उन्हें पूरी तरह स्वीकार करना होगा तभी हम एक संतुलित समाज की कल्पना कर पाएंगे.

अगले सत्र में विक्रमादित्य सहाय की अध्यक्षता में दस एलजीबीटीक्यू कवियों द्वारा कविताएं प्रस्तुत की गईं. सभी कविताओं का मूल स्वर उनके प्रति उपेक्षा से भरा सामाजिक व्यवहार था. रवीना बारिहा ने अपनी कविता में कहा -
दुख के पाठ पढ़कर और निर्मल हुई मैं
पाकर तिरस्कार तुम्हारा अनजाने में सबल हुई मैं.

इस कवि सम्मेलन में अदिति आंगिरस, चाँदिनी, गिरीश, शांता खुराई, रेशमा प्रसाद, अब्दुल रहीम, आकाश राय दत्त चौधुरी, तोशी पांडेय, विशाल पिंजाणी, अलगू जगन और डेनियल मेंडोंका ने अपनी कविताएं प्रस्तुत कीं. आमने-सामने कार्यक्रम के अंतर्गत आज बाङ्ला, गुजराती, हिंदी, मलयाळम् एवं उर्दू के पुरस्कृत लेखकों से प्रतिष्ठित साहित्यकारों, विद्वानों से बातचीत की गई.

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